नक़ाब कुछ अज़ाब (ग़ज़ल संग्रह) वैभव बेख़बर
ज़ख्म सीने के सारे उभार आए ग़म मिटाने मेरा दोस्त यार आये थक चुका हूं उसे याद करते करते अब तो हसरत है थोड़ा करार आये मेरी बस्ती में है आज भी अँधेरा तुम कहीं और सूरज उतार आये 0 एक मुखड़े से कई किरदार करना छोड़ दे और दरिया कश्तियों से पार करना छोड़ दे मैंने तुमसे कब कहा के प्यार करना छोड़ दे आदमी पर बस यहाँ एतबार करना छोड़ दे भागते कब तक रहोगे तुम हकीकत से यहाँ ख़्वाब जो मुमकिन नहीं,दीदार करना छोड़ दे बारहा मौके कहाँ देती किसी को ज़िन्दगी एक गलती बेसबब दो बार करना छोड़ दे दुश्मनी करनी अगर है सामने आकर करो पीठ पीछे दोस्तों पर वार करना छोड़ दे 0 थोड़ा होने दे ख़राब हमको अब पीने भी दे शराब हमको हर इक बात पूछ लेते हो तुम पर देते नहीं जबाब हमको पारस जैसा रंग रूप तेरा छूकर कर दे लाज़बाब हमको बस इक छोटी सी ख़ुशी के बदले अपने दे दे अब अज़ाब हमको कर लूं कितनी भी वफ़ा उससे आखिर...