2024 ग़ज़ल vaibhav Bekhabar
कायल कर देतीं हैं आँखे पागल कर देतीं हैं आँखे, ग़म को अश्क बनाती हैं कुछ बादल कर देतीं हैं आँखे, जब जब तीर नज़र से चलते घायल कर देतीं हैं आँखे, चाहें कैसा भी हो प्रश्न सब हल कर देतीं हैं आँखें, इश्क़ का राही अक्सर भटके जंगल कर देतीं हैं आँखे, अर्थ कई लेकर लफ़्ज़ों को ओझल कर देतीं हैं आँखे, झुक झुक कर जब जब हैं उठतीं हल-चल कर देतीं हैं आँखे, ख़ुद उड़तीं हैं और बदन को पैदल कर देतीं हैं आँखे ! 0 भटके तमाम उम्र इन्ही रास्तों के बीच गुज़री तमाम उम्र मेरी साजिशों के बीच, हम लोग अपने ज़िस्म से आगे न बढ़ सके उलझी रही ये जिंदगी कुछ ख़्वाहिशों के बीच, मज़हब के नाम पर हुये लिक्खे-पढ़े शरीक इक जंग चल रही है यहाँ बुजदिलों...