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हिंदी साहित्य लेख ( वैभव बेख़बर)

 साहित्य प्रेमियों को मेरा नमस्कार साहित्य क्या है उसका जीवन मे क्या महत्व है, क्या साहित्य बुर्जुआ वर्ग के आनंद का साधन है, या सर्वहारा वर्ग के संघर्ष की अभिव्यक्ति या फिर बाबू गुलाब राय की तरह गेंहूँ और गुलाब में सामंजस्य बनाये रखने की उक्ति है  कि जब-जब यह  सामंजस्य  बिगड़ेगा, समाज में घातक संघर्ष उत्पन्न होंगे, या फिर साहित्य को क्या होना चाहिये, जब आप साहित्य का इतिहास पढ़ोगे तो पाओगे कि साहित्य में समाज की अभिव्यक्ति होती आ रही है  बस किसी काल में कम ,किसी मे ज़्यादा, मैंने ब्रिटिश काल का इतिहास पढ़ा है,अंग्रेजी हुक़ूमत के तख़्त को झकझोरता हुआ साहित्य, तमाम लेखकों की किताबें ज़ब्त हुई,पत्र-पत्रिकायें बंद करवा दी गयीं, आजाद भारत में क्या हुआ  क्या हम गेँहू और गुलाब का सामंजस्य बराबर स्थापित रख सके पंडित राहुल संकृत्यायन ने कहा था " भारत में बौध्द साहित्य का लोप हो जाने से यहाँ कूपमंडूकता का बोल-बाला हो गया " यहाँ मैं बच्चन सिंह जी  का एक कथन याद दिलाना चाहता हूँ "जिन लोंगों को हिंदी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता वे अपनी आँखों का...

बोधगया बुध्दमय स्थल

 *वेदों* में उपलब्ध हिंसक यज्ञ, कर्मकांड, बलि प्रथा के विरोध में *उपनिषद* खड़े हुये थे,  उपनिषद हमनें स्वीकार कर लिए, सदियों बाद फिर से *ब्रह्म समाज ,  (राजाराम मोहनराय)* मूर्ति पूजा, बाल विवाह, विधवा विवाह , सती प्रथा के विरोध में खड़ा हुआ ,और उसे हमनें स्वीकार कर लिया *आर्य समाज,(दयानंद सरस्वती)* मूर्ति पूजा विरोध, पाखंड ,धर्मिक कुरीतियों के विरोध में खड़ा था और हमनें स्वीकार कर लिया *प्रार्थना समाज (आत्माराम पांडुरंग)* धार्मिक और सामाजिक सुधार जातिवाद उन्मूलन का आंदोलन खड़ा हुआ, और हमनें स्वीकार कर लिया, *अहिंसा और सत्याग्रह (गांधी जी)* अस्पृश्यता उन्मूलन, जातिवाद ,अहिंसा ,सत्याग्रह, सामाजिक सुधार आंदोलन हुये, हमनें स्वीकार कर लिये/ *रामकृष्ण मिशन (विवेकानंद)* पाखण्डवाद विरोधी,समाजसुधारक कार्य  किये, और हमनें स्वीकार कर लिया, उपर्युक्त सभी में वैदिक धर्म में  हस्तक्षेप किये, और सुधारात्मक प्रयास किये और हमनें स्वीकार कर लिये, *और एक #तथागत बुद्ध* हमें क्यों नहीं स्वीकार है.......? वेदिक धर्म से कोई हस्तक्षेप नहीं अपना स्वंय का मार्ग तय किया, भारत से निकलकर दुनिया...