हिंदी साहित्य लेख ( वैभव बेख़बर)

 साहित्य प्रेमियों को मेरा नमस्कार

साहित्य क्या है उसका जीवन मे क्या महत्व है, क्या साहित्य बुर्जुआ वर्ग के आनंद का साधन है, या सर्वहारा वर्ग के संघर्ष की अभिव्यक्ति

या फिर बाबू गुलाब राय की तरह गेंहूँ और गुलाब में सामंजस्य बनाये रखने की उक्ति है  कि

जब-जब यह  सामंजस्य  बिगड़ेगा, समाज में घातक संघर्ष उत्पन्न होंगे, या फिर साहित्य को क्या होना चाहिये,


जब आप साहित्य का इतिहास पढ़ोगे तो पाओगे कि साहित्य में समाज की अभिव्यक्ति होती आ रही है  बस किसी काल में कम ,किसी मे ज़्यादा,


मैंने ब्रिटिश काल का इतिहास पढ़ा है,अंग्रेजी हुक़ूमत के तख़्त को झकझोरता हुआ साहित्य, तमाम लेखकों की किताबें ज़ब्त हुई,पत्र-पत्रिकायें बंद करवा दी गयीं,


आजाद भारत में क्या हुआ 

क्या हम गेँहू और गुलाब का सामंजस्य बराबर स्थापित रख सके


पंडित राहुल संकृत्यायन ने कहा था

" भारत में बौध्द साहित्य का लोप हो जाने से यहाँ कूपमंडूकता का बोल-बाला हो गया "


यहाँ मैं बच्चन सिंह जी  का एक कथन याद दिलाना चाहता हूँ

"जिन लोंगों को हिंदी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता वे अपनी आँखों का ईलाज करवायें"

इस कथन का ज़िक्र अब शुक्ल जी के लिए नहीं कर रहा हूँ बल्कि वर्तमान साहित्यवाहकों के लिये है


अभी मैंने 25 फ़रवरी 2025 हिंदू कॉलेज के एक प्रोग्राम में बोलते हुये डॉ विकास दिव्यकिर्ती जी को सुना

आज से 30 साल पहले भी वह परीक्षा पास करने के लिए

अँधेरे में  कविता,या राम की शक्ति  पूजा समझ रहे थे और वर्तमान में लगभग 30 साल बाद मैं भी वही कवितायें समझने की कोशिश कर रहा हूँ


गोदान/ प्रेमचंद जी ,मैला आँचल/रेणु जी  या  प्रसाद,पंथ, निराला, महादेवी वर्मा

हिंदी साहित्य में मील के पत्थर हैं मानता हूँ,  मगर  समय के साथ परिवर्तन अस्तित्व की मांग है कि पुराने का महत्व भी बरकरार रहे और नये का आगमन भी स्वीकार हो..... और इसका सामंजस्य स्थापित करना  प्रतिनिधित्व का कार्य है


कहीं हमारा  साहित्य जर्जर न होने लगे, उत्तम साहित्य ही देश में  उत्तम विज्ञान पैदा करता है 

क्या हम तार्किकता/विज्ञान के क्षेत्र में इसलिए तो नहीं पीछे हैं अब यह भी हमें सोचना होगा


एक व्यक्तित्व हज़ार परिपेक्ष में अच्छा होने के बाद भी अगर एक परिपेक्ष्य में भी संकुचित है तो उसे भी समाज के समक्ष रखना होगा

तुलसीदास और कबीर दोनों महान कवि थे ,  मगर यह कहने में हमनें सदैव परहेज किया है कि तुलसीदास, थोड़े-थोड़े जातिवादी भी थे

रामचरितमानस/हनुमान चालीसा महान रचनायें है इसमें कोई संदेह नहीं

लेकिन इनको गलत प्रचारित किया गया, इन दोनों रचनाओं को ईश्वरीय रचना बताने की कोशिश की गयी है,  हनुमान चालीसा  तो उत्तर भारत में भूत-पिशाच भगाने के लिये उपयोग हो रही है.....समाज पर इसका सार्थक प्रभाव क्या होगा या हम अपनी आने वालीं नस्लों में कैसी चेतना का विकास करेंगे


मुझे साहित्य अध्ययन के दौरान एक बात थोड़ी सी चुभ गयी इसलिए उसका भी ज़िक्र कर रहा हूँ

यह बात संत कवि रैदास के विषय में ,  यहाँ भी किसी संत को संत के रूप में नहीं 

स्वीकार कर सके, उसकी भी जाति देखकर लिख दिया

प्रथम दलित कवि रैदास  जाति के (चमार)


सगुण  रामभक्ति काव्यधारा के आचार्य रामानन्द जी का आचरण कर लेते

"जात-पात पूछै नहिं कोइ"

"हरि को भजै सो हरि का होइ"//



इस समय साहित्यकारों का हुजूम उमड़ रहा है, प्रतिवर्ष लगभग  दस हजार पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं

उनमें से एक मैं भी शुमार हूँ, अपनी कलम घिस रहा हूँ कुछ अनाभ-सनाभ लिख कर  जल्द ही अपनी किताब से साथ हाज़िर होऊँगा

विद्वतजनों  अब तुम्हें जल्द तय करना होगा क्या यह साहित्य का युग आ रहा है या साहित्य के लिये  खतरे का समय !


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