साहित्य किराना स्टोर लेखक-वैभव बेख़बर
मन को उलझाओ मत तन की मझधार में
सत्य है कुछ नहीं और सँसार में
दो नयन से नयन चार हो जाने दो
तोड़ दो सब हदें प्यार हो जाने दो ,
नाव भी डगमगायेगी पानी में कुछ
मोड़ आते रहेंगे कहानी में कुछ,
ना ये ऋतु आएगी फिर कभी लौटकर
आओ मिलकर चलें ज़िंदगी की डगर,
डूबकर ही सही पार हो जाने दो
तोड़ दो सब हदें प्यार हो जाने दो ,
रीत रस्म-ओ-रवायत बदलकर चलो
हाँ मगर फिर कहूँगा सँभलकर चलो,
ना किसी राज में ना किसी साज़ में
ज़िंदगी तुम जियो अपने अंदाज़ में,
हार कर यदि मिले हार हो जाने दो
तोड़ दो सब हदें प्यार हो जाने दो !
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कुछ इस तरह निभाते रहे प्यार उम्रभर
हम कर सके न इश्क़ का इज़हार उम्रभर
दहलीज़ एक उनसे भी ना पार हो सकी
मैंने भी दिल को रक्खा तलबगार उम्रभर
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हर दर्द गवारा कर ले जब
दिल बस में तुम्हारा कर जब
दिल ही जाने दिल की हालत
महबूब किनारा कर ले जब
वो मेरी शक्ल/नाम भी भूल गया होगा
हम जिसकी याद में पगलाये हुये हैं
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12122 12122 121 221 212 2
किसे है फुर्सत जो हाल पूछे
किसान मजदूर आदमी का
भटक रही दर-बदर गरीबी
कहाँ ठिकाना है ज़िंदगी का,
नहीं रहा दौर नेकियों का
ये लोग कब के बदल चुके हैं
न इनमें शर्मों-हया अदब है
ज़मीर अपना कुचल चुके हैं
नक़ाब पहने हुए ज़माना
फ़रेब करता है सादगी का,
चलन सियासी चला रहे हैं
फ़िज़ूल का भेदभाव रखते
यहाँ न कोई बचा है रिश्ता
ये दौलतों से लगाव रखते,
कमाल देखो कि हँस रहे हैं
पता नहीं दूर तक खुशी का
वैसे भी संघर्ष बहुत है
जीवन मत दुश्वार बनाओ,
मक्कार निरन्तर होते शातिर
मेहनत भटके रोटी ख़ातिर
चाल सियासी चलना छोड़ो
मासूमों को छलना छोड़ो,
सर्कस में रस्सी पर नाचे
ऐसे मत किरदार बनाओ!
शिक्षा की व्यवस्था कैसी
रोग बढ़ा दे चिकित्सा कैसी
दफ्तर-दफ्तर रिश्वत-खोरी
न्याय हुआ थाने में चोरी,
रब कोई बारूद नहीं है
मज़हब मत हथियार बनाओ!
मेहनतकश मजबूर बहुत है
मिल का मालिक क्रूर बहुत है
नगरों के हैं स्वामी ज़ालिम
गांवों में परधानी ज़ालिम,
ज़हर न खा ले भूख किसी की
इतना मत लाचार बनाओ!
यदि इतिहासकार सुअर हैं
तो वह गू का इतिहास ही
रचेगा
दुनिया को बदलने वाले हैं
हम मानवता के रखवाले हैं,
बाज़ार को पहचान चुके हैं , सत्ता का धँधा जान चुके हैं,
हर पक्षपात मिटायेंगे ये दिल में अपने ठान चुके हैं,
पूँजीवाद है बैठा कारखानों पे खदानों पे
ज़ुल्म हरगिज न होने देंगे अब मजदूर किसानों पे,
सच्चे हैं मतवाले हैं हम मेहनत करने वाले हैं
दुनिया को बदलने वाले हैं हम मानवता के रखवाले हैं!
इतिहास पढ़ो भूगोल पढ़ो विज्ञान को पढ़ना मत भूलो
तलवार थी कल, अब कलम उठाओ शान से लड़ना मत भूलो,
ऊँच-नीच का भ्रम तोड़ेंगे इन मुल्ला पादरी पण्डो से
समाजिक आज़ादी लायेंगे इन रीत-रिवाज पाखण्डों से,
चापलूस चाटुकारों के सब भेद खुलने वाले हैं
दुनिया को बदलने वाले हैं हम मानवता के रखवाले हैं !
बस्ती, जंगल, सहरा, बाज़ार सियासी
राही, रस्ते, मंज़िल, मझधार सियासी।
हाथों में है मेरे औज़ार सियासी
पेट के ऊपर लटकी तलवार सियासी।
कोर्ट कचहरी दफ़्तर से उम्मीद न कर
सब के सब होते हैं किरदार सियासी।
जब भूख ने आवाज़ उठाई रोटी की
छाप रहे हैं पिज्जा अखबार सियासी।
बिक जाता सब पानी पूँजीपतियों को
जनता में होती है बौछार सियासी।
काम के वक़्त, कहाँ आते हैं नेता जी
पाँच बरस में देते हैं दीदार सियासी।
जो आदम को आदम से ही बाँट रही
मज़हब , मज़हब है इक दीवार सियासी !
लाचारी में निर्धन शीश झुकाते हैं
दान के नाम पे लगते दरबार सियासी !
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गुल गुलशन हों सब आबाद
ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद
मानवता को रक्खो याद
ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद !
कैसे भी हों अब हालात
लब से निकले सच्ची बात
आना है हम सबको साथ
ज़ालिम को देनी है मात,
दिल ना हो कोई नाशाद
ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद
सरहद के वीर जवानों को
हक़ दें मज़दूर किसानों को
तोड़ो इन तीर-कमानों को
हर पँछी चुग ले दानों को,
गर्त में जाये पूँजीवाद
ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद !
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कदम-कदम पे ज्ञान है
पढ़ते रहो, बढ़ते रहो,
सोये हुये दिमाग को
किताब ही जगाएगी,
मुश्किलों के बीच तुम्हे
सही रास्ता दिखायेगी,
सच की जगह झूठ है
और क़ानून बे-सबूत है
बाजार का ये दौर है
शहर-शहर में लूट है,
जंग है ये स्वंय की
स्वंय से लड़ते रहो!
लक्ष्य को पहचान लो
प्रण लो और ठान लो,
हर तरफ है अंधकार
हाँथ में लोबान लो,
थको मगर रुको नहीं
अदब करो झुको नहीं
रुख हवा का मोड़ दो
तूफ़ान से डरो नहीं,
कुछ ठोकरें हैं लाज़िमी
टूट-टूट जुड़ते रहो
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इस दुनिया की वीरानी को
तुम भी मेरी आँख से देखो,
रेल की जनरल बोगी देखो
शहर की झोपड़ -पट्टी देखो
धर्म देखो कभी जात देखो
दुनिया का पक्षपात देखो
जुल्म की व्यवस्था देखो
ज़ालिम को हँसता देखो,
राजा की बेईमानी को
तुम भी मेरी आँख से देखो!
खाली पेट की मजबूरी देखो
कभी मजदूर की मजदूरी देखो
किसानों का संघर्ष देखो
हर नारी का सामर्थ्य देखो
शिक्षा व्यवस्था का हाल देखो
मौत का सरकारी अस्पताल देखो,
बेबस लाचार कहानी को
तुम भी मेरी आँख से देखो!
तुम्हारे इश्क़ में मुझको ये ख़याल ना रहा
हम इस दुनियाँ में आये थे किसी और काम से
हम स्थापित हुई मंदिर में साधू मजे में हैं
मूरत बनाई थी जिसने भूखा मर गया!
कहीं छपते नहीं ये बात और है
ग़ज़ल और बाल मेरे पक चुके हैं
ग़ज़ल और बाल दोनों पक चुके हैं
सबसे पहले लोग भोजन के लिए लड़े थे,
उसके बाद ये दुनिया सम्पत्ति के लिए लड़ी,
और फिर बर्चस्व के लिए आपस में लड़े,
किसी न किसी चीज के लिए,आगे आने वाले
समय मे भी यहाँ लोग आपस में लड़ेंगे,
मानवीय इतिहास में अब तक का सफर देखें तो
अरबों लोग इस पृथ्वी पर जन्में/मरे होंगे,लेकिन
कुल मिलाकर चार या पाँच सौ लोग ऐसे हुये हैं
जिनको महानता की श्रेणी में रख सकते हैं
लेकिन ये महान लोग कभी किसी चीज के लिए
नहीं लड़े !
00कहानी 00
पिछली सदी में:-
ईमान और बेईमान नाम के दो मित्र थे
दुःख और संघर्ष जीवन का धर्म है जिससे हर एक जीवन को गुजरना पड़ता है
इन दोनों दोस्तों को भी इससे गुज़रना पड़ा, मगर दोनों के पथ में एक भेद था
एक तन की राह से गुजरा, एक मन की राह से गुजरा,
ईमान:- की हालत थोड़ी खस्ता थी, रोटी,कपड़ा और मकान सब जैसे तैसे ही थे
मेहनत मजदूरी करते वक़्त चींटी,कीड़ा,मच्छर, सब बदन को डस चुके थे
मगर सुकून से जीवन जी रहा है
बेईमान:-दौलत/शोहरत रुतबा सब है, मच्छर ने काटा,ड़ेंगू हुआ और मर गया
अगली सदी में:-
फिर से ईमान और बेईमान दो मित्र हैं
दोनों गुजर रहे हैं उन्हीं जीवन के उन्हीं पड़ावों से, लेकिन अब समय विज्ञान का है
ईमान:- खस्ताहाली थोड़ी कम है, पर है सुकून से बसर हो रही है
बेईमान:- शोहरत की बुलन्दी है, सब संसाधन हैं, रोबोट हैं
ज़िस्म की डिजिटल मोनिटरिंग हो रही है, एक घड़ी हाँथ में जो सब
बताती है, कितना खाना है, क्या खाना है, ऐसे ही कार्य करोगे तो अगले कुछ वर्षों में यह होने की पूर्ण संभावना है, एल्गोरिथ्म/आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है
मगर, मगर, मगर
यंत्रों के गलत इस्तेमाल हो रहे हैं, बायरस है, हैकिंग है ,टेक्निकल फाल्ट है,
अगर टेक्निकल फाल्ट है तो सारे एल्गोरिथ्म फेल , भविष्य के अनुमान फेल
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अमर नाम रख लेने से कोई चीज अमर नहीं हो जाती,
परिवर्तन , प्रकृति का नियम है
निर्माण और विध्वंश दोनों इसी नियम के अंतर्गत
होते आये हैं, समय के कालचक्र में दफ़्न हो चुकी हैं
कई सभ्यतायें,कई प्रजातियाँ,
समय के साथ खुद में बदलाव करने वाली चीजें
कुछ लंबे समय तक अपना अस्तित्व बनाये रखती हैं,
तार्किक अवलोकन ही वह युक्ति है जिससे किसी के
अस्तित्व को दीर्घकालिक बनाये रखा जा सकता है!
फिर वो चाहें कोई (धर्म,शास्त्र,परम्परा)ही क्यों न हो
एक न एक दिन परिवर्तन की क्रांति
जड़ता को.......... जर्जर कर देगी!
तुझे धंधे में घाटे का दुःख है
मेरे घर में आटे का दुःख है,
तेरे दुःख में गाड़ी मंहगी है
मेरे दुःख में किराया मंहगा है,
तेरे घर नौकर का दुःख है
मेरे घर झाड़ू का दुःख है,
तुझे दौलत, शोहरत पाने का दुःख है
मुझे कपड़ा ,दाल रोटी जुटाने का दुःख है
तुझे चैन-सुकून नहीं है
मेरी देह में खून नहीं है
तुझे अपनी औकात का दुःख है
मुझे अपनी जात का दुःख है,
तेरे दिमाग मे छाले है
मेरे पाँव में छाले है,
तुझे सरकार का दुःख है
मुझे बाजार का दुःख है
तुझे कुछ पाने का दुःख है
मुझे कुछ कमाने का दुःख है,
तेरे किस्से में दुःख है
मेरे हिस्से में दुःख है
फर्क सिर्फ इतना है
तेरे-मेरे हालातों में
तुझे हर्फ़ से दुःख होता है
मुझे दर्द से दुःख होता है!
( कविता )
तन मजूरी में घिसता रहा
पेट में तब निवाले गये
एक मेरी गली छोड़कर
शहर भर में उजाले गये,
चार पैसे जुटाने गये
गाँव से कारख़ाने गये
खून पानी हुआ भाप बन
धूप में तन उबाले गये,
चित हुये तो कोई ले गया
पट गिरे तो किसी और के
ज़िंदगी कोई सिक्का न थी
उम्रभर हम उछाले गये,
रोज साँचे में ढाले गये
और जबरन निकाले गये
दर-बदर हम भटकते रहे
मत कहो पोशे-पाले गये!
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प्रबुइतिहास स्निग्ध जान रहा हूँ
क्यों कहते हैं एशिया की ज्योति
अब मैं गौतम बुद्द जान रहा हूँ
द्ध और विशुद्ध जान रहा ह
तुम्हे क्या बताएं वाइज मेरी ज़िंदगी में क्या है
कई ज़ख्म हसरतों के ओर बेख़ुदी में क्या है
सावन का मौसम पीला कर डाला है
पौधों का जीवन छोटा कर डाला है,
रासायन दे देकर उपजायें हैं
हमनें फूलों का सौदा कर डाला है,
हम बागों को गमलों में ले आये हैं
और आँगन में कृत्रिम झूला डाला है!
तन मन के दो किनारों के बीच
जीवन की नदीया बहती है
लोग कहेंगे धार के विपरीत चलो
कुछ लोग कहेंगे साथ चलो,
तुम डूब के इसमें प्यार करो
चाहें तैर के इसको पार करो,
तुम अपना सामर्थ्य तैयार करो
लोग तो कहेंगे
युद्ध करो, या संधि करो,
तुम अपना पथ तलाश करो
लोग तो कहेंगे
उधर चलो या इधर चलो!
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बहुत वीरान ये दिल कोई गम ही अता कर दे
ग़ज़ल लिक्खे हुये मुझको महीना बीत जाता है
कोशिशें बार बार करते हैं
हम मुकद्दर से जंग लड़ते हैं!
वैभव बेख़बर
ख़ामोशी भारी ही होती है
अक्सर खाली बर्तन बजते है!
वैभव बेख़बर
हमारे साथ तो मुश्किल यही है
बहुत आसानियाँ हैं ज़िंदगी में!
वैभव बेख़बर
हुकूमत देख के पाला बदल लें
हमारे देश में दल्ले बहुत हैं
ख़ुशामद-गो, विदेशी शासकों के,
वही अब अस्ल हिंदू बन रहे हैं
भले किरदार छोटा है कहानी में
मगर मैं रुख बदलता हूँ र'वानी में!
मसीहा बन गया होता कभी का
अगर मैं ज़िस्म से आगे निकलता!
पुरखों की याद दिलाते हैं
घर में कुछ पीतल के बर्तन हैं
*
स्वप्न मीठे लिये आखों में
नेह की चाह में आ गये
पुष्प मिलने से पहले भ्रमर
एक पत्थर से टकरा गये,
पनघटों पर भटकते रहे
प्यास में दम निकलता रहा
बादलों से निवेदन किया
और फिर ज़हर ही पी लिया,
कोयलें कूकतीं रह गयीं
जब पपीहा पसंद आ गया
रातरानी का हम क्या करें
कैक्टस अब हमें भा गये,
लोग कीमत जताने लगे
हम भी बाज़ार में आ गये!
*
गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे
प्रेम की दास्तां हम सुनाते रहे।
अश्रु निर्झर बहे याद कर आपको
सोचते हम रहे रातभर आपको
दायरों ने हमें विष पिलाया मगर
दिल अमर हो गया प्रेम कर आपको
ज़िंदगी की हक़ीकत ने तोड़ा बहुत
ख्वाबों में एक दुनिया बसाते रहे, गीत गाते रहे.....
कोई शिकवा नहीं आप मिल ना सके
हीर -राँझा भी तो साथ चल ना सके
मोड़ मुश्किल भरा कर गया दिल जुदा
हम भी दस्तूर दुनिया बदल ना सके
ज़िक्र करते रहे रात तारों से हम
दिन वो बीते हुये याद आते रहे! गीत गाते रहे....
कविता
ख़त्म हो पाप चाहे किसी भेष में
एक आवाज उठती रहे देश में,
सत्य के बीज बंजर में बोकर कहो
झूठ को झूठ बेबाक होकर कहो,
भीड़ शामिल करेगी तुम्हें रेश में
एक आवाज उठती......…....!
न्याय की बात है मत ग़लत बोलिये
कौम का छोड़िये मोह, सच बोलिये,
दीप जलता रहे अपने परिवेश में
एक आवाज उठती........!
कल्पनाओं में किस्से न गढ़ बेख़बर
दौर विज्ञान का है तू पढ़ बेख़बर,
फर्क करना नहीं शाह,दरवेश में
एक आवाज उठती........!
ख़त्म हो पाप चाहे किसी भेष में
एक आवाज उठती रहे देश में !
वैभव बेख़बर
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