कवितायें

 हाल समझना सीखो, हर चाल समझना सीखो, 

नकाब को पहचानो,    इसलिए  किताब पढ़ो !


पूँजीपतियों  से  मिलकर,  देश का पैसा खाते  हैं

जाति-धर्म  के  नाम पर   हमको  जो लड़वाते हैं,

वक्त बदलता रहता, इस दुनिया में  मैयार का रंग, 

तुमको लड़नी पढ़ेगी,अपने हक अधिकार की जंग,


ज्ञात हो  पहले  तुमको, क्या सच है  क्या  है  झूठ

अज़ाब  के  कारण जानों, इसलिए  क़िताब  पढ़ो !


अनमोल  स्वस्थ  शरीर,   मत करना  इसे  ख़राब

घर  की  हालत  देखो , जिसने-जिसने  पी शराब,

मेहनतकश  मेहनत करके,  जीवन  में रंग भरते हैं

लक्ष्य उन्हें होता हासिल, नित्य  क़दम जो बढ़ते हैं ,


हर हार का अंजाम भी,   देता  है  उम्दा  पैग़ाम

क़िताब की ताक़त जानों,  इसलिए  क़िताब पढ़ो !


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पास  तो  आ  गये  हैं  मगर

हम  नहीं  हैं  तुम्हारे  लिये!


हम को  दाना  चुगाना पसँद

तुम को मछली है खाना पसँद,

एक सूरत  में  दुनिया  मेरी

तुम को सारा  ज़माना पसँद,


तुम बहुत खूबसूरत हो पर

हम नहीं  हैं  तुम्हारे  लिये!


सूर्य का  शौर्य तुमको पसँद

तम  मिटाना  मेरा  काम है

एक  जुगनू  सी हस्ती मेरी

जगमगाना  मेरा  काम  है,


सारी  दुनिया  भले हो तेरी

हम  नहीं  हैं  तुम्हारे  लिये

पास तो  आ गये  हैं मगर,...हम नहीं हैं.….!

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"पेड़ फिर कपड़े पहन रहे हैं"
(एक ऋतु संवाद)

पतझड़ में थे नंगे तन,
जैसे संन्यासी ध्यान मग्न।
सहन किए हर ताप, हर शूल,
मौन रहकर खाते हैं धूल।

सर्द हवाओं का व्रत निभाया,
नंगे शाखों ने गीत सुनाया।
होते हैं सबसे त्यागी पेड़
रंगीन धरा के बैरागी पेड़!

फिर वसंत ने किया निमंत्रण,
डालियों पर जागी चेतना पुनः।
नव पत्तों का वस्त्र चढ़ा,
हर शाख जैसे हरियाली से सजा।

ये पत्ते सिर्फ हरे नहीं हैं,
ये पेड़ों की करुणा के वेश हैं।
गर्मी से पहले ओढ़ लिया चोला,
कि मनुष्यों को न लगे सूरज का शोला।

छाँव तले बैठे आदिवासी,
बच्चे, किसान, साधु, सन्यासी।
पेड़ चुपचाप सब कुछ देते हैं,
अपने हर पत्ते में प्रेम से ढकते हैं।

तो जब अगली बार धूप में बैठो,
या छाँव में थककर साँस लो —
याद रखना, किसी ने पहले
तपकर तुम्हारे लिए वस्त्र बुने हैं।

रिश्ते

बड़ी मुश्किल से चल रहे हैं
वो भी  मतलब  से
खून  के  रिश्ते,

मगर फिर भी लोग खोजते हैं
आपनी  जात में रिश्ते,

जबकि रिश्ते  खड़े होते
व्यवहार की बुनियाद पे!

0 आदमी

मैं हिंदू हूँ तो कट्टर हिंदू क्यों नहीं हूं,
मैं मुस्लिम हूँ तो कट्टर मुस्लिम क्यों नहीं हूं,
मैं जैन,बौद्ध, पारसी,ईसाई जो भी हूँ
तो कट्टर धर्मिक क्यों नहीं हूँ,

रफ़्ता-रफ़्ता मैं यहाँ मारा जा रहा हूँ
बस मेरा गुनाह है  आदमी होना!


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