बस्तियों के, ग़रीब घर देखे
खौफ़ खाए हुए बशर देखे
चार दाने को, चार आने को
ज़िन्दगी रोज़ दर-बदर देखे
तख़्त पाए अमीर लोगों ने
मात खाए हुए हुनर देखे
किसका है इंतिज़ार वर्षों से
एक सूनी सड़क नज़र देखे
छाँव में देखा आसमानों को
धूप आई तो फ़िर शज़र देखे
नाज़ उनको है अपनी कश्ती पर
हमनें डूबे हुए शिखर देखे
लोग भटके शरीफ़, राहों में
रहज़नी करते राहबर देखे।
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भाई-बंधु रिश्ते-नाते यार सब
मतलबी से हो गए किरदार सब
मशविरे तक मुफ़्त में मिलते नहीं
हो गया है अब यहाँ बाज़ार सब
जात-मज़हब पूछ कर वापस गए
कह रहे थे खुद को वो दिलदार सब
दिल में इतना खौफ़ है मझधार का
और जाना चाहते हैं पार सब
कौन जाने ज़िन्दगी में क्या हो कल
फ़िक्र-ए-आमद होतीं हैं बेकार सब
ख़ामख़ा की ख़्वाहिशें फिर किसलिए
ख़ाक में मिल जाते हैं ज़रदार सब
बात थी चैनों-अमन की बेख़बर
लेके आए हाँथ में तलवार सब।
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खड़ी दीवार करती है ये अब दस्तूर ना होगी
तुम्हारी मज़हबी चाहत कभी मंज़ूर ना होगी
लहू के रंग में उल्फ़त, वतन का शौर्य गाती है
बढ़ा दो फ़ासले चाहे ये दिल से दूर ना होगी
मिटाने पर तुले हैं लोग कुछ इंसानियत का घर
हज़ारों कोशिशों के बाद भी मंशूर ना होगी
अंधेरा लाख बढ़ जाए, चरागाँ कब भला डरते
हँसी महफ़िल मोहब्बत की कभी बेनूर ना होगी
वो रब सब कुछ समझता है, दिखावा छोड़ दो यारों
वो होगीं नेकियाँ मशहूर जो मगरूर ना होगी।
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कल के ख़ातिर फुगाँ नहीं करते
फ़िकरे सूद ओ जियाँ नहीं करते
जुगनुओं को भरम बलन्दी का
चाँद सूरज गुमाँ नहीं करते
इश्क़ शायद अभी अधूरा है
आप मुझमें रवाँ नहीं करते
बेसबब अब वो मुस्कराते हैं
दर्द दिल का बयाँ नहीं करते
तन-बदन ख़ाक में मिला देते
ग़म के शोले धुआँ नहीं करते
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आदमी यही करतब उम्रभर दिखाता है
एक को मनाता , तो दूजा रुठ जाता है
काम के निकलते ही, रास्ते बदल जाते
कौन साथ किसका अब उम्रभर निभाता है
चोर चाटुकारों का , दौर यह दलालों का
नेकियों का दरिया तो यूँ ही सूख जाता है
ज़ीस्त के तज़ुर्बे कुछ ठोकरें सिखाती हैं
आदमी मुसीबत से लड़के जीत पाता है
कुछ रईशज़ादे अपनी हवस बुझाते हैं
बेचकर बदन कोई अपना घर चलाता है
भूख दर-बदर फिरती है,प्यास में निकलता दम
मुल्क़ में ग़रीबों का ,कोई ना विधाता है
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कोई तो हिज़ाब चाहिए
हुस्न को नक़ाब चाहिए
आँखों में न आब चाहिए
अब हसीन ख़ाब चाहिए
थोड़ा सा शुरूर आपका
थोड़ी सी शराब चाहिए
खिल उठे चनार अब मेरे
ना तेरे ग़ुलाब चाहिए
ठीक से सवाल पूछ लें
ग़र तुझे ज़वाब चाहिए
दूरियाँ भले बनी रहें
वस्ल ला-ज़बाब चाहिए
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यहाँ फाँका बिताया जा रहा है
वहाँ दाना भुनाया जा रहा है
अग़र अग्यार होता, ज़ंग लड़ते
सितम अपना ही कोई ढा रहा है
किया परहेज़ मैंने आशिक़ी से
मगर चेहरा तेरा उलझा रहा है
नगर के लोग सारे डर रहे हैं
कहाँ ज़ोखिम उठाया जा रहा है
अँधेरा बढ़ रहा है इसलिए भी
चरागों को बुझाया जा रहा है
वो इक जिसकी ज़ुबाँ सच बोलती थी
उसे ज़ामिल बनाया जा रहा है
ग़रीबी को मिटाने आए थे वो
गरीबों को मिटाया जा रहा है
कहीं पर लोग प्यासे मर रहे हैं
कहीं झरना बहाया जा रहा है।
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हर ख़यालात खूबसूरत है
हुस्न की जात खूबसूरत है
उसको अच्छी नहीं लगी तो क्या
आपकी बात खूबसूरत है,
राह मुश्किल भरी गुज़र जाए
आपका साथ खूबसूरत है
खूबसूरत ज़वाब मिलते हैं
ग़र सवालात खूबसूरत है
दश्त-ए-ग़म छोड़कर चले आओ
आज की रात खूबसूरत
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शेर-ओ-सुख़न के आज वो उस्ताद हो गए
ग़ालिब के चन्द शेर जिन्हें याद हो गए
मोहताज़ दाने दाने को ,तायर भटक रहे
आलिम हमारे दश्त के सय्याद हो गए
दुनियाँ की ठोकरें, मुझे तामीर कर गयीं
फेंके हुए जो संग थे बुनियाद हो गए
चाहत के बाद कलियाँ तो ससुराल में खिलीं
भँवरे तमाम इश्क़ में बर्बाद हो गए
मालिक थे अपनी मर्ज़ी के,पर अब ग़ुलाम हैं
क़ानून क़ायदों से जो आज़ाद हो गए
दौलत के हक़ में आते हैं अब फ़ैसले सभी
मुन्सिफ़ हरामख़ोर थे जल्लाद हो गए
पाकर हज़ारों ग़म , कभी नाशाद ना हुए
तुम इक ख़ुशी चाह में नाशाद हो गए।
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दुनियाँ पे बार हो गया हूँ मैं
इतना बेकार हो गया हूँ मैं
सबका अग्यार हो गया हूँ मैं
तीर तलवार हो गया हूँ मैं
डूब जाना था मुझको दरिया में
हाँ मग़र पार हो गया हूँ मैं
मेरी सूरत को लोग पढ़ते हैं
जैसे अखबार हो गया हूँ मैं
आग में कितना और तपाओगे
अब तो औज़ार हो गया हूँ मैं
इतने इक शख़्स ने सितम ढाये
टूटकर चार हो गया हूँ मैं
कल तलक़ तो यहाँ का मुंसिफ था
अब गुनहगार हो गया हूँ मैं
इन हकीमों के पास जाने से
और बीमार हो गया हूँ मैं
इतना वाक़िब हूँ इन दुकानों से
मानो बाज़ार हो गया हूँ मैं
मैंने चाहा था होना फूलों सा
फिर भी अंगार हो गया हूँ मैं
कल मिलूँगा किसी कहानी में
आज किरदार हो गया हूँ मैं
इतना खाली हूँ बाहिर अंदर से
जैसे इतवार हो गया हूँ मैं
इश्क़ बर्बाद कर गया जबसे
दिल से ज़रदार हो गया हूँ मैं
मेरी कश्ती ज़रा सँभालो तुम
अपनी मझधार हो गया हूँ मैं।
बेख़बर कल भी था ज़माने से
अब तो फनकार हो गया हूँ मैं।
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वो नज़रें क्या मिला बैठे
हमारा दिल चुरा बैठे
नहीं है याद इतना भी
कि हम क्या क्या भुला बैठे
के जिसके पास जाना था
उसी से दूर जा बैठे
तुम्हें पाने की चाहत थी
वो चाहत भी गवा बैठे
मरज़ दिल का खुदा जाने
किसे कब क्या बना बैठे,
उसी से ज़िस्म जलता था
उसी को फिर जला बैठे
किसी मन्ज़िल को जाना था
ये किस रस्ते पे आ बैठे
अदालत हुक़्म दौलत का
किसे कब क्या सुना बैठे
हमें उस पार जाना है
हमीं कश्ती डुबा बैठे
जिन्हें चलना सिखाया था
मेरे ही पाँव खा बैठे
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जो कल तलक़ तो फ़ूल थे , अंगार हो गए
अपने ही लोग , राह की दीवार हो गए
करते थे जी-हुज़ूरी तो सब ठीक ठाक था
हक़ माँगने लगे तो गुनहगार हो गए
कुछ एक मुश्किलों से मेरा सामना हुआ
सपने कई जो ख़्वाब थे, साकार हो गए
शर्मो-हया , अदब न सलीका, हिज़ाब का
बच्चे नयी ये नस्ल के बेकार हो गए
चलने को चल रहे थे , बहुत लोग भीड़ में
मन्ज़िल उन्हें मिली जो तलबगार हो गए
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है रात लेकिन सहर तो होगी
ये आपको भी ख़बर तो होगी
शायद लगे ना ये दिल तेरे बिन
पर जैसे-तैसे बसर तो होगी
मैं भूल जाऊगां कुछ दिनों में
कुछ दिन ही ये आँख तर तो होगी
तुम ही न चाहो भले किसी को
तुम पर किसी की नज़र तो होगी
तय कर लो साहिल पे सारी बातें
दरिया के अन्दर भँवर तो होगी
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मैं जो कर सकता था किया मैंने
ज़हर चुप चाप पी लिया मैंने
ये सजा है हमारी नेकी की
ज़ुर्म हरगिज़ नहीं किया मैंने
क्या जलाते, विरान कमरा था
दीप देहरी पे रख दिया मैंने
ना मुक़म्मल हुआ , मैं उसमें भी
काम जो उम्र भर किया मैंने
क्यों हमें ज़ख़्म से डराते हो
बे-पनाह दर्द है जिया मैंने
मशविरा कर लिया बुज़ुर्गों से
जब कोई फ़ैसला लिया मैंने
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हमारे सर पे फोड़ेंगे, ये गठरी , हर मुसीबत की
अगर समझे नहीं हम, चाल इस गन्दी सियासत की
सहारा धर्म का लेकर, हुक़ूमत ये हड़प लेंगे
कहीँ दंगा कराएंगे ,कहीँ पर बात उल्फ़त की
कई पर्दे लगा कर के , ग़लत को सच बना देंगे
डराएंगे सुना कर के ,तुम्हें बातें क़यामत की
ये कट्टरपंथ वाले लोग , जीते हैं ज़हालत में
बनाते हैं ज़मीं पर लोग ये तस्वीर ग़ुरबत की
लगेगी आग बस्ती में , न कोई घर बचेगा फिर
हमें मिलकर बुझानी है, यहाँ से आग नफ़रत की
खड़ी इंसानियत के बीच, हर दीवार तोड़ो अब
लिखो बातें मुहब्बत की, करो बातें मुहब्बत की।
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कुछ बेबसी लिखो , कुछ लाचारियाँ लिखो
ग़र लिख सको, ग़रीब की मज़बूरियां लिखो
होता हुनर शिकार कैसे भेदभाव का
भाई-भतीजावाद की मक्कारियाँ लिखो
इन गिरगिटों के रंग का मौसम उकेर दो
हर मतलबी ज़मीर को दरबारियाँ लिखो
कैसे खड़ा हुआ यहाँ बाज़ार मज़हबी
इन्सानियत जो खा गयीं, बीमारियाँ लिखो
ज़ुल्मी रिवाज़ रस्म की , बुनियाद तोड़ दो
भड़का रहीं जो आग, वो चिंगारियाँ लिखो
पर्दा उठाना है तुम्हें , हर इक फ़रेब से
आम आदमी के राह की दुशवारियाँ लिखो।
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कल नज़र भर के उनको हम देखे
फिर भी लगता है जैसे कम देखे
रु-ब-रु तब हुए हक़ीक़त से
पहले-पहले तो कुछ भरम देखे
वो मुज़स्सम हसीन लगता था
चश्म देखे, तो चश्म-ए-नम देखे
शौहरतों पर फ़िदा ज़माना है
किसको फुरसत कि वो करम देखे
छेड़ मत ज़िक्र मुस्कराहट का
हर ख़ुशी ने हज़ार ग़म देखे
ज़ुल्म देखा हसीं अदाओं का
राह-ए-उल्फ़त के पेच-ओ-ख़म देखे
पत्थरों को हरीफ़ समझे थे
फ़ूल ने फ़ूल के सितम देखे
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मुझको इतना अमीर होने दे
सूर , मीरा , कबीर होने दे
डूबते को, न अब सहारा दे
यार मुझको फ़क़ीर होने दे
जब तेरी ही कमान से निकला
पार दिल के , ये तीर होने दे
बाद की बात है कि गंगा निकले
पहले पर्वत सी पीर होने दे
हुस्नदारी यहाँ टिकी किसकी
थोड़ा जर्जर शरीर होने दे
रास्तों में दीये जलाता हूँ
मेरे घर भी नज़ीर होने दे
इश्क़ मेरे तू अब जफ़ा कर ले
मुझको राँझा न हीर होने दे।
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तर्क -ए - तअल्लुकात बिगड़ते चले गए
ऐसी खिज़ां, कि दश्त उजड़ते चले गए
मज़हब किसी की जात क्या,मुद्दा फ़िज़ूल था
लाखों नबाब जंग ये लड़ते चले गए
जिसको समय के साथ, ज़रा ढलना आ गया
वो सीढियां उरूज़ की चढ़ते चले गए
जैसे-जैसे बड़े हुए आज़ादियाँ मिलीं
पर मुश्किलों में अपनी जकड़ते चले गए
ना फ़िक्र उस मुक़ाम की, ना धूप छाँव की
जिस राह पर बढ़े क़दम, बढ़ते चले गए।
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पीठ पर ख़ंजर उतारे जा रहे हैं
साज़िशों से लोग मारे जा रहे हैं
तख़्तदारी के सियासी खेल में कुछ
रब्त से इन्सान हारे जा रहे हैं
क़हर ढाया जा रहा है नेकियों पर
ज़ुल्म के सदके उतारे जा रहे हैं
इम्तिहानों में हुनर उलझा हुआ है
बे-हुनर कमज़र्फ तारे जा रहे हैं
ज़िक्र क्या गहराइयों पे , वो करेंगे
कश्तियों से जो किनारे जा रहे हैं
छोड़कर शर्मो-हया , इंसानियत को
कौन ज़ानिब लोग सारे जा रहे हैं
दिल कहीं लगता नहीं है आपके बिन
जैसे तैसे दिन गुज़ारे जा रहे हैं।
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सफ़र की मुश्किलें, चाहें बढ़ा दे
मग़र अब राह मन्ज़िल की दिखा दे
मुझे इल्ज़ाम दे , मुज़रिम बना दे
मगर उस राज से पर्दा उठा दे
बहुत चुभते हैं, ख़ंजर पीठ वाले
मेरे हर दोस्त को दुश्मन बना दे
मुअय्यन होके कह दे बात सच्ची
तरस खाकर न कोई फ़ैसला दे
ग़मों की धूप में, सब गल न जाए
पिघलती मोम को पत्थर बना दे
कि करता हो जिसे नासूर मरहम
किसी को ज़ख्म ऐसा ना खुदा दे
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लेके लम्बी कतार बैठे हैं
दर्द दिल में हज़ार बैठे हैं
कुछ ऐसे लोग भी थे अपनो में
हक़ हमारा जो मार बैठे हैं
ज़िस्म भौरों का छलनी करने को
गुल के दामन पे खार बैठे हैं
खौफ़ खाए नज़र हक़ीक़त से
ख़्वाब हम सब उतार बैठे हैं
जंग वो जीत ही नहीं सकते
लोग जो दिल से हार बैठे हैं।
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खिलते हुए ये फ़ूल हैं अंगार मत करो
मज़बूरियों पे ज़ुल्म, मेरे सरकार मत करो
मैंने कसम से छोड़ दिया, झूठ बोलना
सच बोलने से आप भी इनकार मर करो
सबकी जबीं है एक सी, सबका वही ख़ुदा
दैरो-हरम के नाम पे तक़रार मत करो
छुपती नहीं हक़ीक़त ज्यादा दिनों तलक
चेहरे बदल बदल कर किरदार मत करो
मौके हज़ार सबको तो मिलते नहीं यहाँ
तुम गलतियाँ करो पर , हर बार मत करो
सिकुड़े रहो भले तुम जाढ़े की रात में
गर्मी किसी के बाप की, स्वीकार मत करो
प्यासे हमारे चश्म , तेरे सामने खड़े
नज़रे झुका झुका के तलबगार मत करो
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निगाहों से इशारा कर बैठे
यही गलती दुबारा कर बैठे
नदी उस पार जाना था मुझे
सफीनों से किनारा कर बैठे
ख़ुशी उसको मिले बस इसलिए
सितम सारे गवारा कर बैठे
यकीं तोड़ा, किया बर्बाद भी
भरोसा क्यों तुम्हारा कर बैठे
मुहब्बत एक गोरख धंधा है
नफ़ा छोड़ो, ख़सारा कर बैठे
कहीं भटके बहुत हम प्यास में
कहीं शबनम शरारा कर बैठे
मुसीबत में बचाया था जिन्हें
ज़िगर छलनी हमारा कर बैठे।
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फ़िर मेरा इम्तहाँ ख़ुदा जाने
कौन है मेहरबाँ ख़ुदा जाने
उम्र अपनी कटी अँधेरों में
धूप की दास्ताँ ख़ुदा जाने
घर से निकले थे सब इबादत को
क्यों लुटा कारवाँ ख़ुदा जाने
चाँद तनहा है लाख तारों में
चीज क्या आसमाँ ख़ुदा जाने
जन्म-जन्मों की बात क्या करना
कब तलक़ ज़िस्म-जाँ ख़ुदा जाने
धर्म , पैगाम था मुहब्बत का
क्यों उठी तल्खियाँ ख़ुदा जाने
तन-बदन सब मशीन लगते हैं
आदमी है कहाँ ख़ुदा जाने।
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माँ बाप क्या मरे हुई अग्यार की नौबत
आँगन में आ गई ख़लिश दीवार की नौबत
जिसका ज़मीर बिक गया, दरमाँ मिला उनको
ज़िन्दा ज़मीर को पड़ी बीमार की नौबत
मुश्किल है वक़्त तो, ज़रा धीरज बनाए रख
पतझर के बाद आनी है गुलज़ार की नौबत
अक्सर ग़रीब लोगों पर दुनियाँ ने ज़ुल्म किया
ले आयी भूख ज़िस्म के व्यापार की नौबत
इतिहास में अतीत की तस्वीर है ज़ख़्मी
आए कभी न मुल्क़ में तलवार की नौबत
ठहरा तुम्हारे शहर में बरसात का मौसम
आयी हमारे गाँव पर अंगार की नौबत
नज़रें हसीन हुस्न का मन्ज़र उठा लायीं
दिल पर न आ पड़े कहीं अब प्यार की नौबत
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छोड़ दे या तो फ़िर मुहब्बत कर
आज दिल कह रहा बग़ावत कर
रब की मर्ज़ी से चलती हैं साँसे
ज़िस्म दरगाह है इबादत कर
किसलिए जा रहा मदीना तू
घर में माँ बाप हैं खुशामत कर
हक़ कोई प्यार से कहाँ देगा
तू भी ख़ंजर उठा हुक़ूमत कर
दिन गए नेकियों के बीत सभी
दश्त बाज़ार है तिज़ारत कर।
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बात मुमकिन थी चार नज़रों की
उनको देखे कतार नज़रों की
रात उकता गई है पतझर से
दिन पे छायी बहार नज़रों की
दिल गुनहगार क्यों निकलता है
गलतियाँ बार बार नज़रों की
तुमनें देखे नदी समन्दर कुछ
मैंने देखी मज़ार नज़रों की
हाँ तेरा इंतजार करती है
एक सूनी दयार नज़रों की
बात कुछ और लब से बोले वो
हमनें सुन ली गुहार नज़रों की
फूँस का घर था इस मुहब्बत का
आँधियाँ बेशुमार नज़रों की।
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सब सूरज चाँद सितारे हैं
फ़िर भी ज़िन्दा अँधियारे हैं
अब छोड़ो तुम भी भाईचारा
होते घर घर बटवारे हैं
कुछ लोगों का बैनामा है
लोग कई डेरा डारे हैं
सारे काम हैं धीरज वाले
जल्दी जल्दी सब पारे हैं
अब ना वैसी गालियाँ कूचे
अब ना वैसे चौबारे हैं
बस्ती तो है उजली उजली
दिल से लेकिन सब कारे हैं
रोज पिएं मीठी नदियों को
फिर भी सागर सब खारे हैं
मछली के जैसी है जनता
सत्ता वाले मछुआरे हैं
वक़्त कहाँ हैं इन शहरों में
गाँवों वाले सरतारे हैं
पर जंग अभी भी जारी है
जीते वो कुछ हम हारे हैं
हफ़्ते भर पहले आना था
नेता जी आज पधारे हैं
ये मन्दिर मस्ज़िद गिरजाघर
मानवता के हत्यारे हैं।
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फ़ूल में रंगत रही ना, अब शज़र आबाद है
नफ़रतों की आँधियाँ हैं , हर कली नाशाद है
कल तलक़ तो बागवां , अंग्रेज कुछ चंगेज़ थे
अब सियासत की बदौलत बाग ये बर्बाद है
लोग जो मज़बूत हैं, शोषण करें कमज़ोर का
आदमी ही है परिन्दा, आदमी सय्याद है
नेकियाँ और आदमी , किस्सा पुराना हो गया
अब ख़ुदा के नाम से ही , हो रहा बेदाद है
क़ौमवादी भावना कुछ नफ़रतें कुछ तल्खियाँ
कुछ सियासी रंग है, कुछ मज़हबी ईज़ाद है
बुलबुला जाने कहाँ , ये फूट जाए बेख़बर
चम-चमाते कटघरों की खोखली बुनियाद है
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आगे पीछे दाएं बाएं ये सिलसिला चलता रहा
कुछ मुश्किलों के साथ अपना राब्ता चलता रहा
अक़्सर मुसाफ़िर आदमी गिर गिर उठा चलता रहा
होते रहे कुछ फ़ैसले कुछ मशविरा चलता रहा
मैंने किया सबके लिए जितना भी हमसे हो सका
नज़दीकियाँ पायीं कहीं पर फ़ासला चलता रहा
कुछ बावली सी हो गईं उन रास्तों की मुश्किलें
जब पाँव अपने थक गए तो हौसला चलता रहा
सारे जहां की जानकारी हमने रखना छोड़ दी
जितनी ज़रूरत थी मुझे उतना पता चलता रहा
किसको मिले लम्हें सुकूँ के ज़िन्दगी में बेख़बर
ज़िन्दा रहा जब तक बशर इक मुब्तिला चलता रहा।
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दौलत ख़ातिर दुश्मन, भाई हो जाएंगे
इक दिन सब के सब हरजाई हो जाएंगे
जिस दिन बाहर निकला सूरज सच्चा कोई
झूठों के सब पर्वत राई हो जाएंगे
यदि तुम मतलब के ख़ातिर कलियाँ तोड़ोगे
फूल सदी के सब सौदाई हो जाएंगे
उल्टा सीधा दौड़ रहे जो आगे आगे
पाँच पे जाकर फिर से ढाई हो जाएंगे
तुम जब जब डगमग होगी दुनियाँ की धुंध में
हम तब तब तेरी बीनाई हो जाएंगे।
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ख़्वाब तो ख़्वाब हैं कुछ भरम और हैं
आइनों के सिवा , एक हम और हैं
क्या हुआ ना मिली मुझको मन्ज़िल यहाँ
मेरे जैसे सफ़र में क़दम और हैं
दिल जगह है इबादत की सबके लिए
कौम वालों के ख़ातिर हरम और हैं
फिर कभी ज़ुल्फ़ तेरी सवारेंगे हम
ज़िन्दगी में अभी पेच-ओ-ख़म और हैं
कर सको तो दीयों की हिफाज़त करो
आँधियों के अलावा सितम और हैं
कुछ न खोने का ग़म, ना कोई ज़ख्म है
बेख़बर अपने दिल के अलम और हैं।
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अपनी हक़ीक़तों को छिपाते कहाँ कहाँ
हम ओढ़कर लिबास ये जाते कहाँ कहाँ
सर को मिली तसल्ली जो तकिया बना लिया
चादर फटी हुई थी बिछाते कहाँ कहाँ
उसने किया किनारा तो मैंने भी कर लिया
हर बार फ़र्ज़ हम ही निभाते कहाँ कहाँ
मन्ज़िल नहीं फ़क़त मैंने रस्ता बदल लिया
पत्थर तेरी डगर के उठाते कहाँ कहाँ
पैदा करे जो नूर वो तरक़ीब ढूंढ ली
इस दश्त में चराग़ जलाते कहाँ कहाँ
करनी थी जिसकी बन्दगी दिल में बसा लिया
सर अपना बुतकदों में झुकाते कहाँ कहाँ।
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आश का ये दीया फिर जला देर तक
ताकते हम रहे रास्ता देर तक
नाम लिखकर तेरा चूम मैंने लिया
मुझपे छाया रहा इक नशा देर तक
ख़ूब सूरत न हो हुस्न इतना कोई
जो भी देखे उन्हें देखता देर तक
राह में लड़ गई इक हसीं से नज़र
दिल की दहलीज़ पर कुछ हुआ देर तक
बेख़बर बावफ़ा या जफ़ा हो सनम
चलता है इश्क़ में सिलसिला देर तक।
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रोज गिरते हुए सँभलते हैं
दिल में अरमां बहुत मचलते हैं
जानती हैं फ़क़त मेरी आँखें
कतरा-कतरा जो हम पिघलते हैं
ख़ौफ़ तो सबको है हवाओं का
जलने वाले चराग़ जलते हैं
इश्क़ का रोग लग गया शायद
करवटें रात भर बदलते हैं
रख हुनर तीरगी का आँखों में
रोज जुगनू कहाँ निकलते हैं
जाने किस ओर है मेरी मन्ज़िल
जाने किस ओर पाँव चलते हैं
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हर मोड़ पर मिले ग़म इस ज़िन्दगी में अक्सर
दिल ने फ़रेब खाये हैं दोस्ती में अक्सर
पहचान झूठ, सच की आसान अब कहाँ है
लाखों नक़ाब मिलते हैं इस आदमी में अक्सर
फ़िर तेरे जुगनुओं पर कैसे यक़ीन कर लें
हम राह भूल जाते हैं रौशनी में अक्सर
जाना हमें जहाँ पर कुछ पहले चाहिए था
लेकिन वहाँ भी पँहुचे हम आख़िरी में अक्सर
ऊपर की साज-सज्जा पर , मत यकीन करना
अच्छा दिखाया जाता है बानगी में अक्सर।
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रुख ज़िन्दगी का ऐसे भी कुछ मोड़ता रहा
जो छूटता गया मैं उसे छोड़ता रहा
किरदार अस्ल खो गया दुनियाँ की भीड़ में
लाखों लिबास ज़िस्म मेरा ओढ़ता रहा
इल्ज़ाम बे-गुनाह पे आया है क़त्ल का
मासूम फ़ूल और कोई तोड़ता रहा
चलना सँभल सँभल के तो आया न अब तलक़
वो ज़िन्दगी की रेश कहाँ दौड़ता रहा
मज़बूरियाँ ले जाती थीं बाज़ार ज़िस्म को
पर कोई मेरी रूह को झिंझोड़ता रहा
हर आग नफ़रतों की मुहब्बत से बुझ गई
मैं आदमी को आदमी से जोड़ता रहा।
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थोड़ा बहुत तो गिला करेंगे
हम राह में जब मिला करेंगे
शायद ज़ुबाँ से बात निकले
कहने का फ़िर हौसला करेंगे
जब घेर लेगा, तुम्हें अँधेरा
हम नूर बन के जला करेंगे
आये न आये, वो ऋतु सुहानी
कुछ फूल फिर भी खिला करेंगे
जब जब लकीरों की बात होगी
हम हाँथ अपने मला करेंगे
वो शख़्स सब कुछ भुला चुका है
ये आप कब फैसला करेंगे
वादों पे अपने जो टिक सके ना
वे लोग किसका भला करेंगे।
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हर काम इबादत का बाज़ार बना डाला
ये ज़िस्म हकीमों ने बीमार बना डाला
जब बाग ये खिलते थे दिन रात महकते थे
मासूम से फूलों को क्यों खार बना डाला
आपस में लड़ाया सब को,जाति धरम करके
ये मुल्क़ सियासत ने अग्यार बना डाला
ये कैसी लगन लागी, कुछ सूर कबीरों को
अलमस्त फ़कीरी ने ज़रदार बना डाला
मज़बूर नहीं थे तुम , बर्बाद हुए फिर क्यों
हमकों तो मुहब्बत ने बेकार बना डाला
थामी है क़लम जबसे , ज़ज़्बात उकेरे हैं
कुछ राज की बातों को अखबार बना डाला।
0
इश्क़ में देखे थे दिल ने बेख़ुदी के चार दिन
ज़िन्दगी से हो गए हैं, वो ज़िन्दगी के चार दिन
पार कर डाले कई सहरा हमारे पाँव ने
और दरिया नें दिखाए तिश्'नगी के चार दिन
भूल ना पाए कभी हम मुश्किलें शुरुआत की
दुनियाँ भर ने याद रक्खे आखिरी के चार दिन
आप के सज़दे इबादत, आप की ही कैफ़ियत
कर गए काफ़िर हमें वो बन्दगी के चार दिन
पास अपने मयकदा था, जाम था और प्यास थी
ना हुए हमको मयस्सर मयकशी के चार दिन
चाँद ,सूरज और सितारों से कराया रु-ब-रु
भूल कैसे जाऊं मैं वो तीरगी के चार दिन
बेख़बर कॉलेज वाले दिन पुराने खो गए
ज़हन में अब भी हैं ताजा दोस्ती के चार दिन।
0
जो बिक रहे थे लोग , ख़रीदार हो गए
मतलब परस्त जब से, ये बाज़ार हो गए
ईमान वाले मुल्क़ में अब भी हैं दर-बदर
जिसने ज़मीर बेचा , ज़मींदार हो गए
ज़ुल्मों-सितम का अक्सर अंज़ाम ये हुआ
रौंदे हुए जो फूल थे अंगार हो गए
रस्ते सजाये जब तक ,सब ठीक ठाक था
मन्ज़िल को चल पड़े तो गुनहगार हो गए
बतला रहे हैं ख़ुद को, समन्दर का बादशा
जो कश्तियों पे बैठ के उस पार हो गए
हम उल्फ़्तों की राह में नादान हैं अभी
अच्छा हुआ जो आप समझदार हो गए
ये मयक़दे क्या जाने, कि क्या चीज है नशा
हम लोग शायरी के तलबगार हो गए।
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कथनी जैसी करनी हो , आसान कहाँ
अँधियारों में जलते अब लोबान कहाँ
साँसे, तन ,मन, धड़कन सब बाज़ार हुए
मतलब के किरदारों में इन्सान कहाँ
नेकी करने वालों का सहयोग करो
अब धरती पर आते हैं भगवान कहाँ
चुपके चुपके सारी बातें सुनता है
दीवारों पर दिखता कोई कान कहाँ
जब , कब फ़र्ज़ निभाते हैं मोबाइल से
घर में आते जाते अब मेहमान कहाँ
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बाग बदलो, ये वो बागबानी नहीं
चार दिन की मुहब्बत कहानी नहीं
लाख शिकवे गिले , दर्द इसमें हैं पर
ज़िन्दगी इश्क़ बिन ज़िन्दगानी नहीं
मन्ज़िलों की अज़ीयत तुम्हें क्या पता
ख़ाक सड़कों की तुमने तो छानी नहीं
कुछ बुज़ुर्गों के दिल हैं अभी तक जवाँ
हर जवां आदमी में जवानी नहीं
दिल किसी का नहीं तोड़ना बेख़बर
आग बहती है आँखों से पानी नहीं।
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मिलने मिलाने वाले हालात ना रहे
अब आदमी के अन्दर ज़ज़्बात ना रहे
बस्ती कोई मुहल्ला या घर उजाड़ दे
रब ,आँधियों की इतनी औकात ना रहे
महलों में शौक से, वो सूरज उगे मगर
दिन को हमारी बस्ती में रात ना रहे
बचपन के दिन सुहाने थोड़े से याद हैं
बीते पलों के और ख़यालात ना रहे
जन्मों-जनम की बातें करते थे बेख़बर
वो मुश्किलों में दो पल भी साथ ना रहे।
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बे-गुनाहों पे इल्ज़ाम डाला गया
इस तरह कातिलों को सँभाला गया
इक ग़रीब आदमी, इक अमीर आदमी
कोई सिक्का नहीं फिर उछाला गया
सब के सब इसके मतलबी किरदार हैं
कौन साँचे में इन्सान ढाला गया
बोलबाला रहा चार दिन झूठ का
दूर तक सच का अक्सर उजाला गया
चश्म से जो बहा, उसकी गिनती हुई
बे-पनाह दर्द, दिल में पाला गया
ज़ुर्म अपना छिपाने यहाँ बेख़बर
कोई मस्ज़िद तो कोई शिवाला गया।
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हाँ बहुत कुछ मुहाल रहा उम्रभर
और तेरा ख़याल रहा उम्रभर
चूमकर लब मेरे तुम क्या कर गए
ख़ून में इक उबाल रहा उम्रभर
ज़िन्दगी भर कोई ग़म , टिक ना सका
ग़म यही बे-मिसाल रहा उम्रभर
तुमको पाया नहीं, अफ़सोस है मगर
इश्क़ तेरा कमाल रहा उम्रभर
क़ाफ़िया से रदीफ़ मिलाते रहे
शायरी में , बवाल रहा उम्रभर
लोग मिलते बिछड़ते रहे बेख़बर
क्या बताएं, क्या हाल रहा उम्रभर।
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कहाँ और जाऊँ शज़र आखिरी था
तेरी शाख पर मेरा घर आख़िरी था
बहुत आज़माया समझ कर के पहला
मुहब्बत का मुझमें , हुनर आख़िरी था
न महसूस होता , कई साल से कुछ
क्या दिल पे ,तुम्हारा असर आखिरी था
नहीं कोई मतलब मुझे आसमाँ से
मेरी ज़ीस्त का तू क़मर आख़िरी था
न अब खौफ़ कोई रहा ज़िन्दगी को
तुम्हें खोने का था, वो डर आख़िरी था।
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नए रास्ते कुछ बनाये चलो तुम
क़दम चल पड़ें हैं ,चलाये चलो तुम
सुनों मत,बहस आसमाँ की सियासी
मुद्'दआ ज़मीं का,उठाये चलो तुम
है मुमक़िन सफ़र में अँधेरा घना हो
नज़र को तज़ुर्बे सिखाये चलो तुम
नई सूरतें , सामने आएंगी कुछ
गुनाहों से पर्दा उठाये चलो तुम
क़लम का हुनर सबको मिलता कहाँ है
चरागे - सुख़न ही जलाये चलो तुम।
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क्या दें इल्ज़ाम बहते धारों पर
नाव डूबी मेरी किनारों पर
ना भरे थे, पुराने ज़ख़्म अभी
गाज फिर गिर पड़ी फ़िगारों पर
तुम अगर ज़ख़्म, भर नहीं सकते
डाल दो , ख़ाक ही दरारों पर
प्यास में दम ,निकल गया उनका
नाज़ था जिनको आबशारों पर
उसकी सूरत का ज़िक्र क्या करना
ज़ुल्फ़ भारी पड़ी बहारों पर।
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दोस्ती अब कहाँ दोस्ताने कहाँ
दिन गए यारियों के, न जाने कहाँ,
बेसबब लोग मिलते नहीं प्यार से
खो गए नेकियों के ज़माने कहाँ,
बेच डाले,कुएँ उसने ताज़िर को सब
प्यास मज़लूम जाए बुझाने कहाँ,
क़ैद हैं ज़िस्म के दायरों में सभी
दिलजले रूह के अब दिवाने कहाँ,
बेवज़ह ढूँढ़ता फिर रहा बेख़बर
अब यहाँ चाहतों के ठिकाने कहाँ।
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के सारे दश्त का आलम हदे-वीरान हो जाता
अगर झोंका हवा का , मुंक़लिब तूफ़ान हो जाता
ज़रा सा मिल गया होता , सहारा बे-सहारों को
हया , हमदर्द फ़ितरत का अगर इन्सान हो जाता
न छिपकर वार करते तुम, न छिपकर वार करते हम
जो अपना सामना इक दिन, सरे- मैदान हो जाता
जहां है आज मुश्किल में कोई जलवा दिखा , मौला
ख़ुदाया फिर से दुनियाँ पर तेरा एहसान हो जाता
भटकते ही कहीं ये उम्र अपनी बीत ना जाये
अगर तुम साथ देते तो सफ़र आसान हो जाता
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खौफ़ ज़दा था मन्ज़र सारा
बहने लगी थी उल्टी धारा
हमनें फिर तलवार उठाई
कब तक सहते ज़ुल्म तुम्हारा
सर को मेरे पता है सब कुछ
पत्थर किसने किसने मारा
साथी तुमको कैसे कह दूं
बाँट सके ना दर्द हमारा
फिर क्यों मुझको छोड़ दिया है
सुनता है सब की पालनहारा
फेल हुई हर चारासाज़ी
भर ना पाया ज़ख़्म हमारा
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हालाँ कि सबका बयाँ नहीं है
किस आदमी को गुमाँ नहीं है
दिल में यहाँ, या वहाँ नहीं है
ये रोग उल्फ़त कहाँ नहीं है
इक दर्द ,जो बढ़ रहा मुसलसल
ज़ख़्म है कि नामो-निशाँ नहीं है
कोई ख़बर, या पता दे अपना
दिल ढूढ़ता तू जहाँ नहीं है
ख़ामोश हैं ज़ुर्म, देखकर सब
मुँह में किसी के ज़बाँ नहीं है
कीमत चुका के ,जो आओ-जाओ
ये दिल मेरा, रेस्तराँ नहीं है
कुछ शायरी में बयाँ हुआ हूँ
अपनी कोई दास्ताँ नहीं है।
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उसकी हाँ है, या ना पता कीजिए
जल्द मसला रफा - दफा कीजिए
माना टलती बला, दुआ करने से
ज़ख़्म ही है तो फिर दवा कीजिए
मौन रहना भी इतना अच्छा नहीं
बात कहनी हो जब कहा कीजिए
हो न जाएं ग़लत, सही फ़ैसले
वक़्त रहते ही, फ़ैसला कीजिए
वैसे ख़ुद को चराग़ कहते हो तुम
तीरगी में कभी जला कीजिए।
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जोबन मेरा मत तड़पना
फिर से सजन परदेश न जाना
अक्सर वो ही ,खो जाता है
दिल ये चाहे जिसको पाना
ग़लती, कारण, फ़र्ज़ या वादे
मैं भूलूँ , तुम याद दिलाना
कुछ यारों से अच्छा निकला
दुश्मन को जब हमनें जाना
किस ज़ालिम ने, मारा पत्थर
पंछी ढूँढ रहा था दाना।
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दरमियाँ फ़ासला नहीं होता
इश्क़ में ज़ायक़ा नहीं होता
फूल होते मेरे दरख़्तों पर
तू अगर बेवफ़ा नहीं होता
चारासाज़ों की चारासाज़ी से
दर्द दिल का हवा नहीं होता
या लबे-प्यास ना जगाते तुम
या तो फ़िर मयकदा नहीं होता
इश्क़ के दर्द भी मज़ा देते
हर सितम एक सा नहीं होता
हीर-राँझा कोई हुआ मजनूँ
इश्क़ में क्या से क्या नहीं होता
सच की अपनी अलग बुलन्दी है
घर कोई झूठ का नहीं होता
सायबानों को बात मालुम थी
धूप का रास्ता नहीं होता
मैंने छूकर लबों से देखा कल
जाम इतना बुरा नहीं होता।
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उलझनें ही उलझनें हैं, ना ही कुछ आबाद है
दिन-ब-दिन की मुश्किलों से ज़िंदगी नाशाद है
दर-बदर फिरते परिन्दें, कफ़्न सर पर, बांध कर
बेबसी है भूख की ,पर हर तरफ़ सैय्याद है
लोग लाखों हैं यहाँ पर मुफ़लिसी की कैद में
बस्तियाँ हैं तीरगी में , रौशनी आज़ाद है
ज़ुर्म , शोषण , घूसखोरी ,जैसे हो प्रशासनिक
नेकियों के नाम पर, अब हो रहा बेदाद है
दूर मीलों हो गया, इंसानियत से वास्ता
आदमी के ज़हन में, इक मज़हबी उन्माद है
भीड़ दौड़ी जा रही हैं कहकशाँ को देखकर
ऊँचे-ऊँचे गुम्बदों की ,खोखली बुनियाद है
चन्द पैसों के लिए , ईमान का सौदा करे
आदमी के नाम पर, वो शख़्स इक जल्लाद है
बढ़ गयीं दुश्वारियां , दीदार कर के आपका
ज़िस्म तो बर्बाद था, अब जान भी बर्बाद है
चाटुकारी सभ्यता , हमनें बनायी बेख़बर
धर्म का झगड़ा कहीं , भाई-भतीजा वाद है।
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रौशनी से भले ही मिला कुछ नहीं
चाँद सूरज से हमको गिला कुछ नहीं
हौसला देखकर बर्क़ टल जाएगी
हाँथ में है , हुनर तो बला कुछ नहीं
कट गई उम्र , ना दायरे कम हुए
दो क़दम का वैसे , फ़ासला कुछ नहीं
लड़ रहे एक-दूजे से हम रात-दिन
ये मज़ा है कि था, मसअला कुछ नहीं
एक हम हैं, जो सब कुछ लुटा बैठे हैं
और उनका अभी फ़ैसला कुछ नहीं
ख़ूब लिक्खो- पढ़ो, कुछ तरक़्क़ी करो
लड़कियाँ ताकने में भला कुछ नहीं
दर-बदर घूमकर देख लो बेख़बर
तेरा , मेरा सिवा मरहला कुछ नहीं।
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नहीं काम आए रज़ा के सहारे
लुटे लोग अक्सर वफ़ा के सहारे
चराग़ों को पहले, बुझाती रही है
मगर जल रहे अब, हवा के सहारे
ये ख़ुद, पार कश्ती लगानी पड़ेगी
न अब तुम रहो, नाखुदा के सहारे
कि मर जाएं ,ऐसे सताए ज़माना
मग़र जी रहे हम ख़ुदा के सहारे
हुनर हाँथ लेकर,जिओ अपने दम पर
हैं फ़र्ज़ी सभी आशना के सहारे।
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उलझे प्रश्'नों का हल देता है
मन्ज़र, वक़्त बदल देता है
अपनी ग़लती से भीगे तुम
पहले वो बादल देता है
बीते पल से जिसने सीखा
आज से अच्छा कल देता है
फिर भी वो मझधार बनाए
कश्ती को साहिल देता है
राह से मंज़िल तक ले जाए
और किसी को कुचल देता है
जैसी करनी वैसी भरनी
सबको सबका फल देता है
छीनी प्यास हमारी तुमने
वो नदियों को जल देता है
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घबरा रहे हैं , ये देख मन्ज़र
ख़ुद को समझते थे, जो सिकन्दर
मैं जनवरी लाख, याद कर लूँ
पहले मग़र आएगा दिसम्बर
मत छोड़ देना, यूँ दाना-पानी
हो जाएगी ये ज़मीन बंजर
तालाब से आए ,हो नदी में
है दूर थोड़ा , अभी समन्दर
मुझको तू आशिक़ बना ले अपना
मैं बन न जाऊं , कहीं क़लन्दर।
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लोग कितने खफ़ा हो जाते हैं
सच का मुद्'दा अगर उठाते हैं
क़ाफ़िलों पर यकीन मत करना
राह में साथ छूट जाते हैं
मुझपे इल्ज़ाम है , डुबोने का
जबसे हम , कश्तियाँ बनाते हैं
एक ही, है मुक़ाम हम सब का
दफ़्न करते , कहीं जलाते हैं
ख़ुद सँभलते हैं , चोट खाकर जो
लोग मन्ज़िल वही बनाते हैं
घर के बच्चों को, कुछ नहीं मालुम
पापा कैसे , ये घर चलाते हैं
बेख़बर , शेर यूँ नहीं बनते
वक़्त तन्हा बहुत बिताते हैं।
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तुम्हें आगे निकलना चाहिए अब
क़दम कुछ तेज चलना चाहिए अब
भरोसा जुगनुओं का छोड़ दो तुम
दीया हर रात जलना चाहिए अब
हज़ारों बस्तियों का, है तक़ाज़ा
बदी का बुर्ज़ ढलना चाहिए अब
वही भेंड़ें , वही लाठी, वही सर
यहाँ मन्ज़र बदलना चाहिए अब
सहोगे ज़ुल्म कब तक ज़ालिमों का
रगों में खूँ उबलना चाहिए अब
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खंज़र यहाँ कुछ और थे, डर ज़ख़्म का कुछ और था
पहले सनम इस दर्द का, इक ज़ायका कुछ और था
उनको मुहब्बत थी बहुत, हमको ख़बर ही ना हुई
मिलते तो हम पहले भी थे, पर वास्ता कुछ और था
कुछ दायरे ना कम हुए, कुछ दूरियाँ ना मिट सकीं
वो पास आये जिस्म के , पर फ़ासला कुछ और था
छलके हुए दो जाम थे , लेकिन नज़र में प्यास थी
उनके लबों का शोख़ चँचल, मयकदा कुछ और था
हर आदमी की शक़्ल क्या, तस्वीर भी कुछ और थी
कुछ वक़्त पहले,ज़िन्दगी का, फ़लसफ़ा कुछ और था
कहने को अपने साथ तो सारे जहाँ की भीड़ है
माँ -बाप ज़िन्दा जब तलक़ थे, आसरा कुछ और था
गाहे - बगाहे उम्र भर फ़िरते रहे हम बेख़बर
जो जानिबे- मन्ज़िल गया, वो रास्ता कुछ और था।
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अब शाम ढल रही है तुम याद आ रहे हो
ये रात खिल रही है तुम याद आ रहे हो
किस बात की सजा है, किस बात का तकाज़ा
हर बात खल रही है तुम याद आ रहे हो
किरदार तेरे ख़ातिर ,बदले थे जाने कितने
दुनियां बदल रही है तुम याद आ रहे हो
तुम साथ थीं तो कितना,आसान था समन्दर
कश्ती मचल रही है तुम याद आ रहे हो
घर जाने कितने तुमने, जलते हुए बुझाए
फिर आग जल रही है तुम याद आ रहे हो
सावन, घटा , बहारें सब तुमको ही पुकारें
ये ऋतु बदल रही है तुम याद आ रहे हो।
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थोड़ा और सहारा दे दो
इस कश्ती को किनारा दे दो
ख़्वाब तलक़ हैं धुँधले अपने
धूप सा कोई नज़ारा दे दो
भूखे उठ कर पापा बोले
बच्चों को दोबारा दे दो
अपने घर में जुगनू हैं कुछ
उसको चाँद हमारा दे दो
कुछ पानी लेकर सागर से
सूखी नदी को धारा दे दो।
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कोई झूठ बोले कोई छल रहा है
ये राहे-सितम क्यों जहाँ चल रहा है
ऐसा भी नहीं है, कि अच्छा न हो कुछ
ये माना समय कुछ बुरा चल रहा है
सदा बे-हुनर अपनी किस्मत पे रोये
हुनर का ज़माना मुसलसल रहा है
यहाँ सच के जैसी कहाँ चीज कोई
उरुज़ो पे जाकर जहाँ ढल रहा है
के जिस फ़ैसले का, था आना ज़ुरूरी
मुद्'दआ वही आजकल टल रहा है
बुझाना हवाओं के बस में नहीं है
जहाँ पर समय का दीया जल रहा है
बताते तो हमकों ख़तायें हमारी
यूँ जाना तुम्हारा बहुत खल रहा है
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उसकी उल्फ़त में ये नज़ाकत है
हुस्न अच्छा है पर क़यामत है
बर्क़ , बादल, भरम घटाओं के
यह उसी ज़ुल्फ की शरारत है
संग तुम पर गिरा तो क्या होगा
हमको तो हादसों की आदत है
दबदबा है कहीं चराग़ों का
घर कोई रौशनी से रुखसत है
नफ़रतें कब तलक उठाओगे
इश्क़ इस आदमी की फ़ितरत है।
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दिल-ए-यार का आसरा ढूँढता है
मरज़ , इश्क़ का अब दवा ढूँढता है
कहीं लोग मशगूल हैं क़ुर्बतों में
कहीं आदमी फ़ासला ढूँढता है
उन्हें पत्थरों ने सँवारा है पहले
नज़र का जिन्हें आईना ढूँढता है
अँधेरे अभी हैं पुराने भरम में
हवा , अब समय का दीया ढूँढता है
जिया भर गया इस ज़माने से जिसका
वही आदमी बस ख़ुदा ढूँढता है
कहाँ मन्ज़िलों की तरह गुम हुई तुम
दीवाना तुम्हारा पता ढूँढता है।
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मौजों वाली नाँव अलग है
मंज़िल वाला पाँव अलग है
शहर तुम्हारा अच्छा अच्छा
फिर भी अपना गाँव अलग है
प्यारी होगी जन्'नत लेकिन
माँ का आँचल ठाँव अलग है
करले कोशिश कितनी भी कोयल
कौआ करता काँव अलग है
घर में पंखा कूलर है पर
बरगद वाली छाँव अलग है
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ये कैसी मुझसे हुई ख़ता है
हर एक मौसम खफ़ा खफ़ा है
खिली हुई हर कली से पूछो
जमाल क्या है बहार क्या है
अभी तो मैंने दीये जलाये
अभी अभी फिर उठी हवा है
नज़र तुम्हारा ही ख़्वाब देखे
नहीं ये चाहत तो और क्या है
ये दिल कहाँ तक सवाल पूछे
बता दे तेरा जबाब क्या है
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इसलिए सोगवार रहते हैं
पास ही ग़म-गुसार रहते हैं
जबसे देखा मरज़ हकीमों ने
दर्द, दिल पे सवार रहते हैं
फ़िक्र दीदार की करे पत्थर
आईने आर - पार रहते हैं
उनसे सीखो हुनर हिफाज़त का
फूल में जो भी ख़ार रहते हैं
मात खाए हुये मुहब्बत के
मुद्दतों बे- क़रार रहते हैं
0
जल रही है ज़मीं थोड़ी बरसात दे
इक झलक ही सही पर मुलाकात दे
आँधियाँ नफ़रतों की बहुत उठ चुकीं
मुल्क़ को अब मुहब्बत के हालात दे
हम ग़रीबों को हसरत कहाँ चाँद की
है अँधेरा बहुत चाँदनी रात दे
अपने साँचे में भर थोड़ी शर्मो-हया
और माटी के पुतले को ज़ज़्बात दे
काम आना मुसीबत में तू बेख़बर
कुछ जरूरी नहीं उम्रभर साथ दे
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बहारों न बागों न राहों में मिलते
सुहाने से मौसम जो गाँवों में मिलते
किताबों के भीतर कहाँ हर हुनर है
बहुत से तज़ुर्बे बालाओं में मिलते
हमें आइनों की ज़रूरत न पड़ती
अगर हम तुम्हारी निग़ाहों में मिलते
कहाँ ठीक होता , मरज़ आदमी का
कई ज़हर अब ख़ुद दवाओं में मिलते
न काशी , न क़ाबा , न ज़न्नत किसी में
ख़ुदा के कई रूप माँओं में मिलते
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जाने कितने सबक सिखाती है
हर क़दम जीस्त, आजमाती है
ख़ूब उस पार भी गई लेकर
मौज़ जो कश्तियाँ डुबाती है
साये टिकते नहीं दरख्तों के
उम्रभर धूप आती जाती है
नींद पागल कहीं न हो जाए
याद इक रातभर जगाती है
इश्क़ फ़ितरत कहाँ बदलता है
महज़ उम्मीद टूट जाती है
0
किसने किया आघात न पूछो
ज़ख़्मी हैं ज़ज़्बात न पूछो
मन के बादल समझो पहले
आँखों की बरसात न पूछो
फ़िर ज़ख़्म हरे हो जाएंगे
तुम फिर से वही बात न पूछो
हर करवट जिसकी घायल हो
कटती कैसे रात न पूछो
होगा कोई दोस्त पुराना
खायी किससे मात न पूछो
देना हो तो दे दो रोटी
मुझसे मेरी जात न पूछो
0
धर्म की जाति की मारा-मारी यहाँ
मौज में मौलवी है पुजारी यहाँ
उम्र बीती हुनर को भटकते हुए
मंज़िलें पा रही चाटुकारी यहाँ
हाथ मज़लूम के हथकड़ी डाल दी
चोर चोरी करे बारी-बारी यहाँ
फ़ैसले अब सुनाती है सरकार सब
बस अदालत करे हुक़्म जारी यहाँ
आम जनता परेशान है बेख़बर
हो गई अब सियासत शिकारी यहाँ
0
कोई ना कोई उम्मीद पाले रहो
ज़िन्दगी का समन्दर खँगाले रहो
कौन जाने, कहाँ वक़्त जाए बदल
आरजूओं को अपनी सँभाले रहो
ना करो नफ़रतों की सियासत यहाँ
इश्क़ वाले हो, तो इश्क़ वाले रहो
दाग़ लगने न पाए कभी रूह पर
ज़िस्म से चाहें गोरे या काले रहो
कोई दौलत कहाँ हैं, सुकूँ से बड़ी
नेकियाँ अपनी दरिया में डाले रहो
कुछ ज़रूरी नहीं की, हिमालय ही हो
आप गंगा ज़मीं से निकाले रहो
0
अस्ल था जो , ज़माने को भाया नहीं
अपना किरदार हमनें सजाया नहीं
घर में महफ़िल सजाने से क्या फ़ायदा
दीप देहरी पे तूने जलाया नहीं
ज़ुल्म बढ़ता रहा ,लाज लुटती रही
कोई करतब ख़ुदा ने दिखाया नहीं
ना कोई दरमियाँ अपने दीवार थी
फ़िर भी तुमनें गले से लगाया नहीं
प्यार में खा लिए मैंने धोखे मगर
दिल ने चाहा जिसे आज़माया नहीं
0
जनता हो कंगाल बराबर
नेता माला माल बराबर
दुनियाँ ठोके ताल बराबर
घर की मुर्गी दाल बराबर
आले दर्ज़े का झूठा है
बजते उसके गाल बराबर
नौकर सीधा सादा जितना
मालिक खीँचे खाल बराबर
क्यों ना आयी बारी मेरी
घड़ियाँ चलतीं चाल बराबर
ना जाने कब तुम आओगे
बीत रहे हैं साल बराबर।
0
हाँथ से हाँथ कोई मिलाता नहीं
चार पैसे अग़र मैं कमाता नहीं
दर्द दिल का, दवाओं से जाता नहीं
मरहमे इश्क़ कोई लगाता नहीं
दाग़ धुलने लगी है हुक़ूमत यहाँ
इसलिए ज़ुल्म गंगा नहाता नहीं
एक वो है कि जिसको जहां भा रहा
हमको उसके सिवा कोई भाता नहीं
शहर में ख़ूब पहचान अपनी मगर
कोई उल्फ़त की रस्में निभाता नहीं
सारी दुनियाँ के देखे नबी बेख़बर
है गरीबों का कोई विधाता नहीं
वक़्त अपना बिताकर चले जाते हैं
साथ कोई उमर भर निभाता नहीं
0
अब तो तन्हाई ही सहारा है
वक़्त तन्हा बहुत गुज़ारा है
कौन ख़तरा उठाए दरिया का
ऐसा उस पार भी किनारा है
झील ,झरने, नदी तुम्हारे सब
प्यास तक अपनी बेसहारा है
उसकी सूरत नज़र नहीं आयी
चाँद को रात भर निहारा है
जीतने पर भी ख़ुश नहीं रहता
आदमी ख़ुद से इतना हारा है
प्यार वाली ज़बाँ नहीं बोली
या तो दिल से नहीं पुकारा है
बेख़बर माँग लो दुआ तुम भी
टूटने वाला ये सितारा है
0
भूख से लड़ती हुई हर ज़िन्दगी पर बात हो
अब तो संसद में हमारी बेबसी पर बात हो
पल रहे हैं तीरगी में कितने आँगन आज भी
चार बँगलों से चमकती रौशनी पर बात हो
तीर कुछ तलवार, ओढ़े फूल का किरदार हैं
बन के बैठी है जो सच्ची, उस बदी पर बात हो
जाति मज़हब क़ौमवादी हर रवायत छोड़कर
मुल्क़ में ग़ुरबत से होती ख़ुदकुशी पर बात हो
खून का प्यासा जहां क्यों हो रहा है बेख़बर
किस तरह हो आदमी की तिशनगी पर बात हो
0
आदमी की जात गुम है तल्ख़ियों में
बट चुका है देश इतनी जातियों में
धर्म को मसला बनाए रख सियासी
ज़िस्म जां कटते रहेगें बोटियों में
जब सियासत चाहे तो दंगा करा दे
भर दिया है मैल मन की कोठियों में
इसलिए बेरोजगारी है ज़रूरी
तब युवा उलझा रहेगा रोटियों में
चाटुकारी की डगर चलने लगे फिर
बद-से-बदतर ज़िन्दगी है नेकियों में
कर न पाए सामना मझधार का तो
पार ना होगा समन्दर कश्तियों में
मांश का टुकड़ा फ़क़त है ये ग़रीबी
छीना-झपटी चल रही है भेड़ियों में।
0
आम जनता है लाचार महँगाई में
ज़ुल्म ढाओ न सरकार मंहगाई में
गैस , डीजल बढ़ा दाम पैट्रोल का
कैसे होगी बसर यार महँगाई में
क्या बताएं ग़रीबों की हालत तुम्हें
मर रहे रोज बीमार महँगाई में
एक तरफा दिखाने लगे हैं ख़बर
बिक गए सब समाचार महँगाई में
एक बालक खिलौनों की ज़िद पे अड़ा
बाप जाए न बाज़ार महँगाई में
वोट बेचा न था हमनें अपना मग़र
बिक विधायक गया, यार महँगाई में
लोग घड़ियां लिए रह गए बेख़बर
क़ीमती वक़्त की धार महँगाई में
0
सच्ची सारी बात दबा दी
इक झूठे ने धाक जमा दी
दुश्मन में तो हिम्मत ना थी
इश्क़ ने हमको धूल चटा दी
कुछ बूदों ने प्यास बुझाई
कुछ बूदों ने आग लगा दी
उम्मीद न तेरी हमको थी
तुमने ही उम्मीद जगा दी
आख़िर दरिया रूठा क्यों है
कश्ती फिर इस बार डुबा दी
0
पास पैसा है तो फ़िर बाज़ार देखो
बिक रहा देश तुम अखबार देखो
क़ौमवादी ठग सियासी चोचले हैं
बस ग़रीबी है यहाँ लाचार देखो
गिरगिटी फ़ितरत हुई अब आदमी की
चाटुकारी हो गया संसार देखो
चन्द पैसों में तुली औकात अपनी
और मज़हब की खड़ी दीवार देखो
ज़िन्दगी की राह में चलना सँभल के
हो गया है आदमी हथियार देखो
क्या? बजा स्पीकर चुनावी रैलियों का
झूठ की होने लगी बौछार देखो
बेख़बर सीखो परखना अब हुनर को
मत लिबासों से कोई किरदार देखो।
0
क़त्ल होकर ये दिल ने जाना है
आपका तीर भी सुहाना है
जो भी देखे तुम्हें बहक जाए
हुस्न है या शराब खाना है
ज़ुल्फ़ रेशम , नयन नगीने से
आपका रूप इक खज़ाना है
चाँद तुमको नहीं कहेंगे हम
चाँद इतना कहाँ सुहाना है
मैं फ़क़त आइना हक़ीक़त का
दिल किसी और का दिवाना है।
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ज़ायदादों का मसला नहीं होता
भाई- भाई में झगड़ा नहीं होता
तेरे ना होने से भी हुआ ये सब
तू जो होता तो क्या क्या नहीं होता
ग़म मुहब्बत का कोई रहा होगा
पेड़ पानी में सूखा नहीं होता
दूसरों की रोटी छीनता है क्यों
जो भी रोटी का भूखा नहीं होता
चीज होती यदि कोई ख़ुदा जैसी
आदमी जान्वर जैसा नहीं होता
दायरे में रखता प्यास अपनी तो
आज पानी का ख़तरा नहीं होता
बेख़बर को मंज़िल मिल गयी होती
रास्तों में जो धोखा नहीं होता।
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गर्व करती है हुक़ूमत जाने किस हालात पर
हर तरफ़ ग़ुरबत दिखेगी देखिये फुटपाथ पर
मुद्दतों से पढ़ रहे हैं एकता का पाठ सब
हो रहे दंगे अभी भी धर्म मज़हब जात पर
चन्द पैसों के लिए ईमान अपना बेच दे
अब नहीं करता यकीं कोई किसी की बात पर
आदमी की शक्ल में कुछ फिर रहे हैं भेड़िये
रोज संकट बढ़ रहा है आदमी की जात पर
लोग अन्धे हो गए हैं रौशनी की चाह में
ज़ुल्म सारा दिन करें इल्ज़ाम थोपें रात पर
अपना रस्ता अपनी मंज़िल खोज लेता है हुनर
मेहनती पलता नहीं फेकी हुई ख़ैरात पर
बात अब अधिकार की है सामने आ बेख़बर
कब तलक़ बैठे रहोगे हाँथ धरकर हाँथ पर।
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ज़ख्म इतने मिले नज़ारों से
खौफ़ खाने लगे बहारों से
रातभर चाँद जब नहीं निकला
बात करनी पड़ी सितारों से
ढूँढते हैं कभी किनारा हम
लौट आये कभी किनारों से
तुमसा कोई मिला नहीं अब तक
मेरा पाला पड़ा हज़ारों से
बात करनी है तो ज़ुबां खोलो
हम समझते नहीं इशारों से।
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फ़सादी कौम वाली वादियों में लोग रहते हैं
सियासी ज़ुल्मतों की आँधियों में लोग रहते हैं
तुम्हारे ऊँचे महलों की दरो-दीवार क्या जाने
कि ग़ुरबत की कटीली तल्खियों में लोग रहते हैं
जो सूरज ने उजालों का किया ऐलान सच्चा है
मग़र अब भी अँधेरी बस्तियों में लोग रहते हैं
कभी आदम कभी क़ुदरत ,सताते सब गरीबों को
ख़ुशी की बात छोड़ो, सिसकियों में लोग रहते हैं
हरम-दौरो बनाने से कभी सावन नहीं आता
जहाँ फाँकों से मरते पतझड़ों में लोग रहते हैं।
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चाँद का सपना दिखाया जा रहा है
अस्ल मुददा फिर दबाया जा रहा है
भूख से तड़पे ग़रीबी झोपड़ों में
जश् न बँगलों में मनाया जा रहा है
नेकियों का नाम लेकर इस सभा में
ज़ुल्म का परचम लगाया जा रहा है
कर दिया है क़त्ल करके दफ़्न सच को
झूठ टी.वी. पर दिखाया जा रहा है
राष्ट्रवादी भावना की आढ़ लेकर
युद्ध घर में ही कराया जा रहा है
घूसखोरी चाटुकारी दफ़्तरों में
बेबसों पर ज़ुल्म ढाया जा रहा है
मुल्क़ में करके सियासत मज़हबी अब
आदमी को बरगलाया जा रहा है
आप वाली सभ्यता को आग देकर
आज 'हम' को 'मैं' बनाया जा रहा है
जंग के हालात पैदा जल्द होंगें
इस क़दर मज़हब सिखाया जा रहा है
जान लाखों भूख से जाती जहाँ पर
भोग पत्थर को लगाया जा रहा है
आप मत एतबार करना आंकड़ों पर
आंकड़ा फ़र्ज़ी दिखाया जा रहा है
बेख़बर ,श्री राम का उदघोष करके
कृत्य रावण सा कराया जा रहा है
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दरमियाँ बढ़ रहा फ़ासला दिन ब दिन
कौन सी राह पर तू चला दिन ब दिन
इन शरीफ़ों को जबसे हुक़ूमत मिली
नेकियों का लुटा काफ़िला दिन ब दिन
ख़्वाहिशों की ख़ुशी क्या बताएं तुम्हें
हो रही ज़िन्दगी मुबतिला दिन ब दिन
उससे उम्मीद हमको मिली इस क़दर
टूटता ही रहा हौसला दिन ब दिन
धूप से कोई मुझको शिकायत नहीं
बेख़बर छाँव में दिल जला दिन ब दिन।
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दीद जबसे हुआ किनारों का
ज़िक्र होने लगा नज़ारो का
मुद्दतों तुम नज़र नहीं आये
मुन्तज़िर है शज़र बहारों का
दिल को ख़्वाहिश कहाँ समंदर की
है मेरा दर्द आबशारों का
गीत महबूब का तबस्सुम है
शायरी मर्ज़ ग़म के मारों का
ख़ाक खाता हुआ मुसाफ़िर मैं
है दिवाना जहां सितारों का ।
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मयकदा, हिस्से किसी के जाम आया
ज़िन्दगी में दर्द जब पैग़ाम आया
जो ग़लत थे ले गए अधिकार सच का
नेकियों पर हर बुरा इल्ज़ाम आया
छोड़ दी उम्मीद हमनें आसमाँ की
मुद्दतों के बाद कुछ आराम आया
ज़िन्दगी का हमसफ़र बनने चला था
मुश्किलों में साथ ना दो गाम आया
लोग मतलब के तअल्लुक़ रख रहे हैं
बेबसी में कौन किसके काम आया
चाहतों में हमनें ही दुनियाँ भुला दी
याद उसको कब हमारा नाम आया
बेख़बर हम हो गए तेरे सफ़र में
इब्तिदा थी और कुछ अन्जाम आया
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नज़र को हसीं कुछ नज़ारे मिलेंगे
नयन आपसे जब हमारे मिलेंगे
जो मझधार का सामना कर सकेगी
उन्हीं कश्तियों को किनारे मिलेंगे
जिन्हें मिल गया तख़्त पूछों उन्हीं से
कई बाज़ियाँ लोग हारे मिलेंगे
तुम्हें ख़ुद हुनर आज़माना पड़ेगा
कहाँ तक किसी के सहारे मिलेंगे
अग़र कर लिया सामना मुश्किलों का
इन्हीं रास्तों पर सितारे मिलेंगे।
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और कोई खज़ाना नहीं चाहता
दिल ये तुझको भुलाना नहीं चाहता
चन्द लोगों से अपनी बसर कीजिए
सबको सारा ज़माना नहीं चाहता
हर किसी को बुलन्दी बड़ी चाहिए
कोई ज़ोखिम उठाना नहीं चाहता
दोष दो लाख चाहें मुक़द्दर को तुम
वक़्त कोई बहाना नहीं चाहता
उम्रभर का सफ़र ज़िन्दगी को मिले
यह परिन्दा ठिकाना नहीं चाहता
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चुपके चुपके जो हुई थी मयकशी भूले नहीं
अब तलक़ हम दोस्त तेरी दोस्ती भूले नहीं
बेक़रारी इन्तज़ारी थी ख़ुमारी बेसबब
जो कभी छायी थी दिल पर आशिक़ी भूले नहीं
जो सफ़र ने बख़्श दी आसानियाँ भी याद हैं
उलझनों में जो गुज़ारी ज़िन्दगी भूले नहीं
ख़ाक होकर मिट गयीं कुछ ख़्वाहिशें अपनी यहाँ
प्यास कब की बुझ गयी पर तिशनगी भूले नहीं
हर किसी ने आज़माया दिल हमारा बेख़बर
जो मिली थी रौशनी से तीरगी भूले नहीं
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तुम पर जीते मरते होंगे
लोग इबादत करते होंगे
देख के तुझको आशिक मुझसे
चुप चुप आँहें भरते होंगे
खोल किताबें कॉलेज में सब
सूरत तेरी पढ़ते होंगे
नाम तुम्हारा लेकर उठते
तन पीकर जब गिरते होंगे
पहले अच्छा लगता होगा
फ़िर हालात बिगड़ते होंगे
दूजी दुनियाँ ढूंढ रहा हूँ
ज़ख्म कहीं तो भरते होंगे
ज़िक्र तुम्हारा करके अक्सर
ख़ुद से तन मन लड़ते होंगे
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