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साहित्य किराना स्टोर लेखक-वैभव बेख़बर

 मन को उलझाओ मत  तन की मझधार में सत्य  है  कुछ  नहीं  और  सँसार  में दो  नयन  से  नयन  चार  हो  जाने  दो तोड़  दो  सब  हदें  प्यार  हो  जाने  दो , नाव  भी  डगमगायेगी   पानी   में  कुछ मोड़  आते   रहेंगे   कहानी  में  कुछ, ना  ये  ऋतु  आएगी  फिर  कभी लौटकर आओ  मिलकर  चलें  ज़िंदगी  की  डगर, डूबकर   ही  सही   पार   हो  जाने  दो तोड़  दो  सब  हदें  प्यार  हो  जाने  दो , रीत  रस्म-ओ-रवायत  बदलकर  चलो हाँ   मगर  फिर  कहूँगा सँभलकर चलो, ना  किसी  राज  में   ना  किसी  साज़ में ज़िंदगी  तुम  जियो   अपने  अंदाज़  में, हार  कर   यदि  मिले   हार  हो  जाने दो तोड़...

2025 ग़ज़ल संग्रह VAIBHAV BEKHABAR

 आँखे  बदल  गयीं  कई  मंज़र  बदल  गये जितने  नरम  पदार्थ थे  साँचे  में  ढल गये, चलने  लगा  है  दुनिया  में  जादू  ज़ुबान का रंगरूप  की  बहार  में  यौवन  फ़िसल गये, गुज़री  है  उम्र  अपनी   भटकते  हुये  यहाँ वो  कौन थे  जो  इश्क़ में गिरकर सँभल गये, फूलों  की  बात  छोड़िये,  रौंदे  गये हैं लोग गाड़ी  सवार   रात में    झुग्गी  कुचल  गये, दौलत  ने  एक नस्ल  नयी  खोज ली यहाँ जो  आदमी  की  जात  से  आगे  निकल गये! 0 यहाँ  बुजदिल  किनारा  ढूँढ़ते  हैं मेरे   जलयान  धारा   ढूँढ़ते  हैं, हर इक कोशिश  नया  पैग़ाम देगी चलो  चलकर  दुबारा  ढूँढ़ते  हैं, हुनर  तो  ख़ुद  नया  निर्माण कर ले नज़र  वाले   नज़ारा  ढूँढ़ते  हैं...