साहित्य किराना स्टोर लेखक-वैभव बेख़बर
मन को उलझाओ मत तन की मझधार में सत्य है कुछ नहीं और सँसार में दो नयन से नयन चार हो जाने दो तोड़ दो सब हदें प्यार हो जाने दो , नाव भी डगमगायेगी पानी में कुछ मोड़ आते रहेंगे कहानी में कुछ, ना ये ऋतु आएगी फिर कभी लौटकर आओ मिलकर चलें ज़िंदगी की डगर, डूबकर ही सही पार हो जाने दो तोड़ दो सब हदें प्यार हो जाने दो , रीत रस्म-ओ-रवायत बदलकर चलो हाँ मगर फिर कहूँगा सँभलकर चलो, ना किसी राज में ना किसी साज़ में ज़िंदगी तुम जियो अपने अंदाज़ में, हार कर यदि मिले हार हो जाने दो तोड़...