2025 ग़ज़ल संग्रह VAIBHAV BEKHABAR

 आँखे  बदल  गयीं  कई  मंज़र  बदल  गये

जितने  नरम  पदार्थ थे  साँचे  में  ढल गये,


चलने  लगा  है  दुनिया  में  जादू  ज़ुबान का

रंगरूप  की  बहार  में  यौवन  फ़िसल गये,


गुज़री  है  उम्र  अपनी   भटकते  हुये  यहाँ

वो  कौन थे  जो  इश्क़ में गिरकर सँभल गये,


फूलों  की  बात  छोड़िये,  रौंदे  गये हैं लोग

गाड़ी  सवार   रात में    झुग्गी  कुचल  गये,


दौलत  ने  एक नस्ल  नयी  खोज ली यहाँ

जो  आदमी  की  जात  से  आगे  निकल गये!




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यहाँ  बुजदिल  किनारा  ढूँढ़ते  हैं

मेरे   जलयान  धारा   ढूँढ़ते  हैं,


हर इक कोशिश  नया  पैग़ाम देगी

चलो  चलकर  दुबारा  ढूँढ़ते  हैं,


हुनर  तो  ख़ुद  नया  निर्माण कर ले

नज़र  वाले   नज़ारा  ढूँढ़ते  हैं,


लुटेरे  खा  रहे  हैं  हक़  किसी का

ये  मेहनतकश तो चारा ढूँढ़ते  हैं,


अब हम उकता चुके  हैं गिरगिटों से

कोई  स्पर्धी    करारा  ढूँढ़ते  हैं!



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लगाकर  पेड़  सींचे  हैं  कोई सदक़ा नहीं आया

हमारे  बाग  में  मौसम  बहारों  का  नहीं  आया,


किसी  बच्चे  के  हिस्से  में  विलायत की पढ़ाई है

किसी  की  पीठ  पे  इस्कूल का बस्ता  नहीं आया,


तुम्हारे  शहर  को  तो  मिल गये  साधन  तरक्क़ी के

हमारे  गाँव  में  अब  तक  नया  पेशा  नहीं  आया,


बहुत  उम्मीद थी  परिवार को, पैसा  तो  भेजा  है

मगर  त्योहार  में  परदेश  से  लड़का  नहीं  आया,


दीया  से  लैम्प   बिजली बल्ब  सोलर तक चले आये

अँधेरों  से  कभी  लड़ने   कोई  मौला  नहीं  आया,


कहाँ  मानी,  मनाने से  ग़ज़ल रूठी तो रूठी है

हज़ारों कोशिशों  के बाद भी मतला नहीं आया!


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रिश्ते  बचे  हैं  नाम के  ऐतबार  ना  रहा

अब  आदमी  को आदमी  से प्यार ना रहा,


पहने   हुये  हैं   लोग   मुखौटे   नये-नये

किस्से  में  कोई  अस्ल का किरदार ना रहा,


दिल  की  तमाम  बस्तियाँ  दौलत ने लूट लीं

इंसाफ़   के  लिये   कोई   दरबार  ना  रहा,


पत्थर  कहीं   मशीन   कहीं  जानवर सा है

इस  आदमी  की  जात का मेयार  ना रहा,


विज्ञान   ने  फ़रेब  के   गुम्बद  गिरा  दिये

जादू  रहा  न  दिव्य  चमत्कार  ना  रहा,


ऐसा  नहीं  कि  हुस्न  की  आमद  नहीं हुई

उनसे  बिछड़  के   दिल  ये  तलबगार ना रहा!





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जिसे इक नज़र डूबकर  देखते  हैं

बड़ी देर  तक फिर  उसे सोचते हैं,


जरूरी  बहुत  हैं सफर के तज़ुर्बे

चलो  मन्ज़िलों के डगर नापते हैं,


चरागे-मुहब्बत  जलाने  चला  हूँ

ये  झोंके  हवा  के मुझे रोकते हैं,


ये  कमसिन उमर के जुनूनी हैं लड़के

इन्हें  उड़ने  दो  ये परिंदे  नये  हैं,


बदन तो  करीब आ गया है तुम्हारे

मगर दरमियाँ-ए-दिल बढ़े फ़ासले हैं,


कुआँ मिल गया तो नदी चाहता है

जुबाँ के बदलते  बहुत  ज़ायके  हैं,


तुम्हें जो मिली वो ख़ुशी हो मुबारक

कई  हादसों  से  मुझे  ग़म मिले  हैं


चलो फिर गिरो फिर उठो फिर चलो तुम

हुनर  आपका  है   कदम  आपके  हैं!







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तुम्हें किस तरह बतायें,  मेरी बेबसी अलग है

मैं भी आदमी हूँ लेकिन,  मेरी ज़िंदगी अलग है


ये किस ओर लोग सारे,  कई दिन से जा रहे हैं

मैं कदम बढाऊँ कैसे,  मेरी तिश्नगी अलग है


न मैं बुत-कदों में जाऊं, न करूं किसी के सजदे

अभी रब मेरा है ज़िंदा,  मेरी बन्दगी अलग है


कभी आओ तुम भी देखो, मेरे साथ जाम पीकर

मेरे दिल के मय-कदे की, अजी मय-कशी अलग है


ये दिमाग के अंधेरे    सही रास्ता न देंगे

जो निकल रही है दिल से, वही रोशनी अलग है


मेरी आँख ने हकीकत,  बड़े पास से है देखी

मेरा जज़्ब भी अलग है,  मेरी शायरी अलग है


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लगे  जो  राह  में  मेले-बजार  देखे  हैं

हमारे  पाँव  ने  छाले  हजार  देखे  हैं,


कि जिस मक़ाम पे मिलता है सफ़र तरक़्क़ी का

उसी  मक़ाम  पे  हमनें  उतार  देखे  हैं,


ख़ुशी  के  ख़्वाब  निगाहों में  ख़ूब टूटे हैं

बड़े  करीब से  दिल  ने   गुबार  देखे  हैं,


किसे  हुआ  है  मुहब्बत में मरहला हासिल

वफ़ा  की  राह  में दिल   बे-करार  देखे  हैं,


गधे  की  शक़्ल तो मिलती है नक्श घोड़े से

बदन  के  भेष  में  मैंने   शिआर  देखें  हैं!



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अब सज रही है बज़्म में व्यापार  की  ग़ज़ल

आम-आदमी  से  दूर  है  बाज़ार  की  ग़ज़ल,


जो  छू  न  पाये  रूह तो  किस काम की अदा

यौवन  को  छल  रही  है ये श्रंगार  की  ग़ज़ल,


मासूम  दिल के  प्रेम  को  पीड़ा  हुई  नसीब

हरजाई  को  पसँद  है  ऐतबार  की  ग़ज़ल,


उठती  कहाँ  है  गूँज  यहाँ  इन्कलाब की

मुद्दत  हुई  सुने  हुये  अधिकार  की  ग़ज़ल,


होती  नही  दिवार  ये  दो  भाइयों  के  बीच

लिखते  अगर  जमीर  से  परिवार की ग़ज़ल,


महरूम  ज़िन्दगी  की हक़ीक़त से है अभी

लगती  तो  है  हसीन  चमत्कार  की  ग़ज़ल,


ख़ाबों  के  आसमाँ से  उतर आ जमींन पर

लिखिये  हुज़ूर  मुल्क़ के  लाचार  की  ग़ज़ल,


दरिया  की  मौज  कैसे  बदलती  है  र'वानी

मैने   सिखाई   नाव  को  मझधार  की ग़ज़ल,


आहों  में  दब  गयी  कहीं अश्कों  में बह रही

ढलती   कहाँ  है  लफ़्ज़ों  में  सँसार की  ग़ज़ल!


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किसी के लिये  तो सजा हो गयी

किसी को  मुहब्बत अता हो गयी,


सुना था बड़ी पाक नेमत है चाहत

नये  दौर  में   बे-हया  हो  गयी,


तेरा  साथ मिलता तो कुछ बात होती

हर  इक  आरजू   बे-मजा  हो गयी,


मुहब्बत का  कोई   तजुर्बा  न   था

जवाँ  उम्र  थी  और  ख़ता हो गयी,


दिल-ए-जान जिस पे लुटा हम रहे थे

वही   दोस्ती   बे-वफ़ा  हो  गयी,


वज़ह  इक  बता जा  मुझे बेख़बर

तू   किस  बे-बसी  में  जुदा हो गयी!


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मुहब्बत  में  सहे  दिल ने कई  आघात  लोगों  के

दबाने  से  कहाँ  दबते  कभी  जज्बात  लोगों  के,


नये  परचम  की  चाहत  में  अकेले चल रहा हूँ मैं

कभी  मज़में   लगे  होंगे   हमारे  साथ  लोगों  के,


बहुत दिन तक नहीं टिकता  गुमां शौहरत बुलंदी का

बहुत  जल्दी  बदलते  हैं  यहाँ  हालात  लोगों  के,


तुम्हें मालुम नहीं दरिया  ये  क्यों  सूखा है नेकी का

कि अब  पुतले लगाये  जा  रहे  कुखयात  लोगों के,


कहीं  भटका  न दे  दुनिया तुम्हें अपने ही मक़सद से

गिले-शिकवे  लगे  रहते  यहाँ  दिन-रात  लोगों  के,


क़लम  मेरी  नहीं  करती  फ़क़त  महबूब  से  बातें

उठा  लाये  हैं  ग़ज़लों  में  दबे-फ़िकरात  लोगों के!


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भुला बैठे  हैं  जीवन का फ़साना

किसी  मंज़िल के पीछे है ज़माना,


बड़े लोगों को  है  ज़्यादा  कमाना

किसे  फुरसत करे मिलना-मिलाना,


बिना जाहिर  किये  वो  रूठते  हैं

मुझे  आता  नहीं   इतना  मनाना,


समझ  लो  दूर  जाना  चाहता  है

बनाने  जब  लगे   कोई  बहाना,


वफ़ा का ज़िक्र है अब  बात झूठी

सुना  होगा  कोई  किस्सा  पुराना,


चले  आओ  कभी तुम  चाय पीने

बिना  कारण भी हो मिलना-मिलाना,


चिता  जलती हुई  कुछ  कह रही थी

है किस से जीतना, किस को  हराना!


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किसी  झुग्गी  किसी  फुटपाथ के कम्बल  में  रहते हैं

बहुत  हैं  ज़िस्म  ऐसे  जो  बड़ी  मुश्किल में  रहते  हैं,


नये  डाकू   नया  कुर्ता   नयी  बस्ती   नयी  कुर्सी

बहुत  लाचार  पिछड़े  लोग अब चम्बल  में रहते  हैं,


नगर  निर्माण  उन्नति   मुल्क़  की  तस्वीर  बदली है

मगर  गाँधी  तेरे  हरिजन   उसी  दलदल  में  रहते हैं,


भरम  का  जाल  बुनते  हैं  हसीं  अहसास के ख़ातिर

अमूमन   लोग  तन्हा  हैं  मगर  महफ़िल में  रहते  हैं,


फ़िदा  मत  हो  किसी भी शख़्सियत के एक पहलू  से

जिन्हें  कहते  हैं  हम  खटमल  उसी मखमल में रहते हैं,


कभी  निष्पक्ष  होकर  देखिये   इस  बाग  की  रौनक़

कि कितने   रंग   हिन्दोस्तान  के  आँचल  में रहते  हैं!



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भैंस  पे अक़्ल  भारी रही उम्रभर

और दुनिया  बजारी  रही उम्रभर,


सोचते थे कि मिलकर मिलेगा सुकूँ

इश्क़  में  बे-करारी  रही  उम्रभर,


काम आया न कोई बुरे वक़्त में

कहने को दोस्त-यारी रही उम्रभर,


खूबसूरत  नकाबों में  उलझी रही

आँख अनपढ़ हमारी रही उम्रभर,


इश्क़ ठहरा नहीं हैं कभी उस जगह

जिस जगह  होशियारी  रही उम्रभर,


तुम किसी और के हो गये बेख़बर

एक लड़की कँवारी  रही उम्रभर!


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डूबा  किसान  कर्ज़  में  राजा  कहाँ  गया

रैली  में जो किया था वो वादा  कहाँ गया,


सरकार  बन रही है  विधायक खरीद कर

पार्टी  बदलने  वाला  मसीहा  कहाँ  गया,


बेरोजगार    पूछते    क्या  योजना  है अब

इस  देश  के  विकास का  नक्शा कहाँ गया,


शिक्षा  सड़क  की  फ़िक्र  किसे अस्पताल की

आम-आदमी  के  टैक्स  का  पैसा  कहाँ गया,


सँसद का  भी  ज़रूरी  है  साहब  निजीकरण

डॉलर  के  सामने  गिरा   रुपया  कहाँ  गया!


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हकीकत  मानते  हैं  ज़िंदगी  को

नमन करते हैं अपनी सर-जमी को,


न आगे  बढ़  सके हम आदमी से

मसीहा  मान  बैठे  थे  किसी  को,


समंदर    छीन  लेगा  हैसियत  कल

अभी अभिमान ज़्यादा है  नदी  को,


उन्हें  तो  बाद  में  अफसोस  होगा

अभी  तुम  खोज लो अपनी कमी को,


दिखावे  के  भरम  में   ना  उलझते

अदब  करते  अगर  तुम  सादगी को,


समय  रहते   सुधर   जाओ  सपेरों

बहुत  तुम  डस  चुके हो आदमी को,


कुआँ  से  झील  फिर  देखे समंदर

मिटा  पाये  नहीं  हम  तिशनगी  को,


अगर  कीमत   ख़ुशी की  जाननी  है

कभी  समझो  किसी की  बेबसी  को,


किसी  दिन  सूरतें   पढ़ने  लगोगे

अभी  समझो  हमारी  शाइरी  को!


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कुछ समझते  रहे  कुछ उलझते रहे

भाव  की  नाव पर  हम भटकते रहे,


लौट  आये  किनारे  से  पानी  में फिर

झील   दरिया  नदी  को  खटकते रहे,


कब  हुये  ख़्वाब  उनके  मुकम्मल यहाँ

लोग  जितने  हक़ीक़त  से  बचते  रहे,


सादगी   में  हुनर  की  बसर  हो  गयी

झूठ   जितने   थे  चेहरे  बदलते  रहे,


लाख  मरहम  लगा  के  भी  देखे मगर

मुद्दतों  ज़ख्म-ए-उल्फ़त  कसकते  रहे,


सारे   किरदार   खुदगर्ज़  थे  बेख़बर

उम्रभर  जिस  कहानी  को  रचते  रहे!


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नये  कुछ  पुराने  अमल  लिख रहे हैं

तुम्हारे  लिये  हम  ग़ज़ल लिख रहे हैं,


नहीं  इतना  आसान  है  ज़िंदगी  में

कठिन प्रश्न का हल, सरल लिख रहे हैं,


सियासी  महकमों  से  जो  हो रहा है

ये   बाज़ार, व्यापार , छल लिख रहे हैं,


धरा  सींचती है,   इसलिए   माँ, नदी  है

किया  किसने  दूषित ये जल लिख रहे हैं,


कड़ी  धूप   खलिहान  में   जो  गुज़रती

किसानों  की  मेहनत  फ़सल लिख रहे हैं,


जो  पर्दे  के पीछे   छिपे,  ढूंढ़  लाओ

ग़लत  को  ग़लत  आजकल लिख रहे हैं



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दुनिया  से  दुशवारी   हो  गयी

सच  से  अपनी यारी  हो गयी,


बेक़दरी   देखो  जज्बातों  की

उल्फ़त  अब  बाज़ारी हो गयी,


किस्से    सारे   झूठे   हो  गये

फ़ितरत  सब  किरदारी हो गयी,


पत्थर  होने  को आतुर  है अब

मिट्टी   को   बीमारी  हो  गयी,


तिनका-तिनका  गट्ठर  हो गया

शोला,  तब  चिंगारी   हो  गयी,


फिर  सारे  हाँथी  गिर  जाएंगे

चींटी  जिस दिन भारी  हो गयी,


सत्ता  क्या  संसद  क्या राजनीति

सब  पे   दौलत   तारी  हो  गयी,


ताज  सँभालो  अब तुम बेख़बर

मेरी  तो   तैयारी    हो  गयी,






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आँखों  मे  मेरे  ग़म  का  समंदर  वो भर  गया

पत्ता , शजर  से   टूट  के   जाने  किधर  गया,


पहली  नजर  में  रूह तक  कोई  असर  गया

जादू  तुम्हारे  हुस्न  का   दिल  में   उतर  गया,


इक   दास्तान   ख़त्म,   अधूरी   ही    हो   गई

किस्से  में  जो  हसीन था   किरदार  मर   गया,


ठहरा  हुआ  है  आज भी  लम्हा  वो वस्ल  का

वो  उम्र, दौर,  वक़्त  तो  कब का  गुजर  गया,


दिल  टूटने  के  बाद,  समझ  हो  गयी  दुरुस्त

बर्बादियों   के    बाद,    मुक़द्दर    सँवर   गया!



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मैंने  देखा   पीतल , सोना

तुमनें  देखा   जादू - टोना,


ज़ख्म   तुम्हारे  मरहम वाले

तुम  क्या जानो  पागल होना,


इश्क़  ने  जिसको ख़ूब रुलाया

भूल  गया  वो  मौत  पे   रोना,

                 /

मौत  पे  आँसू  मर्द  ने  रोके

रोक  न  पाया इश्क़ में  रोना,


साथ  तुम्हारा  मिल ना  पाया

टूट  गया  फिर  एक खिलौना,


सबकी  अपनी मंज़िल, शोहरत

क्यों   फिर   दुनियादारी    ढोना,


सार   समझता   हूँ  जीवन  का

मुझको  अब  क्या  पाना-खोना,


शायर   होकर   जान   रहा  हूँ

आसान   कहाँ    इंसां   होना,




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ख़ास  जितनी  थी  आम  कर  डाली

ज़ीस्त   अपनी   तमाम   कर  डाली,


मेरी   गुज़री   है   उम्र   राहों  में

किसने? मंजिल  हराम  कर  डाली,


ख़्वाब  जबसे     हमारे   टूटे  हैं

रात    नींदों  के  नाम  कर  डाली,


वक़्त दुपहर  घड़ी  के माफ़िक था

तेरी   ज़ुल्फ़ों   ने  शाम  कर  डाली,


मैंने  कागज   क़लम  के  जरिये से

दिल  की  पीड़ा   क़लाम  कर  डाली,


नज़्र   करते   रहे  वो  सूरत   को

मैंने  सीरत   अमाम   कर  डाली!




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फटा  माँ-बाप  का  कुर्ता, फटी ऐड़ी  लिखेंगे हम

बहुत  भूखे  रहे  हैं   इसलिए   रोटी  लिखेंगे  हम,


न  समझे  दर्द,जो  मज़लूम और लाचार लोंगो का

रिवायत   हो  वो  कैसी भी उसे जुल्मी लिखेंगे हम,


बनाकर  धर्म  को धंधा  किया अक्सर यहाँ शोषण

व्यवस्था  पक्षपाती, नफ़रती  ओछी  लिखेंगे  हम,


सियासत  ले  गयी  जनतंत्र  ये  सामन्तशाही तक

सो  संसद  चापलूसों से   सजी  मंडी  लिखेंगें  हम,


गुज़रती   तीरगी  में   ज़िंदगी,  देखो  ग़रीबों  की

तुम्हारी  फाइलों  की  रोशनी  झूठी  लिखेंगे  हम,


तेरी  मर्जी  लिखेंगे  इस ग़लतफ़हमी में मत रहना

कहानी  जिसकी  है  जैसी   उसे वैसी  लिखेंगे हम!



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सहता  किसी  की  मार  है  रोटी  के   वास्ते

करता    कोई   गुहार  है   रोटी   के   वास्ते,


अपनों   से   दर-किनार  है  रोटी  के  वास्ते

आम-आदमी  बिमार   है   रोटी   के  वास्ते,


हर  शख़्स   कर्ज़दार  है  रोटी  के  वास्ते

हर  शख़्स  काम-गार  है  रोटी  के  वास्ते,


मज़दूर और किसान की  ग़ुरबत को देखिए

जीवन  ही   तार-तार  है  रोटी  के  वास्ते,


शोहरत, हुनर, जुनून,ज़रूरत किसी को है

हर  भूख  जोरदार  है  रोटी  के  वास्ते,


लाचारियाँ  तो  देखिए  उस शख़्स की हुज़ूर

दुश्मन   से  उसको  प्यार है  रोटी  के  वास्ते!




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बहुत  बेहतर  बहुत  बेहतर  बहुत बेहतर  नहीं हैं हम

बहुत  होंगें  बहुत  बेहतर  मगर  कमतर  नहीं  हैं  हम,


तुम्हें  अफ़सोस  बादल से  कि बरसे  रोज  आँगन में

मुझे  अफ़सोस  है  की  आपका छप्पर  नहीं  हैं  हम,


तमन्ना  सर-फ़रोशी  की  हम अपने दिल में रखते  हैं

भले  इस्लाम   मज़हब  है  मगर  बाबर  नहीं  हैं  हम,


बदन  है अक़्ल  है  दिल  है  कोई पत्थर  नहीं हो तुम

तुम्हें  बाज़ार  में  मिल  जाये  वो  ज़ेवर  नहीं  हैं  हम,


बहुत  बेबाक  लहज़े  में   बयाँ  करते   हक़ीक़त  को

फ़क़त  किरदार  है  खुद-रंग  कोई  अफ़सर नहीं हैं हम,


बहुत  पहले   चलाये   थे    किसी   मैदान  में  खंज़र

क़लम   से  जंग  लड़ते अब  कोई  शायर  नहीं  हैं  हम !


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कहाँ  पाबंद   रह  पाया  कोई   सँस्कार  दुनियाँ का

ज़रूरत  के  मुताबिक  ढल गया किरदार दुनियाँ का,


बड़े  नादान  हैं    जो    खोजते  हैं   नेकियाँ   इसमें

हमेशा  से   रहा   मतलब-परस्त   आधार  दुनियाँ का,


जिसे   चाहो   ख़रीदो    बेच  डालो  चार  पैसों  में

बदन  तक  आ  चुका  है अब यहाँ  बाज़ार  दुनियाँ का,


बुलंदी  पे   कोई   परचम   हुनर  के  बिन कहाँ  ठहरा

समय  के  साथ  लड़ना  पड़ता  है  पैकार  दुनियाँ  का,


समझ  लेना  कि  क्या है फ़र्क  सूरत   और  सीरत  में

बहुत   है   खूबसूरत   बाहरी     सिंगार    दुनियाँ  का,


बसर  तो  ठीक  से होती    जो  कारोबार   कर  लेते

क़लम  अपनी  उठाये  फिर  रही  है भार  दुनियाँ  का !



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अपना  विधि -विधान  लिये  घूम  रहे  हैं

गीता   कई   कुरान   लिये   घूम  रहे  हैं,


जबसे बराबरी का  सभी को दिया  है हक़

हम  तबसे  संविधान  लिये  घूम  रहे  हैं,


आज़ादी   हुक्मरान   लिये  घूम  रहे  हैं

और  बेबसी   किसान  लिये  घूम  रहे हैं,


वो  तथ्यहीन   ज्ञान   लिये  घूम  रहे  हैं

और   धर्म  की  दुकान लिये  घूम रहे  हैं,


नाजुक  सी  एक  जान  लिये  घूम रहे हैं

किस  बात  का  गुमान  लिये  घूम रहे हैं,


बे-काम   की   लदान  लिये  घूम  रहे  हैं

सब  झूठी   आन-बान  लिये घूम  रहे हैं,


आँखों  में  आसमान  लिये घूम रहे  हैं

उम्मीद  नौ-जवान   लिये  घूम  रहे  हैं,


वो   झूठ   का  बखान लिये  घूम रहे हैं

हम  सत्य  की  ज़ुबान लिये  घूम रहे हैं,


पँछी  यहाँ   उड़ान  लिये  घूम  रहे  हैं

सय्याद  भी  कमान  लिये घूम  रहे  हैं,


इक  चोट  का  निशान  लिये  घूम रहे हैं

हम  दिल  लहू-लुहान  लिये  घूम  रहे  हैं,


हर  आदमी  में  मिलता नहीं फूल सा हुनर

अब  लोग  इत्र-दान   लिये  घूम  रहे  हैं,


वैश्याओं  की  तरह  यहाँ बाजार में हैं अब

सब  अपना  हुस्न-दान  लिये  घूम  रहे  हैं,


इक  वैद्य  की  तलाश में भटकूँ मैं दर-बदर

हम  ज़ख़्म  का  निशान लिये घूम रहे  हैं,


सब  हैं  दिमाग  वाले तो किसको सुनाऊँ मैं

हम  दिल  की  दास्तान  लिये  घूम  रहे  हैं,


ख़ाली  है  मुद्दतों  से  किसी  यार  के  लिये

हम  ज़िस्म  का  मकान  लिये  घूम  रहे हैं!







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रहगुज़र  से  गुज़र  मुहब्बत  कर

ज़िंदगी  है  सफ़र   मुहब्बत  कर,


गलतियाँ   माफ़ कर  मुहब्बत कर

लौट  आ  अपने घर  मुहब्बत कर,


हैं   फ़रेबी    मुकाम   दूनियाँ  के

बे-खुदी  से  न  डर  मुहब्बत कर,


मौन    संवाद  दिल  समझता  है

बोलती   है   नज़र   मुहब्बत कर,


तेरे   पीछे   हैं  ज़ुल्म  दुनियाँ  के

सामने   है   भवँर   मुहब्बत  कर,


इससे  पहले  कि बीत  जाये  उम्र

कद-गुमाँ   से   उतर  मुहब्बत कर,


अपने  र'ब  से  विवाद  कर  लेना

आदमी   से   मगर  मुहब्बत  कर,


इल्म  ज़हनी  दुरस्त  कर  डाला

मैं  तो  था   बे-हुनर  मुहब्बत कर,


क्यों भटकता है  दर-बदर 'बेख़बर'

होश  में   है   अगर  मुहब्बत  कर!







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हालात  के  हाँथों  है  मजबूर

ईटा - पत्थर    ढोये   मज़दूर,


नौकर  जब-जब आराम  करे

मालिक तब-तब हो जावे क्रूर,


जीने  वाला   लाचार  बहुत

और मरने वाला  है  मगरूर,


जिसकी  लाठी   भैंस उसी की

पैसा  ही   है   अब  हर  दस्तूर,


नँगें   पाँव   सफर   करना  है

खुशियाँ  रहतीं  हैं  मीलों दूर,


आखिर सब  उम्र की चक्की में

होना  है  इक  दिन चकना चूर!






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हुई  हासिल  किसी  को वस्ल में  रुख़सार  की  ख़ुशबू

किसी  को  मिल  नहीं  पाई   तेरे   दीदार  की  खुशबू,


गुले-उल्फ़त   खिलाने  की  यहाँ कोशिश तो सब करते

मगर मिलती  कहाँ  सबको  वफ़ा और प्यार की ख़ुशबू,


कि  दोनों  छोर  लोगों   ने   भरम  ये   पाल   रख्खा  है

बहुत  इस  पार  आती  है   तेरे  उस   पार   की  खुशबू,


बुलंदी  ज़िस्म  की  दूनियाँ  में  दो  पल का तमाशा  है

बदन  के  बाद   भी  जिंदा  रहे   किरदार  की  ख़ुशबू,


बनाकर    बात   मीठी   बोलने  से    कुछ  नहीं  होगा

तेरे   लहज़े   से   आती   है  अभी  बाज़ार  की  ख़ुशबू,


बताओ   आप  किस  मक़सद  से  उतरे हो  समंदर  में

मुझे  तो   खीँच   लाई   है   यहाँ   मझधार  की  ख़ुशबू!




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ऐसा  नहीं कि  जंग  से  घबरा  गया  हूँ  मैं

इस ज़िंदगी  की धूप से  मुरझा  गया  हूँ  मैं,


ग़र  जाना चाहता है मुझे  छोड़कर  तो  जा

तिरे  रोज  के  बहानो  से  उकता  गया हूँ  मैं,


अब  भी  नज़र  के  सामने  रस्ते  तमाम  हैं

इक  ज़िद-परस्त  दश्त  से  टकरा  गया हूँ मैं,


ऐ   इश्क    तेरी   आरजू   बर्बाद   कर   गयी

जज्बात  और  यकीन  से  तोड़ा  गया  हूँ  मैं,


अब  हुस्न  दे  मजा न ही  अच्छा  लगे  ख़ुदा

जीवन  के उस मुक़ाम पे अब आ गया हूँ  मैं,


काँटो  की  नोक  से  सिये  हैं  ज़ख़्म  बेख़बर

फूलों  की  सोहबतों  में ही पथरा  गया  हूँ  मैं!


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हालांकि  कुछ   ग़म  आये  हैं

पर   औरों  से  कम  आये  हैं,


ज़ख़्म  ने   ले  ली जान हमारी

तब   जाकर  मरहम  आये  हैं,


काँटों   से  भी   मिलना  होगा

फूलों   के   मौसम   आये  हैं,


तुम   आये   हो   मेरे   हिस्से

तेरे   हिस्से    हम   आये   हैं,


कह  दो  सावन झूम के बरसे

आज  मेरे  हम-दम  आये  हैं!


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हर इक  मोड़  पे  हादसा  दे  रहे  हैं

सफ़र   के  तज़ुर्बे   मजा  दे  रहे  हैं,


तेरा   वार   खाली  नहीं  जाने   देंगे

असर  दर्द  में  कुछ   नया  दे रहे  हैं,


मुझे  पार  कर  लो  नदी कह रही  है

हमीं   नाव   अपनी   डुबा  दे  रहे  हैं


अँधेरे   नहीं  हैं   चरागों  के  दुश्मन

दुकानदार  हैं  कुछ  हवा  दे  रहे  हैं,


कुचलते  हुये  बढ़  सको तो बढ़ो तुम

कहाँ  लोग  अब   रास्ता  दे   रहे  हैं,


नया  मर्ज   होने  की   संभवना  है

जरूरत  से  ज़्यादा  दवा  दे रहे  हैं,


तुम्हें  तो  मिला  एक किरदार उम्दा

मगर  आप  किस्से को क्या दे रहे हैं!


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नई  बुनियाद  नस्लों  की  हमीं  तैयार  करते हैं
कहीं हम ज़ख़्म  देते हैं  कहीं  उपचार  करते  हैं,

कहाँ  चुनता  है कोई  राह  नेकी और मुहब्बत की
मुनाफ़ा  जिस मे होता  है  वही व्यापार करते  हैं,

वो बिन मेहनत किसी की छाँव  में  रहने चली आयी
हम उसके  ज़िस्म की चाहत  में उससे प्यार करते हैं,

ज़रूरत  के  मुताबिक  मोड़  देते  हैं  कहानी  को
नये  चेहरे   लगाकर  रोज  हम किरदार करते  हैं,

समझता  है   कहाँ  कोई  गरीबों  को यहाँ इंसान
सभी  शोषण  हिक़ारत  और अत्याचार करते  हैं!


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बस  इतनी  सच-बयानी  आदमी की
बड़ी   झूठी   कहानी   आदमी  की,

कहाँ  बदली   निशानी   आदमी  की
वही   फ़ितरत  पुरानी   आदमी  की,

बदल  ले  रुख  हवा  के साथ अपना
ग़रज़  बदले   र'वानी  आदमी  की,

जुबाँ  पे   अब  तलक  नादानियाँ  हैं
सफेदी  सर   सयानी   आदमी  की,

हक़ीक़त  से  अलग  हैं ख़्वाब इसके
भरम   में   ज़िंदगानी   आदमी  की,

वफ़ा  का  नाम  किस्सों  में बचा  है
अदा   है   बेईमानी   आदमी  की!


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बड़ा होकर  बड़ा  बनने  की हसरत याद आती है
वो बचपन  याद  आता है  शरारत  याद आती  है,

लिपाई घर  की  गोबर से हर इक त्योहार में होती
अहाते  में  धरे  छप्पर  की  सूरत  याद आती  है,

बुआ  का  प्यार, चाचा से शिकायत रोज दीदी की
बड़े-बूढ़ों  से  पायी  हर  नसीहत  याद  आती  है,

अँगीठी, नून , रोटी , तेल  सरसों का  कहाँ  भूले
वो सिल-बट्टे की चटनी ख़ुश्क लज़्ज़त याद आती है,

वही इक दोस्त  सच्ची थी  मेरे  इस्कूल की लड़की
न  जो  इज़हार  हो  पाई  मुहब्बत  याद आती  है,

न  वो  आँगन  रहा  वैसा  न  वो  रिश्ते  रहे  वैसे
कि अब जब काम पड़ता है  तो कीमत याद आती है!



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अदब  सादगी  है  इबादत  नहीं  है
करूँ  जी-हुज़ूरी ये फ़ितरत  नहीं है,

हुनर  की  बदौलत  मैं पँहुचा यहाँ तक
ये  अज़मत  किसी की इनायत नहीं है,

अगर  साथ  राहों  में चलते  रहो  तुम
मुझे  मंजिलों  की  ज़रूरत  नहीं  है,

नहीं  रास  आते  ये शौहरत के जलसे
अगर  ज़िन्दगी  में  मुहब्बत  नहीं  है,

वो दुनिया से कहता मैं हूँ साम्यवादी
मगर  भाई  पे  नेक  नियत  नहीं  है!

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नदी  तो  है  वही  वर्षों  पुरानी
अगल इंसान ने बुन ली  कहानी

कि अब आते नहीं छुट्टी में बच्चे
किसी से कह रही होगी ये नानी,

फ़रक तुम आदमी में कर रहे हो
बहुत  अच्छी  नहीं ये बद-गुमानी,

सरे-बाजार  पकड़े जाओगे कल
करोगे  कब  तलक तुम बेईमानी,

तुम्हारे शहर में घर-घर है आरओ
हमारे  गाँव का मीठा  है  पानी,

फ़िकर माँ-बाप की वाज़िब है बेख़बर
अगर  बिटिया  लगे  होने  सयानी!

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करो  ना  ज़्यादती ऐसे  मेरे  मेयार  में  साहिब
ज़रूरत  लेके  आयी  है मुझे बाज़ार में साहिब,

फली-फूलीं  दुकाने  नफरतों की झूठ का धंधा
यहाँ तकलीफ़  मिलती है वफ़ा और प्यार में साहिब,

तुम्हारी  सर-परस्ती  में  अगर  होते  रहेंगे  ज़ुल्म
कोई  बेबस  न  आयेगा  तेरे  दरबार  में  साहिब,

सुना  है  बिन  तेरी  मर्ज़ी  के इक पत्ता नहीं हिलता
मुसलसल  ज़ुल्म  होते  हैं   तेरे  संसार  में  साहिब,

बहुत  बेबाक  होकर  बोलता  हूँ  सच  सरे-बाजार
न कोई  और  ख़ामी  है   मेरे  किरदार  में  साहिब,

ग़ज़ल  में  ला  रहे  हैं  हम  नियम विज्ञान के भौतिक
ख़याली  नक़्श  ना  होगें  मेरे  अशआर  में  साहिब!



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ऐसा  नहीं  कि  राह  में  दरिया  नहीं  मिला
माफ़िक  हमारी  प्यास के  कतरा नहीं मिला,

मंज़िल  की  ज़ुस्तज़ू  मुझे  मंज़ूर  कब  हुई
जीवन  की  ओर जाए  वो  रस्ता  नहीं मिला,

करके   दुआ सलाम  मैं  खामोश  हो  गया
बातें  तो  उसकी  ठीक थीं  लहज़ा नहीं मिला,

बच्चे   कई   बाज़ार  में   मजदूर   बन  गये
इस्कूल  तो  मिला    उन्हें  बस्ता  नहीं  मिला,

तुम   ओहदे   को  लेके    परेशान  हो  बहुत
मुझको   हमारे   काम  का  पैसा   नहीं  मिला,

अच्छे  तो  लोग  ख़ूब  हैं  दुनिया  में  बेख़बर
इक  शख़्स  भी  ज़मीर का  पक्का नहीं मिला!



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इक दफ़ा झूठ से फ़ायदा हो गया
और फिर झूठ ही क़ायदा हो गया।

हम दलीलें कई पेश करते रहे
ज़रूरत ने जो चाहा फ़ैसला हो गया।

ज्ञान पापा से ज़्यादा अलग बात है
ये ग़लत है कि लड़का बड़ा हो गया।

मत किसी और को आप इल्ज़ाम दो
लोग थे भीड़ थी हादसा हो गया।

नम मरुस्थल हुए हैं तेरे आने से
पेड़ सूखा हुआ था हरा हो गया।

इससे पहले यहाँ से न गुज़रा कोई
आप क्या चल पड़े रास्ता हो गया।

फूल नाज़ुक थे रोंदे गए बेख़बर
और पत्थर यहाँ देवता हो गया!

ग़ज़ल 

सभी नक़्श हैं पुराने यहाँ कुछ नया नहीं है
चलो देखते हैं चलकर जहाँ रास्ता नहीं है।

नहीं साथ चल सको तो मुझे छोड़ दे ऐ साक़ी
ये नसीब है हमारा कोई ग़म गिला नहीं है।

न यक़ीन हो तुझे तो इसे चीर के दिखा दूँ
मेरे दिल में सिर्फ़ तुम हो कोई दूसरा नहीं है।

दुनिया ने ग़म दिए हैं मुझे बेवजह हज़ारों
मैं शराब पी रहा हूँ कोई आसरा नहीं है।

मुझे रास आ रही है ये नदी भँवर ये लहरें
यही डूबने दे कश्ती मेरा ना-ख़ुदा नहीं है।

तिरि जुस्तजू में जानाँ  मैं करीब आ रहा हूँ
अभी शहर में नया हूँ तिरा घर पता नहीं है।

ग़ज़ल - वैभव बेख़बर

इम्तिहान-ए-ज़िन्दगी मुश्किल रहा है इन दिनों
दूसरे साँचे में सिक्का  ढल रहा है इन दिनों।

इक नदी के तीर हमको प्यास लेकर आ गई
जिस्म जल में डूबकर भी जल रहा है इन दिनों।

नेकियों की झील को अरसा  हुआ सूखे हुए
आदमी ही आदमी को छल रहा है इन दिनों।

सच के ख़ातिर बे-करारी थोड़ी-थोड़ी बढ़ रही
थोड़ा-थोड़ा चैन दिल को मिल रहा है इन दिनों।

कर रहा हूँ साफ़ मैं इक ख़्वाब की तस्वीर को
नींद से झगड़ा हमारा चल रहा है इन दिनों।

पीर दिल की दे रही आवाज़ तुमको बेख़बर
रूठकर जाना तुम्हारा खल रहा है इन दिनों!

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लाख  बिखरे थे , जाते  सँवर इक दफा
हाल  तुम   पूछ  लेते   अगर  इक दफा,

बेरूखी   है  अगर   आपकी   बज़्म  में
प्रेम  कर   लीजिये  भूलकर  इक दफ़ा,

दर्द-ए-मझधार  तो  रोज  का   है  मेरा
पार    तुम  कर  रहे हो  भँवर  इक दफ़ा,

रुत   जवाँ   लौटकर  फिर  कहाँ आयगी
बीत   जाये   अगर  ये  उमर  इक  दफ़ा,

क्यों  भटकते  हो  तुम दर-बदर  बेख़बर
राह-ए-उल्फ़त  हसीं  है  गुज़र  इक दफ़ा!

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दायरों  में  हैं  कुछ,  कुछ  घने  हैं  यहाँ
ज़िन्दगी  के  कई   मायने   हैं  यहाँ,

धुल  गये  आपके  ये  अलग  बात  है
जुर्म   से   हाँथ  सबके  सने  हैं  यहाँ,

तथ्य और तर्क बिन  कैसे  होंगे मुक़म्मल
ख़्वाब   तुमने   ख़याली   बुने  हैं  यहाँ,

प्रेम  में   लोग  कुछ   आदमी बन  गये
जानवर  कुछ  अभी तक  बने  हैं  यहाँ,

बिन  तज़ुर्बे  के   सीरत  न  आये  समझ
सूरतों    के   लिये   आइने  हैं  यहाँ,

अब  सियासत  में  बजने  लगे  बेख़बर
पक्षपाती    कई    झुनझुने   हैं  यहाँ!

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आज  नहीं  तो  कल  बोलेंगे
अपना - अपना  सच  बोलेंगे,

कल  कौन कहाँ  पे  ठहरा था
राही   मंज़िल   पथ   बोलेंगे,

विज्ञान हटा देगा  हर  पर्दा
आप हक़ीक़त  ख़ुद  बोलेंगे,

कितनी जीभें काटोगे  साहब
आदम   अपना  हक़  बोलेंगे,

उस दिन  झूठे  तख़्त  ढ़हेंगे
जिस दिन मिलकर सब बोलेंगे,

अब तो  मुर्दे   बोल  रहे  हैं
पत्थर  आखिर  कब  बोलेंगे!









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साहित्य किराना स्टोर लेखक-वैभव बेख़बर