2024 ग़ज़ल vaibhav Bekhabar
कायल कर देतीं हैं आँखे
पागल कर देतीं हैं आँखे,
ग़म को अश्क बनाती हैं कुछ
बादल कर देतीं हैं आँखे,
जब जब तीर नज़र से चलते
घायल कर देतीं हैं आँखे,
चाहें कैसा भी हो प्रश्न
सब हल कर देतीं हैं आँखें,
इश्क़ का राही अक्सर भटके
जंगल कर देतीं हैं आँखे,
अर्थ कई लेकर लफ़्ज़ों को
ओझल कर देतीं हैं आँखे,
झुक झुक कर जब जब हैं उठतीं
हल-चल कर देतीं हैं आँखे,
ख़ुद उड़तीं हैं और बदन को
पैदल कर देतीं हैं आँखे !
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भटके तमाम उम्र इन्ही रास्तों के बीच
गुज़री तमाम उम्र मेरी साजिशों के बीच,
हम लोग अपने ज़िस्म से आगे न बढ़ सके
उलझी रही ये जिंदगी कुछ ख़्वाहिशों के बीच,
मज़हब के नाम पर हुये लिक्खे-पढ़े शरीक
इक जंग चल रही है यहाँ बुजदिलों के बीच,
दुनियाँ ने थे गढ़े यहाँ रस्म-ओ-रिवाज जो
हम जन्म से बड़े हुए उन फ़ासलों के बीच,
कुछ कौंधती है याद तेरी दिल में इस कदर
बिजली चमक रही हो जैसे बादलों के बीच,
अब दोस्ती का हाँथ बढ़ाकर चलेंगे चाल
ये बात हो रही है मेरे दुश्मनों के बीच!
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रास्ते बनाने में उम्र बीत जाती है
इक मुक़ाम पाने में उम्र बीत जाती है,
शोहरतें कमाना आसान हो गया है अब
नेकियाँ कमाने में उम्र बीत जाती है,
यूँ तो खूब लोगों से नैन-नक्श मिलते हैं
दिल से दिल मिलाने में उम्र बीत जाती है,
दूरियाँ हो जाती हैं सिर्फ़ इक ग़लतफैमि से
फ़ासले मिटाने में उम्र बीत जाती है,
इक झलक में दिल को जो शख़्स रास आता है
फिर उसे भुलाने में उम्र बीत जाती है,
भूख कैसी होती है पूछिये गरीबों से
कब्ज को मिटाने में उम्र बीत जाती है,
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सफ़र नया सड़क नयी ही चाल है
दिशा- दशा में इसलिये उछाल है,
तेरे बगैर ज़िंदगी मुहाल थी
मैं जी रहा हूँ बिन तेरे कमाल है,
तुम्हें हमारी फ़िक्र तक नहीं है अब
मुझे तुम्हारा आज भी ख़याल है,
हज़ारों हाँथ कर रहे हैं कोशिशें
मगर किसी हुनर में इक जमाल है,
सुकून से हो किस तरह गुजर-बसर
यही हमारे सामने सवाल है,
जिन्हें समझना चाहिये था खुद-ब-खुद
वो पूछते हैं क्या हमारा हाल है!
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सफ़र में हैं मगर बहके हुए हैं
मेरे हालात कुछ बिगड़े हुए हैं,
भला दूजा कोई कैसे मिलाये
हम अपने आपसे बिछड़े हुए हैं,
नज़र आये कहाँ से अब हक़ीक़त
यहाँ किरदार सब पहने हुए हैं,
कदम चलते तो राहें नाप लेते
किसी उम्मीद में ठहरे हुए हैं,
बहुत है दूर मंज़िल ज़िंदगी की
अभी हम ज़िस्म में उलझे हुए हैं,
फ़क़त बाँधें हुए हैं ज़िस्म, साँसे
दिलों से हम सभी बिखरे हुए हैं
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धार उल्टी ही थोड़ी बहने दे
दर्द दुनियाँ के मुझको सहने दे,
तेरे बारे में कुछ बताना है
बात मुश्किल है आज कहने दे,
दूर रहकर भी लोग जीते हैं
प्यार सच्चा है दिल में रहने दे,
मीर-मीरा की राह आया हूँ
ग़म के शोलों में दिल ये दहने दे,
बुर्ज इक रोज फिर बना लूँगा
आज ज़ुल्मी को ज़ुल्म ढहने से
शायरी खेल है तसव्वुर का
अपनी मर्ज़ी के शेर कहने दे,
तंज सुनने की मुझको आदत है
मेरा अंदाज़ मेरा रहने दे,
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हम आदतन भला करेंगे उम्रभर
फ़क़ीर और क्या करेंगे उम्रभर,
भले हों लाख नफ़रतें आशना
हम इश्क़ इन्तेहाँ करेंगे उम्रभर,
जहाँ भी दिल करे हो जाना तुम जुदा
हम आपसे वफ़ा करेंगे उम्रभर,
ये बे-रहम हुक़ूमतें, गरीब हम
लगान ही अता करेंगे उम्रभर,
हवाओं से है सामना तो क्या हुआ
चराग़ सा जला करेंगे उम्रभर,
ये ज़िंदगी तबाह तुम ही कर गए
तेरे लिये दुआ करेंगे उम्रभर !
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ज़िंदगी, ज़िंदगी का सफर दे गया
कुछ मुक़द्दर में था कुछ हुनर दे गया,
बच गये जंगलों में भटकने से हम
इक मुसाफ़िर मुझे रहगुज़र दे गया,
मुद्दतों पार जिस को लगाते रहे
कश्तियों को मेरी वो भँवर दे गया,
अंदरूनी दशा देख लेते हैं अब
इश्क़ आँखों को ज़ौके-नज़र दे गया,
ज़िक्र जब भी सुना मैंने उस नाम का
वक़्त माज़ी का सारा असर दे गया,
चाहकर भी न होंगे ये तय उम्रभर
फ़ासले दिल को वो इस कदर दे गया!
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चल रहा है निज़ाम पैसों का
बन गया तन ग़ुलाम पैसों का,
ज़िंदगी की हर इक ज़रूरत में
ज़िक्र है सुब्ह-शाम पैसों का,
बेच डाले ज़मीर लोगों ने
पढ़ रहे हैं क़लाम पैसों का,
ख़ाक सबकी तो एक जैसी है
मैंने देखा सलाम पैसों का,
उस तरफ राह में चलो तुम भी
जिस तरफ हो मक़ाम पैसों का,
शौक़ है शान है ज़माना है
बस यही है अराम पैसों का,
गर तमन्ना है ख़्वाब पूरे हों
कीजिए इंतिजाम पैसों का !
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कोई राजा है ना रानी है
फिर भी अपनी एक कहानी है,
चार दिनों का मेला है जीवन
रुत दो दिन की यार जवानी है,
मेरे हिस्से आयी है गुरबत
रोजी - रोटी रोज कमानी है,
ये बात नहीं पानी के बस की
अब मछली की प्यास बुझानी है,
इस दुनियाँ से क्या लेना-देना
जब अपनी ही ख़ाक उड़ानी है,
मेरा जीवन पतझर कर डाला
उस लड़की का नाम सुहानी है,
अफ़सोस में अश्क़ बहाना कैसा
पावन गंगा सा ये पानी है!
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इक न इक दिन मुक़ाम मिलते हैं
राह की धूप में जो जलते हैं,
ज़ख्म तो कुछ दिनों में भर जाता
मुद्दतों रंज साथ चलते हैं,
होती है जंग उम्रभर ख़ुद से
उम्रभर दाँव-पेच चलते हैं,
सोच लेता हूँ हश्र, हाकिम का
दिल में अरमान जब मचलते हैं,
वक़्त के साथ रंग चढ़ता है
वक़्त के साथ रंग ढलते हैं,
दोस्तों दौर है ये दौलत का
लोग पहलू बहुत बदलते हैं!
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अक़्ल से कुछ कच्चे लगते हो
अब भी तुम बच्चे लगते हो,
ताला माँग रहा है चाभी
लेकिन तुम गुच्छे लगते हो,
शक़्ल से दिखते भोले-भाले
रंगत के लच्छे लगते हो,
हर झूठ तुम्हारा मालूम है
जाने क्यों सच्चे लगते हो,
और तो कोई बात नहीं है
मुझको तुम अच्छे लगते हो!
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बात ही बात में इज़हार बदल सकता है
नर्म लहज़ा हो तो अग़्यार बदल सकता है,
तल्ख़ हालात हैं हालात से लड़ते रहिये
वक़्त सरदार है दस्तार बदल सकता है,
रोज गिरगिट की तरह रंग बदलता रहता
ख़ुद-गरज़ जिस्म है किरदार बदल सकता है,
बस यही सोच के दरिया में उतर आया हूँ
रज़्म इस पार का उस पार बदल सकता है,
अहद के क़ायदे क़ानून भला कब माना
इश्क़ ग़र ठान ले सँसार बदल सकता है,
आपको देख के पत्थर भी पिघल जाता है
आप जो छू ले तो अंगार बदल सकता है!
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गुमाँ ना कर तू अपनी शह-नशी का
समय आता है इक दिन हर किसी का,
बदलता है ज़रूरत के मुताबिक
यहाँ रंग-रूप लहज़ा आदमी का,
सँभालो दिल, बड़ा नाज़ुक शज़र है
कहीं मुरझा न जाये गुल खुशी का,
सफ़र चुनने से पहले सोच लेना
न मौका फिर मिलेगा वापसी का,
वो दुश्मन बन के भी मिलता है हँस के
अदब है ये पुरानी दोस्ती का,
निकलता ही नहीं दिल से हमारे
वो हिस्सा बन गया है ज़िंदगी का,
भटकने का भी इसमें इक मजा है
सफ़र मैंने चुना है शाइरी का,
कोई वादा न कर जनमो-जनम का
भरोसा कुछ नहीं इस ज़िंदगी का!
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वक़्त अभी मगरूर बहुत है
मुझमें भी मकदूर बहुत है,
पत्थर हो गए पाँव हमारे
अब भी मंज़िल दूर बहुत है,
मालिक हैं अपनी मर्ज़ी के
दुनियाँ का दस्तूर बहुत है,
आँखों में चश्मा है लेकिन
ज़हन में उसके नूर बहुत है,
लुफ़्त उठाये चाटूकार
मेहनत-कश मजबूर बहुत है
कीमत में कोई छूट न देगा
सौदागर वो क्रूर बहुत है,
मरहम के बस की बात नहीं
ज़ख्म मेरा नासूर बहुत है,
मत लाना तुम चाँद-सितारे
चुटकी भर सिंदूर बहुत है!
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बाजार ज़िंदगी है....... हक़दार बेचते हैं
अक्सर बदल बदल के...... किरदार बेचते हैं,
हर शख़्स की तलब में ......दौलत शुमार है अब
इस पार ना बिके जो ....... उस पार बेचते हैं,
क़ीमत लगा के उसने.....दुनियाँ को है बताया
दफ़्तर खरीदतें हैं ............. दस्तार बेचते हैं,
बाज़ू कतर न जाएं,....... चलना सँभल सँभल के
इस दश्त के परिंदे ............. रफ़्तार बेचते हैं,
होते किसी ख़बर में.......... ईमान बेचते गर
लड़के ग़रीब घर के......... अख़बार बेचते हैं,
ये दिल का मामला है ............ समझें हकीम कैसे
उपचार इश्क़ का ख़ुद......... बीमार बेचते हैं!
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बात सब करते डुबाकर चाशनी में
अब वफ़ा मिलती कहाँ है आदमी में,
रूह अपनी जल चुकी है तिशनगी में
वक़्त गुज़रा दर-बदर की बेबसी में,
इक ही ख़्वाहिश उम्रभर दिल ने सँभाली
ना हुई वो भी मुक़म्मल ज़िंदगी में,
मुद्दतों मन के अँधेरों से लड़े हम
रफ़्ता-रफ़्ता आ रहे हैं रोशनी में,
दुश्मनों की फ़ितरतों से बा-ख़बर थे
हम अमूमन चोट खाये दोस्ती में,
महफ़िलों में कुछ किया तब्दील ख़ुद को
कुछ मजा आने लगा है शाइरी में !
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बढ़ा रहे हो दूरियां गरीब से
बस एक बार देख लो क़रीब से,
हुआ ये दिल तबाह तो हबीब से
तुझे ख़ुशी मिले मेरे रक़ीब से,
हुनर हज़ार कोशिशों में गुम रहा
शिकस्त खा गये फ़क़त नसीब से,
ठहर सका न दिल सफ़र में एक पल
मुक़ाम तो मिले मगर अजीब से,
तू देख ले इसे लबों से चूमकर
ये ज़ख़्म जो भरा नहीं तबीब से,
ये बीज अब सियासी भेदभाव का
दुरुस्त दश्त बन गया ख़तीब से !
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सही के साथ जाना सीखना है
ग़लत पहचान पाना सीखना है,
नहीं सारा ज़माना सीखना है
तुम्हें बस आबो-दाना सीखना है,
हुनर नाकाम ना हो इसलिए बस
ख़ुदी को आज़माना सीखना है,
दीयों को कब अंधेरो ने बुझाया
हवा का ताना-बाना सीखना है,
सरों की तर्ज़ आनी चाहिए सब
भले ही इक तराना सीखना है,
जिसे पाने की वर्षों कोशिशें की
उसी से दूर जाना सीखना है!
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मां-बाप के दुलार में लड़के बिगड़ गए
इस उम्र की बहार में लड़के बिगड़ गए
कच्ची उमर में हो गया दीदार हुस्न का
देखो तुम्हारे प्यार में लड़के बिगड़ गए
चारागरों से ना हुआ इस मर्ज़ का इलाज
इस इश्क़ के बुखार में लड़के बिगड़ गए
शर्मो-हया का दौर था जब हम जवान थे
आकर नये दयार में लड़के बिगड़ गए,
इस्कूल से बचा लाये जो ख़ुद को बेख़बर
कॉलेज की बहार में लड़के बिगड़ गए!
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ये माना तुम्हारे दीवाने बहुत हैं
मगर मेरे चावल पुराने बहुत हैं,
हुनर हाँथों के आजमाने बहुत हैं
है इक ज़िंदगी और फ़साने बहुत हैं,
कि ऐसा नहीं है कि चाहत नहीं है
मगर फ़र्ज़ मुझको निभाने बहुत हैं
अगर पाँव कट जाएं तो फ़ायदा क्या
सफ़र मानता हूँ सुहाने बहुत हैं,
करूँ क्या मैं जो तुम जवां हो हसीं हो
अदा, नाज़-नख़रे बहाने बहुत हैं,
सुधरता नहीं ग़र तेरा बे-सुरापान
तो मेरे लिए भी तराने बहुत हैं,
कमी इल्म या कुछ तज़ुर्बे होगी
तेरे आइने धुंधलाने बहुत हैं!
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जादू पर विश्वास न रखना
और किसी से आस न रखना,
जो करता हो दुनियादारी
उसको अपने साथ न रखना,
चाहें जीत लिया हो दरिया
हद से ज़्यादा प्यास न रखना,
जो समझें ना जज़्बातों को
उससे दिल की बात न रखना,
जी ना लागे जब दूरी हो
कुछ भी इतने पास न रखना,
जीना चाहें काँटा बनकर
फूलों सा अंदाज़ न रखना!
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ख़ुशी से हर क़दम मिले ख़ुदा करे
तुम्हें न कोई ग़म मिले ख़ुदा करे,
न सामना हो ज़िंदगी की धूप से
अग़र मिले तो नम मिले ख़ुदा करे,
गये हो मुझ को छोड़कर जहाँ कहीं
वहाँ हसीं करम मिले ख़ुदा करे,
मेरे नसीब में लिखीं हैं रुख़्सतें
तुझे तेरा सनम मिले ख़ुदा करे,
मेरे गुलाम हाँथो में थी बेड़ियाँ
तुझे वरक़ कलम मिले ख़ुदा करे!
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सुहाना है सफ़र चलो चलें उधर
जहाँ गई डगर चलो चलें उधर,
सुना है दोस्त की, तलाश है उन्हें
उड़ी है ये ख़बर चलो चलें उधर,
ख़याल की हवा, बदन सिहर उठे
जहाँ लगे जिगर, चलो चलें उधर
न अब कोई यहाँ मेरा रहा हबीब
जहाँ मिले क़दर, चलो चले उधर,
हज़ारो कश्तियाँ ये झील खा गई
न हो जहाँ भवँर चलो चले उधर,
मशीनी जंग है तुम्हारे शहर में
मची है अब ग़दर चलो चलें उधर,
यहाँ कली का क़त्ल, बागवां करें
जहाँ खिले हुनर , चलो चलें उधर,
ये शहर है बहेलियों का बेख़बर
यहाँ कटेंगे पर, चलो चलें उधर!
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दुनियाँ भर के ग़म निकले हैं
जिस रस्ते पर हम निकले हैं,
आसान बहुत थे कल तक जो
आज वहीं ज़ोखम निकले हैं,
मजबूरी काम कराती वो
जिसमें लाखों दम निकले हैं,
ख़्वाहिश तो ना थी फूलों की
काँटों के मौसम निकले हैं,
आँखे, गंगा , जमुना जैसी
चेहरे पर संगम निकले हैं!
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दरो-दीवार से लड़ना पड़ेगा
किसी दिन यार से लड़ना पड़ेगा,
कभी भिड़ना पड़ेगा बारिशों से
कभी अंगार से लड़ना पड़ेगा,
समंदर से मुहब्बत हो गई है
मुझे मझधार से लड़ना पड़ेगा
तमन्ना है अगर इंसाफ़ की तो
हर इक दरवार से लड़ना पड़ेगा,
तभी इक़रार की अनुमति मिलेगी
बहुत इनकार से लड़ना पड़ेगा,
बनानी है अगर मंज़िल नई तो
नये मेयार से लड़ना पड़ेगा,
कोई किस्सा मुक़म्मल यूँ न होगा
तुम्हें किरदार से लड़ना पड़ेगा,
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किनारा कर रहे हैं हर किसी से
बहुत उकता चुके हैं ज़िंदगी से,
ये दिल बहला रहे हैं बेख़ुदी से
गिले-शिकवे नहीं हैं अब किसी से,
यहाँ मतलब का सिक्का चल रहा है
कोई रिश्ता कहाँ हैं आदमी से,
ज़रूरत अब रही ना रोशनी की
क़दम आये यहाँ तक तीरगी से,
रहम है दुश्मनों का, कद बचा है
हुये बर्बाद हम तो दोस्ती से,
सुख़न से ज़िस्म तौबा कर रहा है
गुजारा हो सका ना शायरी से!
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प्यार में अक्सर धोखा खाते हैं
गुस्से में काम बिगड़ जाते हैं,
ऐसे भी बढ़ जाती है दूरी
जब हद से ज़्यादा बढ़ जाते हैं,
मर्ज़ अमीरों को भी लगता है
अच्छा अच्छा पीते खाते हैं,
हर इल्म किताबों में नहीं मिलता
कुछ दर्द, तज़ुर्बे दे जाते हैं,
चलने को दुनियाँ चलती राहें
सब पाँव कहाँ मंज़िल पाते हैं,
पानी चाय पिलाना पड़ता है
जब मेहमान कोई घर आते हैं!
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दुश्मन दोस्त या जिनको रिश्तेदार समझते हैं
दुनियाँ वाले इसको ही बाज़ार समझते हैं,
दर्शन की बातें करते चार किताबें पढ़ लिखकर
असली मतलब जीवन का लाचार समझते हैं,
व्यापार समझते होंगे टाटा-बिरला लोहे का
पर लोहे की परिभाषा लोहार समझते हैं,
मंत्री-सन्तरी गाथा गाते रोज तरक़्क़ी की
हालत देश की अच्छे से सरकार समझते हैं,
इसके मुँह पर इसकी, उसके पर उसकी बात
ये लोग कहाँ अब अपना किरदार समझते हैं,
तैर के दरिया पार किया हैं मैंने हज़ार दफ़ा
तब पानी का रस्ता और मझधार समझते हैं!
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कोई फ़नकार दे मुहब्बत का
या तो उपचार दे, मुहब्बत का,
ख़ूब दरगाहों में झुकाया सर
अब तो दरबार दे मुहब्बत का,
जिसमें कीमत हो सिर्फ़ रिश्तों की
ऐसा बाज़ार दे मुहब्बत का,
जंग, नफ़रत की ख़त्म करनी है
कोई औज़ार दे मुहब्बत का,
मेरी आँखों का मर्ज़ मिट जाए
ग़र वो दीदार दे मुहब्बत का,
कुछ कहानी मेरी मुक़म्मल हो
एक किरदार दे मुहब्बत का!
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आदम की जात हमारी है
हर शख़्स यहाँ किरदारी है,
ख़्वाहिश की रणभूमि खड़े हैं
इक जंग मुसलसल जारी है,
जीने की आस लगाए हैं
मरना भी ज़िम्मेदारी है,
इस कोशिश से भी सीखा कुछ
इक बाजी फिर से हारी है,
लाख तज़ुर्बे हैं जीवन के
रस्ता, मंज़िल पर भारी है,
आसानी है इक तबके में
इक तबके में दुशवारी है,
उसका कोई उपचार नहीं
जिसको ज़हनी बीमारी है!
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कब लिखी आसमाँ ने ज़मी की ग़ज़ल
हाशिये पर खड़े आदमी की ग़ज़ल,
ज़िक्र जिसमें अँधेरों का आया न हो
वो मुक़म्मल नहीं रोशनी की ग़ज़ल,
चंद लम्हों का ये सफ़र ही न था
रफ़्ता-रफ़्ता खिली ज़िंदगी की ग़ज़ल,
रहनुमाओं ने ज्योँ रहनुमाई करी
रहज़नों ने रची रहबरी की ग़ज़ल,
तुम ग़रीबों से जाकर सुनों बेख़बर
दाल-चावल नमक झोपड़ी की ग़ज़ल !
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किसी दिन इल्म ये फ़नकार होगा
ज़माना कब तलक़ दुशवार होगा,
के जब दंगल सरे-बाज़ार होगा
जो जीतेगा वही सरदार होगा,
यहाँ ना चाटुकारी अब चलेगी
हुनर का दब-दबा इस बार होगा,
हक़ीक़त की हदों में ख़्वाब देखो
हर इक सपना नहीं साकार होगा,
सफ़ीने नाख़ुदा के लुट चुके हैं
जो तैरेगा वो दरिया पार होगा,
मिलेंगीं मंज़िलें मेहनत-कशों को
नकारा आदमी लाचार होगा,
कहानी तब समझ आयेगी तुमको
मुक़म्मल जब मेरा किरदार होगा,
मुक़द्दर में लिखी खाना-बदोशी
कहाँ अपना दरो-दीवार होगा,
क़लम की क़द्र करना सीख लो तुम
वगरना हाथ में हथियार होगा,
नयन पागल हमारे हो रहे हैं
न जाने कब तेरा दीदार होगा!
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ज़िंदगी सब्ज़ कर के देखो तो
ख़्वाब आँखों मे भर के देखो तो,
ग़र समझना है बात का मतलब
उसके लहज़े को पढ़ के देखो तो,
जीतने का गुमान टूटेगा
अपने भीतर से लड़ के देखो तो,
जाति का ज़हर कैसे चुभता है
साफ नाली को कर के देखो तो,
कुछ दिनों के लिए महल छोड़ो
मेरी बस्ती में रह के देखो तो,
छल करेंगे कभी न गुल की तरह
प्यार काँटों से कर के देखों तो,
फ़लसफ़ा है यही इबादत का
ज़ख़्म लोगों के भर के देखो तो!
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ख़्वाहिशों की ज़ुस्तज़ू में जागता सोता रहा
दर्द का अहसास दिल को उम्रभर होता रहा,
भूख के बाज़ार में उलझी रही ये ज़िंदगी
बेबसी का बोझ अक्सर ज़िस्म ये ढोता रहा,
अस्ल की बुनियाद पर होगा किसी दिन फ़ैसला
इस ज़मीं पर इंकलाबी बीज मैं बोता रहा!
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इक दूजे को ताक रहे हैं
धीरे- धीरे जाग रहे हैं,
अक्सर दिल के पास रहे हैं
जिसके जिसके साथ रहे हैं,
इश्क़ की हर बात समझते हैं
हुस्न के हम भी दास रहे हैं,
सोच-समझ के चलते कछुए
खरगोश सभी भाग रहे हैं,
कोई समझा दे चिड़ियों को
कुछ दिन हम भी बाज रहे हैं,
धरती पर हैं पाँव हमारे
कद अम्बर का नाप रहे हैं!
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तुम्हारे साथ चलना चाहती है
कहानी रुख़ बदलना चाहती है,
ये मिट्टी रंज से उकता चुकी है
किसी साँचे में ढलना चाहती है,
मुझे भी ज़िस्म की चाहत बहुत थी
मग़र अब रूह मिलना चाहती है,
उसी चिंगारी को इज्ज़त मिलेगी
जो दीपक बनके जलना चाहती है,
नई रुत की लगाये आस बैठी
ये तितली फिर मचलना चाहती है!
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न लौटे तुम मनाने ज़िंदगी में
न लौटे दिन सुहाने ज़िंदगी में
हसीं कुछ ताने-बाने ज़िंदगी में
बहुत ग़म के फ़साने ज़िंदगी मे,
हमारा हाल, मुझसे पूछते हो
मुझे तुम कितना जाने ज़िंदगी में,
गया जो छोड़कर वो ख़ल रहा क्यों
वैसे सब हैं बिगाने ज़िंदगी में,
ज़माना ढूंढ़ लेता है हक़ीक़त
नहीं चलते बहाने ज़िंदगी में,
अकेले राह, सच की चल रहे थे
उमर भर तिलमिलाने ज़िंदगी में,
ज़बरदस्ती सुनाये जा रहे हैं
हमें क़ौमी तराने ज़िंदगी में
ग़रीबी झेलती खाना-बदोशी
कहाँ हैं आशियाने ज़िंदगी में!
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ऐसा नहीं की, कहानी से अलग हो गए
इक बाग की बागवानी से अलग हो गए,
हम प्यास में दर-बदर फिरते रहे उम्रभर
जब पाया दरिया तो पानी से अलग हो गए,
जबसे हुनर की हक़ीक़त को किया है क़ुबूल
तक़दीर की मेहरबानी से अलग हो गए,
हम भी रहे थे उछल, दुनिया की इस भीड़ में
अच्छा हुआ बेईमानी से अलग हो गए,
मैंने भी हर बात बिल्कुल आप जैसी कही
क्यों लफ़्ज़ मेरे मआनी से अलग हो गए,
जिस उम्र में लोग करते हैं अदाओं का ज़िक्र
उस उम्र में हम जवानी से अलग हो गए,
टूटा है दिल इस क़दर ऐतबार में बेख़बर
हम इश्क़ की बद-गुमानी से अलग हो गए!
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माना मुक़ाम इश्क़ में हासिल नहीं हुआ
अच्छा हुआ कि यार मैं पागल नहीं हुआ,
अंदाज़ रंग रूप लुभाया तो था मुझे
पर दिल तुम्हारे हुस्न का क़ायल नहीं हुआ,
आबो-हवा के धूप से रिश्ते बिगड़ गए
पानी जमीं का सूख के बादल नहीं हुआ,
सच बोलकर हम उनके गुनहगार हो गए
करके हमारा क़त्ल जो क़ातिल नहीं हुआ,
कोशिश तो लोग करते थे पूरे ज़ुनून से
मैं ही सवाल ऐसा था जो हल नहीं हुआ,
बस दूर हो गया वो नज़र , ज़िस्म जान से
अब तक हमारी रूह से ओझल नहीं हुआ,
भटकेगा दर-बदर फिर किरदार बेख़बर
किस्सा हुआ है ख़त्म, मुक़म्मल नहीं हुआ!
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हुनर सीखो हक़ीक़त बोलने का
ज़माना चल रहा है हौसले का,
कि जब तुम चाल अपनी चल रहे थे
तुम्हें मौका मिला था सोचने का,
कभी ना देख पाये सीरतें हम
भरोसा कर रहा था आइने का,
हमारे दरमियाँ जो फ़ासला है
ये है अंजाम तेरे फ़ैसले का,
जहाँ नुकसान का ज़ोखिम बहुत है
वहीं है रास्ता बेहतर नफ़े का,
तुम्हें कंकर जुटाने चाहिये कुछ
अभी नीचे बहुत है जल घड़े का,
हसीं रंग-रुप में खोये रहे हम
तज़ुर्बा था उसे दिल तोड़ने का!
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बहुत किस्से सुने हमनें ज़माने से बुलंदी के
कोई नज़दीक ना पहुँचा बहाने से बुलंदी के,
कि चलने को तो चलती है सड़क पर भीड़ दुनियाँ की
हुनर के तीर ही चलते निशाने से बुलंदी के,
कोई मंज़िल कोई पदवी बिना कोशिश कहाँ मिलती
दीवाने हैं तो हम भी इक ज़माने से बुलंदी के!
ज़िस्म से ज़िस्म का व्यापार अलग होता है
ज़िस्म शामिल है मगर प्यार अलग होता है,
एक ही शख्स के खातिर जंग लड़ जाता है
इश्क़ में ज़हन तलबगार अलग होता है,
अपने हालात से जीते हैं सभी जीवन को
हर किसी का यहाँ किरदार अलग होता है,
फूल तो फूल हैं खूशबू के लिए होते हैं
हाँ मगर लौंग का मे'यार अलग होता है,
ख़्वाब देखे हैं हक़ीक़त भी देखी आँखों ने
रूह से जो भी हो दीदार अलग होता है!
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पल-पल में किरदार बदलते रहते हैं
लोग नये हैं, यार बदलते रहते हैं,
बंदोबस्त हिफ़ाज़त का बदला है कुछ
ज़ालिम भी हथियार बदलते रहते हैं,
पेंड कहाँ नाराज़ किसी से होते हैं
पँछी तो घर-द्वार बदलते रहते हैं,
सौदागर को इतना तो मालूम है अब
सातों-दिन बाजार बदलते रहते हैं,
इक दो मलिक बदले हैं इस बंगले ने
लेकिन पहरेदार बदलते रहते हैं,
कश्ती के बारे में भी कुछ सोंचो अब
आप फ़क़त पतवार बदलते रहते हैं,
अपनी गरीबी दूर नहीं कर पाते हैं
लोग यहाँ सरकार बदलते रहते हैं,
कौन बुलंदी पर ठहरा है, कितनी देर
पद के दावेदार बदलते रहते हैं,
काँटे अपनी अस्ल हकीकत रखते हैं
गुल अपना आकार बदलते रहते हैं,
पाँव में मेरे इक चप्पल है बरसों से
आप गले का हार बदलते रहते हैं,
साहिल आवाज लगाता है उस पार का
लेकिन हम मझधार बदलते रहते हैं,
राह चलो थोड़ी सी, लेकिन नेकी की
मंज़िल के मेयार बदलते रहते हैं,
हर मिसरे का स्वाद निराला होता है
ग़ज़लों में अशआर बदलते रहते हैं! .......वैभव बेख़बर
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वक़्त जब बेरुखी दिखाता है
प्यास को प्यास से मिलाता है,
जोंक उसका ही खून पीती है
वो जो मेहनत की रोटी खाता है,
ज़िस्म को ज़िस्म से मुहब्बत है
कौन दिल रूह से लगाता है,
भीड़ में दम भले निकल जाये
राह कोई कहाँ बनाता है,
कल जिसे भूलना न-मुमकिन था
याद करने से याद आता है,
अब हमें ज़िस्म से निकाले कोई
हुस्न की कैद में आ जाता है,
एक दिन खाली हाँथ जाने को
आदमी उम्रभर कमाता है,
उम्र लम्हों में बीत जाती है
ज़िस्म ढलता हुआ तमाशा है!
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कहने में आसान बहुत है
करने में व्यवधान बहुत है,
धोखा खा जाता है अक्सर
दिल अब भी नादान बहुत है,
आखिर कितना चल पाओगे
पास तेरे सामान बहुत है,
बाहर-बाहर इक महफ़िल है
भीतर दिल वीरान बहुत है
छिपकर वार नहीं करता है
दुश्मन का अहसान बहुत है,
मुझको लाभ मिला है इसका
पर इश्क़ में नुकसान बहुत है,
दिल दे बैठे एक नज़र में
जिससे दिल अनजान बहुत है!
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पग बढ़ाने हैं धरा पर, नभ हमें हैं नापने
द्वंद की दीवार जब तक है हमारे सामने,
तर्क की बुनियाद पर कुछ तथ्य खोजो भीतरी
बाहरी आकार ही दिखला सकेंगें आइने,
ज्ञान की पतवार लेकर, पार कर लो ये नदी
और सब मैदान तुमको जीत कर हैं हारने,
ज़िंदगी के सत्य से, ये ज़िस्म मीलों दूर है
झूठ मानों जो पढ़ा है जो सुना है आपने,
कौम,मज़हब, पंथ लेकर नफ़रतों तक आ गये
आदमी को आदमी से ये लगे अब बाटने!
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चलना सँभल सँभल के अब बाजार में हो तुम
कश्ती नदी के बीच है मझधार में हो तुम,
क्यों चल रहे हो चाल ये ईमान बेचकर
क्यों लोभ मोह माया के व्यवहार में हो तुम,
शोहरत की जीत का यहाँ हर जश्न है फ़ितूर
तुम जानते नहीं हो कि किस हार में हो तुम,
उस बार क्या बनोगे करम तय करेंगे यह
इस बार इक मनुष्य के किरदार में हो तुम,
माँझी हूँ मुद्दतों से समंदर की मौज का
हम जानते हैं किस नदी की धार में हो तुम!
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भले ही बाग तू नीलाम कर दे
हमारा गुल हमारे नाम कर दे,
है सूरज मुद्दतों से सर के ऊपर
ठिकाना बख्श दे या शाम कर दे,
बड़ी मगरूर दौलत हो रही है
ज़रूरत आदमी की आम कर दे,
चमत्कारी कोई र'ब है अगर तो
इरादे ज़ुल्म के नाक़ाम कर दे,
मुझे गुलशन का कोई ग़म नहीं है
मेरी मेहनत-कशी गुलफाम कर दे,
मुसीबत देखकर डरने लगें हैं
मुहब्बत का हँसीं अंजाम कर दे!
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इसलिए नाम तक बेख़बर है मेरा
मुझको मालुम नहीं क्या हुनर है मेरा,
मुद्दतें हो गयीं उनसे बिछड़े हुये
प्रेम वो आज भी हमसफ़र है मेरा,
फ़िक्र की ही कहाँ मंज़िलों की कभी
रास्तों के हवाले सफ़र है मेरा,
चार दीवार हों, है तमन्ना यही
एक दीवार का नक्श-ए-घर है मेरा,
बैठे-बैठे ख़यालों में खो जाता हैं
आज भी उनके दिल पे असर है मेरा!
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मुसाफ़िर हैं तो सीढ़ी चढ़ रहे हैं
किसी जानिब क़दम ये बढ़ रहे हैं,
चुनौती दी है जब से बादलों को
हमारे सर पे ओले पड़ रहे हैं,
कि बिन कोशिश के तुम ही हार मानो
अकेले ही सही हम लड़ रहे हैं,
बने फिरते थे आलोचक जो कल तक
सुना हैं अब क़सीदे पढ़ रहे हैं,
चमत्कारी अगर किरदार है तो
कहानी आप झूठी पढ़ रहे हैं,
हवाओं को कतरना जानते जो
उन्हीं के पँख, अम्बर उड़ रहे हैं!
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बनने लगी है बात मेरी दुश्मनों के साथ
इक जंग होनी चाहिए अब बुजदिलों के साथ,
मेहनत से लोग करते हैं बरकत नयी ईजाद
कब तक जियोगे यार मेरे रहमतों के साथ,
शोषण करे गरीब का, वो बंद हो रिवाज
मज़हब नहीं क़ुबूल मुझे ज़ुल्मतों के साथ,
मंज़िल की चाह में बस चलते हैं इस पे लोग
होता नहीं शरीक कोई रास्तों के साथ,
नजदीकियाँ इक रोज में हासिल नहीं हुईं
काटी है एक उम्र मैंने फ़ासलों के साथ,
मेरे भी ख़्वाब आपके जैसे थे बेख़बर
फ़ितरत से मात खाये हैं कुछ गिरगिटों के साथ!
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दिल-ओ-जाँ से दिया जिसको सहारा
उसी ने कर लिया मुझ से किनारा,
जहाँ पर ज़िस्म को मिलती तवज्जोह
वहाँ लगता नहीं है दिल हमारा,
हमारे दोस्त तक ना बन सके तुम
ज़माना बन गया दुश्मन हमारा,
अकेले ही सफ़र में चल पड़ा हूँ
कहाँ तक ताकते रस्ता तुम्हारा,
बिछड़कर रूह फिर मिलती कहाँ है
बदन मिल सकता है तुमको दोबारा,
हमारी आँख का जो नूर बनता
न निकला आसमाँ में वो सितारा,
अभी भी शक़्ल वो धुँधली बहुत है
के जिसको उम्र भर हमनें निहारा,
हमारी भी कहानी रुख बदलती
जरा सा साथ मिलता गर तुम्हारा,
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कहानी यूँ तो पूरी लग रही है
तेरे बिन कुछ अधूरी लग रही है,
मुहब्बत में हुआ बर्बाद जीवन
मुहब्बत फिर ज़रूरी लग रही है,
हमारी ज़िंदगी में , है अँधेरा
फ़क़त बाहर से नूरी लग रही है,
ये शोहरत खीँच लायी ज़िस्म फिर भी
दिलों के बीच दूरी लग रही है,
तेरे लहजे में फ़न की नाजुकी है
मगर भाषा गुरूरी लग रही है!
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इस ज़िंदगी की धूप में हम ख़ाक हो गये
मासूम थे मगर अब चालाक हो गये,
नुकसान में कभी कभी होता है फायदा
डूबी हमारी नाव तो तैराक हो गये,
जब तक रहे जमीन में ख़ुद के रहे ख़ुतूत
आकर तेरे बजार में पोशाक हो गये,
बुलबुल ठिकाना खोजने आतीं थीं शाख पे
पर इश्क़ में दरख़्त कई चाक हो गये,
खामोश थे तो लोगों की बकवास भी सुनी
सच बोलते हुये हम बेबाक हो गये,
तुम छोड़कर गये मुझे मर्जी तुम्हारी थी
लेकिन तुम्हारे प्रेम में हम पाक हो गये!
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शुरू हुआ है खेल.......बन्दगी से फिर
यकीन कर रहे हैं...... हम किसी से फिर,
कहीं डुबा न ले .......भँवर हमारी नाव
मिज़ाज मिल रहे हैं.... इक नदी से फिर,
अगर रुके नहीं ..... ..सियाह वक़्त में
ये पाँव फिर मिलेंगे..... रोशनी से फिर,
पनप रहा है सूद .......मुझ से लेके वो
सो कर्ज़ ले रहे हैं..... हम उसी से फिर,
मेरे नसीब में ......लिखे थे फासलें
क़ुबूल कर रहे हैं ....ग़म खुशी से फिर,
किया था ख़ाक दश्त..... जिस चिराग ने
फ़रेब खा रहा है .......दिल उसी से फिर!
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जाने कितने दम निकले हैं
यूँ ही नही परचम निकले हैं,
दुनियाँ भर के ग़म निकले हैं
जिस रस्ते पर हम निकले हैं,
बीत रहे ज़िम्मेदारी में
जीने के मौसम निकले हैं,
खुद को नाप रहे थे इक दिन
अपने हिस्से कम निकले हैं,
इक याद पुरानी आई फिर
आँखों से फिर ग़म निकले हैं!
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