परत दर परत (77 ग़ज़ल संग्रह) वैभव बेख़बर Vaibhav bekhabar kavi

न  कोई  आसमाँ  से   वक़्त  का   पैग़ाम   आएगा

किया  आगाज़   जो   तुम ने  वही  अंजाम आएगा,


मुसीबत से  निकलने  का, हुनर  पैदा करो  ख़ुद में

न कोई    काम  आता  है   न  कोई   काम  आएगा,


हम अपनी  प्यास  के  ख़ातिर, कुआँ इक खोद लेंगे जब

हमारी   तिशनगी  को  तब   कहीं   आराम  आएगा,


बहुत   बेबाक़  होकर  बोलते  हो   तुम  हुक़ूमत  से

समन  इक दिन  अदालत  से  तुम्हारे  नाम  आएगा,


करो  ना   इस  क़दर  बर्बाद  मुझको  तुम मुहब्बत में

तुम्हारे   बाद  भी   ये  दिल  किसी  के  काम  आएगा!


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नख़रे  करे   तमीज़   के   नादान   आदमी

मालिक सा तन के बैठा है मेहमान आदमी


मौज़ूद  है  बज़ार   में  , सामान   की  तरह

ख़ुद    बेचने   लगा   अब   ईमान   आदमी


इंसानियत  का  वास्ता, दौलत  से कब रहा?

किस? ज़ुस्तज़ू  में   हो  गया  हैवान आदमी


औक़ात,    जात- धर्म,   सरेआम   तौलता

आँखों में   लेके  फिर  रहा  मीज़ान आदमी


किसको  गले   लगाऊँ , मैं  हैरान  हूं  बहुत

अब   झाँकने   लगा   है,  गरेबान   आदमी


जाने  बिना  ही मर  गए  कुछ  लोग बेख़बर

इस ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा  पहचान आदमी!



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कुछ  इस तरह  हताश  हुए  ज़िन्दगी से हम

रूठे  रहे  तमाम   बरष  हर   किसी  से  हम


इतने  बड़े  हुए   जिन  शाख़ों   की  छाँव  में

लगने लगे  शज़र  को  उसी, अज़नबी से हम


करना  पड़ेगा  सामना  अब  क्रोध  का तुम्हेँ

कल तक  तो  पेश आये थे  शाइस्तगी से हम


पक्का  निशाना  शत्रु  का, इतना कभी न था

अब  खा  रहे  हैं  खौफ़  तेरी  दोस्ती  से  हम


लब  पाखुड़ी  गुलाब  की, मदमस्त  है  नज़र

बदनाम  हो   रहे   हैं   तेरी  मयकशी  से  हम


मंज़िल  की  ओर, जा रहे हैं आज  ये  कदम

गुजरेंगे  फिर  किसी  दिन  तेरी  गली  से हम


बर्बाद   हो    रहे    पर   दिल   को  यक़ीन  है

पहचाने  जाएंगे  कभी   इस   शाइरी  से  हम!



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आँख  है  नम,  तो  रौशनी  क्या है

बिन   तेरे    यार,  ज़िन्दगी  क्या  है


खोया    रहता  हूँ    तेरी   यादों  में

क्या   कहें    चीज, बेख़ुदी  क्या  है


ग़म   हज़ारों    हैं    मेरे   दामन  में

पूछ  ना  मुझ  से, ये  ख़ुशी  क्या है


दुनियाँदारी    है  अपने  मतलब  की

इश्क़   ना   हो  तो   बन्दगी  क्या  है


हाल  दिल   के   बयाँ    हो  जाते  हैं

मन का  है  क़ौल,  शायरी    क्या  है


ये  तो लड़का  है   इश्क़   में  पागल

और   वो  लड़की   सोचती   क्या  है



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दिल-ए-नाशाद   रखना  चाहता  हूं

मैं  उसको  याद   रखना  चाहता हूं


उसे  सर्कस  का  खाना  भा  रहा है

जिसे   आज़ाद   रखना   चाहता  हूं


तेरी  उल्फ़त  में  अपनी हर ज़रूरत

तुम्हारे   बाद   रखना   चाहता   हूँ


ज़मीं  दो गज  वफ़ा  की  ढूँढता  हूँ

मैं  इक  बुनियाद   रखना  चाहता हूं


मेरा  ग़म   बाट  लेता  हर  दफ़ा  जो

वो   चेहरा   शाद   रखना  चाहता हूँ





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तेरे अशआर  कोई ढूँढता है

तेरा  किरदार  कोई   ढूँढता है


तुम्हें घर से निकलना चाहिए अब

तेरा  दीदार  कोई  ढूँढता  है


नए  साथी की ख़्वाहिश है किसी को

पुराना  यार  कोई  ढूँढता  है


किसी की  ज़ुस्तज़ू लम्बे सफ़र की

दर-ओ-दीवार  कोई  ढूँढता है


पुरानी  चाल  में ही चल रहे कुछ

नई   रफ़्तार    कोई   ढूँढता  है


कई  किरदार  तेरे हुस्न  में  हैं

कहानीकार   कोई   ढूँढता  है।


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सरे-बाज़ार   बोली   जाएगी,  इंसान   की  कीमत

हुक़ूमत  तय  करेगी  अब, मेरे भगवान की कीमत


चुने सरकार जो  जनता, वो जनता की नहीं होती

रईसी  ही   लगाती  है  यहाँ  सुल्तान  की  कीमत


नई ख़्वाहिश, नए  रस्ते , नई  मन्ज़िल  बनाती  है

ज़रूरत  ही  बढ़ाती  है  किसी  सामान की कीमत


ज़माना  नापता  है  अब  इसी से हैसियत, रुतबा

मगर दौलत नहीं  होती किसी की जान की कीमत


नज़र  के  नूर  का मतलब  ये जुगनू क्या  बताएंगे

अंधेरी   बस्तियों   से  पूछिए   लोबान  की  कीमत


भले  हम   एक-दूजे  के   हमेशा   काम   आते  हैं

मगर ऐसे   नहीं  चुकती किसी  एहसान की कीमत


न पहले  फ़र्क   पड़ता था  मेरे  हँसने  या  रोने से

तेरे  ग़म  ने  बढ़ाई  है  मेरी   मुस्कान  की  कीमत


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जंग में  ख़ुद को  वर्षों  उतारा बहुत

एक बाज़ी के ख़ातिर, मैं हारा बहुत


वक़्त  मझधारों  में  है  गुज़ारा बहुत

रह गया  दूर  फिर भी  किनारा बहुत


हादसों  ने  कभी  ना  सँवरने  दिया

ज़िन्दगी  मैंने  तुझ को सँवारा बहुत


खो  गई  मेरी  आँखों से बीनाई जब

तब  हुआ  है  हसीं  ये  नज़ारा बहुत


सदियों पहले  धुले थे, नयन हिज़्र ने

अब तलक़ है समंदर, ये  खारा बहुत


लोग  कहते थे  उसको  फ़रेबी बशर

फिर भी लगता था मुझको वो प्यारा बहुत



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तेरे    हालात   जब   बुरे  होंगे

हम  तेरे   साथ ही   खड़े  होंगे


कल किसी और के बनोगे तुम

हम  तेरे    बाद  भी   तेरे  होंगे


आज तन्हाई है  तो क्या ग़म है

कल  मेरे  साथ  जमघटे  होंगे


आज  ये  मिल्कियत  तुम्हारी है

कल  यहाँ  लोग कुछ  नए होंगे


भटके होते  तो  लौट  कर आते

वो    तुझे   छोड़कर    गए  होंगे


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झलक  भर   आरज़ू  दीदार  की  है

कसक  दिल  में  तुम्हारे प्यार की है


तुम्हें  हासिल तो चाहें  आज कर लें

मगर  हसरत   तेरे   इक़रार  की  है


कोई भी गुल खिला सकते थे लेकिन

जगह  वो  आज  भी  कचनार की है


ज़रूरत  आब की थी  इस  ज़मीं को

मगर  उस  अर्श  ने   बौछार   की  है


न  कश्ती   है,  न   ही  पतवार  कोई

तमन्ना  तो   बहुत    उस  पार  की  है


तुम्हीं    इक   आशना   थे  तीरगी  में

ये  दुनिया   तो  बड़ी    बेकार   की  है


फ़क़त   आसान  दिखती  है   मुहब्बत

डगर    ये     बेख़बर    अंगार   की  है !


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रिवायत  को  नकारा है , गिरफ़्तारी   करेंगे  लोग

हमारे  नाम का फ़तवा ,अभी  जारी  करेंगे लोग


ये बिन मेहनत के मंज़िल की तलबगारी करेंगे लोग

किसी  की  छीनकर  दौलत  अमलदारी करेंगे लोग


मेरे  हर  फ़ैसले  पर  जो,  हमेशा   तंज  करते  हैं

जरा  दौलत  लुटा  दूं, तो  तरफ़दारी   करेंगे  लोग


इबादत  और  नमाज़ों का करेंगे  ज़िक्र सुबहोशाम

ख़ुदा  के  नाम  पर  फ़ाज़िल  रिया-कारी करेंगे लोग


कभी  दो पल   जो मुझको  चैन  से  जीने  नहीं  देते

मेरी  मैय्यत पे  आकर  वो   अज़ा-दारी  करेंगे लोग


चलो  इस  शहर  के  बाज़ार  में  खोलें  दुकाँ  कोई

ये  है  त्योहार  का  मौसम,  ख़रीदारी  करेंगे   लोग !

          


शब्दार्थ-तलबगारी~ख़्वाहिश, अमलदारी~हुक़ूमत

                 फ़ाज़िल= विद्वान,

           रियाकारी~पाखण्ड,अज़ादारी~शोकसभा



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काफ़िला  नहीं  कोई,  कारवाँ  नहीं कोई

ज़िन्दगी ये  तन्हां  है   साएबाँ  नहीं  कोई


तुम हो फूलों की ख़ुश्बू,तुम ही ऋतु बहारों की

तेरे  बिन   दरख़्तों  की  दास्ताँ  नहीं  कोई


वक़्त  साथ  देगा तो  मंज़िलों को  पा  लेंगे

फ़ासला  तो  है  लेकिन  दरमियाँ नहीं कोई


आब,ताब का आलम, सह सको तो आ जाओ

वो  ज़मीं  हूँ  मैं , जिसका  आसमाँ  नहीं कोई


किस दिशा में जाऊँगा, कुछ ख़बर नहीं मुझको

सामने  अँधेरा   है   और   समाँ   नहीं   कोई!



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इश्क़  जब   बदनसीब  होता  है

कोई  दोस्त  ही  रक़ीब  होता  है


चैन  मिलता कहाँ हैं फुरक़त में

दर्द  दिल  का  अज़ीब  होता  है


जोड़ रक्खा है सबको मतलब ने

कौन   किस के   क़रीब  होता है


किस  पे   एतबार  किया  जाए

आदमी   अब   मुहीब  होता  है


प्यास  बुझती  नहीं, इसी कारण

हर   समंदर    ग़रीब    होता  है


कोई  रस्ता, तो  कोई  है मंज़िल  

अपना  अपना  नसीब  होता  है


आते  आते  ही   शायरी  आती

होते    होते    अदीब   होता   है।


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साथ   छूटा  आपका   छूटे  सहारे  बेख़बर

मुफ़लिसी में कट रहे हैं  दिन हमारे बेख़बर


हो  गए  दुशवार, वो  जो  रास्ते  आसान थे

मंज़िलों के ख़्वाब,जबसे हम निहारे बेख़बर


नाख़ुदाओं पर अगर  ये  ज़ुल्म  यूँ होता रहा

कश्तियाँ फिर  कौन  लाएगा किनारे बेख़बर


दिन गुज़रता  है   तेरे  दीदार की  उम्मीद में

काटते  हैं रात  हम  गिनकर  सितारे बेख़बर


रब्त है  इक़रार  और  इनकार की मझधार में

रफ़्ता-रफ़्ता   हो रहे हैं  हम  तुम्हारे  बेख़बर


रात दिन  अब शायरी की प्यास  कम होती नहीं

तिश्'निगी  में   फिर रहे  हैं  मारे-मारे  बेख़बर



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किरदार  है   फ़क़ीर  सा, सरदार  हैं  मगर

हम  दिख  रहे हैं  फूल से, अंगार  हैं  मगर


पिंदार  तो   दुरस्त  है   सब का  नक़ाब में

कुछ  लोग  मेरी  बज़्म  के  बीमार हैं  मगर


सच  जानते  हुए भी ,जो  सच बोलते  नहीं

ये    बेक़सूर   लोग    गुनहगार   हैं  मगर


आज़ादियों   के  बाद  , तरक़्क़ी  की राह थी 

कुछ  लोग  मुल्क़  में  अभी  लाचार  हैं मगर


मन्ज़िल का हौसला भी मुझे अपनों से मिला

अपने  ही  लोग   राह  की  दीवार  हैं  मगर


मौसम की कुछ दिनों से, तबीअत जुदा सी है

बरसात  के  भी  धूप   में    आसार  हैं  मगर 


तुम  हो  हमारी   ज़िन्दगी,  हम-दर्द  बेख़बर

वैसे  तो  हम एक हैं  कुछ  असरार  हैं  मगर


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दिल ये नाहक़ ही  इतना  परेशान है

ये तो मंज़िल से  पहले का तूफ़ान है


हर क़दम पर लगी  दाँव पर जान है

ज़िन्दगी अब  कहाँ इतनी आसान है


ख़्वाब   झूठे  हज़ारों  लिए फिर रहा

आदमी  हर  हक़ीक़त से  अंजान है


कौन समझाए,दौलत के मीज़ान को

फ़ायदा  बेसबब का  भी  नुकसान है


रात  रौशन  या होगा सफ़र आख़िरी

सामने  आँधियों  के , ये   लोबान  है


मेरा  अपना  तज़ुर्बा   है  ये  बेख़बर

इश्क़  गुलशन  नहीं इक बियावान है


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दायरा   बढ़  रहा  है  दरारों  में

कोई  दुश्मन है  ग़म-गुसारों में


मेरे  हिस्से  कभी  न आया वो

वो  जो  होता है इक हज़ारों में


राह  देखूँ,  मैं अपनी  बारी की

उम्र   गुजरी   मेरी  कतारों  में


तेज धारों की मुझको आदत है

डूब   जाऊँगा  मैं  किनारों  में


है यही ख़ौफ़ खिलती कलियों को

फूल  गूथे   गए   हैं    हारों   में


रास  आने  लगीं   खिजाएँ  अब

बर्क़  मुझ  पर  गिरी  बहारों  में





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ये तन-मन  चोंट  सहता, आँख पर शबनम उठाता हूँ

मैं हर दिन ज़िन्दगी के   ख़ूब  पेच-ओ-ख़म उठाता हूँ


वो  अपने  स्वाद के   ख़ातिर   करे  ईमान  का  सौदा

मैं  अपने   पेट  के  ख़ातिर   कई ज़ोखिम  उठाता  हूँ


मुहब्बत   काम  है   मेरा  , मैं  अपना  काम  ही  करता  

मुझे   वो  दर्द    देता  है    मैं  जिसके   ग़म  उठाता  हूँ


थके   हारे    कभी  आओ    तुम्हें     आराम   आएगा

मैं  छप्पर  फूँस  का  हूँ,  पर  कई   मौसम  उठाता  हूँ


ख़ुशी   है  ज़िन्दगी   ये   काम  आयी    चन्द   लोगों  के

मैं अपनी  ख़्वाहिशों  के  आज तक  मातम  उठाता  हूँ


कोई   मज़हब    बड़ा   इंसानियत  से  हो  कहाँ  पाया

मैं  काफ़िर  हूँ  मगर इस  मुल्क़ का   परचम उठाता हूँ




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काँटों  का  व्यापार  नहीं   होने  देंगे

फूलों  को   अंगार   नहीं   होने   देंगे


मन्ज़िल अब  दुशवार नहीं होने देंगे

हम  राह  में  दीवार  नहीं  होने  देंगे


अपने  सड़ते अंगों को  ख़ुद काटेंगे

सारा  तन   बीमार   नहीं  होने  देंगे


हर गुल अपना अपना फ़र्ज़ निभाएगा

गुलशन  ये   बेज़ार  नहीं  होने  देंगे


प्यार से  ख़त्म  करेंगे  झूठी नफ़रत को

मज़हब  को  हथियार  नहीं  होने  देंगे


झूठ को झूठ कहेंगे,ज़ालिम,ज़ालिम को

नेकी   को    लाचार   नहीं   होने  देंगे


मुझ जैसे जबतक इक दो पागल जिंदा हैं

पागल   ये   संसार   नहीं   होने   देंगे



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ग़र  तुम्हारे  राब्ते  यूँ  ही   रहे   कुछ और दिन

दरमियाँ फिर तो  रहेंगे फ़ासले कुछ और दिन


लोग  मेरे  काफ़िले  के   ही  ख़फ़ा हो  जाएंगे

हम अगर थामे  रहे  ये  आइने कुछ और दिन


छल कपट  मक्कारियाँ, करने लगा है आदमी

मज़हबी उठते रहेंगे   मसअले  कुछ और दिन


अपने अधिकारों से जब तक लोग ये अंजान हैं

तुम  उठा लो तख़्त के कुछ फ़ायदे कुछ और दिन


बेख़बर  ये  कोशिशें , नाक़ाम  ना  होंगीं  कभी

ज़ीस्त में दुश्'वारियों के सिलसिले कुछ और दिन




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दिल-ए-नाक़ाम  लेकर  पी  रहा  हूँ

दवा   का  नाम   लेकर  पी  रहा  हूँ,


उसी  के  मयकदे  में,  लड़खड़ाकर

उसी  का  जाम  लेकर  पी  रहा  हूँ,


मुसलसल  कर्ज़  मुझ पे  बढ़ रहा है

किसी  से,  दाम  लेकर  पी  रहा  हूँ


कभी  आगाज़  इक  मैंने किया था

कई   अंज़ाम   लेकर  पी  रहा  हूँ


किसी  की  याद,दिल तड़पा रही है

किसी  का  नाम  लेकर  पी  रहा हूँ


अभी  वैसे    बड़ी  रंगीन  सुब्ह  है

नज़र   में  शाम  लेकर  पी  रहा  हूँ


फ़क़त इक ज़ुर्म चाहत का किया था

बड़े    इल्ज़ाम   लेकर  पी  रहा  हूँ


कहाँ  थे  हम, कहाँ  होंगें,  कहाँ  हैं

ये   तीनों   काम  लेकर  पी  रहा  हूँ





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वहाँ  तुम, तुम  नहीं होते,  यहाँ  हम , हम  नहीं  होते

अगर  इस  ज़िन्दगी  में   इतने  पेचो-ख़म  नहीं  होते


यहाँ  सब कुछ  बदलता है  अडिग  परचम नहीं होते

हमेशा   एक   जैसे   वक़्त   के    मौसम   नहीं   होते


ये  दौलतमंद   लोगों   का ,   रवैया   तो   ख़ुदा  जाने

जो मेहनत की कमाते  हैं  किसी  से  कम  नहीं होते


कहाँ   इंसान  के  बस में , वो  जो  क़ुदरत बनाती  है

ये  कतरे   लाख  चाहें  , पर कभी शबनम  नहीं  होते


बहुत  की  कोशिशें , मुझको  बचाने  की  हकीमों  ने

जो दिल  के  ज़ख़्म  भर दें ,ऐसे तो  मरहम नहीं होते


सुहानी  सी  कोई    मन्ज़िल    हमारे  पास  भी  होती

अगर  तुम  साथ  दे  देते  तो,  हम   बरहम  नहीं  होते


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घटने  को   घट  सकती  थी   दूरी

कुछ दूरी  रखना  भी  था  ज़रूरी


वो इश्क़ भी  हद से  पार न  आया

कुछ मेरी भी  अपनी थी  मज़बूरी


इक ज़ागीर खड़ी कर सकता हूँ मैं

होगी  तेरे   बिन    तामीर   अधूरी


कुछ  नूर  मेरी  आँखों  मे  कम था

कुछ   निकली   दुनियाँ भी  बे-नूरी


अपनों  ने  ही   हक़   मारा  अपना

हम   करते  किस से    सीना-जोरी



मुसलसल  हो   रहा   बर्बाद   ये  जंगल  सियासत  में

यूँ लगता  है  कि जैसे  पड़ गया  बादल  सियासत  में


हमारे  दिल  में  जिनको  आग  नफ़रत की  लगानी है

कुछ  ऐसे   बढ़  रहे  हैं  मज़हबी  ज़ाहिल सियासत में


ज़मीं  पर   मुद्दतों  से   आदमी  का ,  खूँ   निचोड़ा  है

नज़र आता  मुझे  हर  गाम  पे  मक़तल  सियासत में


कोई  राजा   कभी  भी   सामने  आकर   नहीं  लड़ता

हमेशा छिप के करते  वार  सब  बुज़दिल  सियासत में


अगर  आवाम  चुनती  है  किसी ज़ालिम  हुक़ूमत  को

तो  होंगे   कैद   में   निर्दोष और  क़ातिल  सियासत में


मुझे  इन्सान  से  पहले  नज़र  आती  है  उसकी  नस्ल

मुख़्तसर  सा   लगा  जबसे  हमारा  दिल   सियासत  में।


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मन्ज़िल  है  आदमी , कोई   रस्ता  है  आदमी

आसान  भी  कहीं ,  कहीं  खतरा   है  आदमी


जिस  मोड़  के  भरम से   गुज़र  जाना चाहिए

अक़्सर  उसी   मुक़ाम  पे   ठहरा   है  आदमी


हर   इक  रसूल   ने    दिए   पैग़ाम   इश्क़  के

किन मज़हबों  के  नाम  पे  लड़ता  है  आदमी


शर्मो - हया  , शऊर    से  ,  बे-रंग     हो   गया

मतलब  परस्त ,    रब्त    बदलता   है  आदमी


इक दो  उड़ान उड़ ली, तो  ख़ुद को  कहे  ख़ुदा

पँछी  है  जिसमें   कैद, वो   पिंजरा  है  आदमी


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रोज    ताजा - तरीन    होता  है

दर्द   दिल का  हसीन   होता  है


वक़्त पर, काम वो  नहीं  आता

दिल को जिसपे यक़ीन होता है


लौट आती  है  धूल  उड़-उड़कर

आसमाँ    कब  जमीन  होता  है


अपना अपना है  नज़रिया सबका

हर    समाँ    बेहतरीन    होता  है


मत  करो  तोड़कर   उसे  आधा

छः  का  उल्टा  भी तीन  होता है


हम  बने   आदमी   सलीकों  से

ज़िस्म  तो  इक  मशीन  होता  है


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जमीं  ही   गिड़गिड़ाती  है, कहाँ   बादल  बुलाता  है

हमारी  प्यास को   फिर भी  नदी का  जल बुलाता है


मुआलिज और मरहम  जिस तरह घायल  बुलाता है

उसी  मानिंद  हमारा दिल   तुम्हें  हर  पल  बुलाता  है


तुम्हारे शहर में  दो गज  ज़मीं, हासिल तो  कर ली है

मुझे  फिर  भी   हमारे  गाँव  का   पीपल  बुलाता है


है अपने इश्क़ की वो दास्ताँ कुछ, याद जिस जिस को

हर इक वो शख़्स,मुझको अब तलक़ पागल बुलाता है


इज़ाज़त   माँग  का   सिंदूर,  देता   ही  नहीं  मुझ को

मुझे  उस  आँख का अब तक मगर काजल बुलाता है


नहीं अब  लौट  पाऊंगा,  मुसाफ़िर  हूँ  मैं  मन्ज़िल का

चुना  है   धूप  को   जब  से,  कोई  आँचल  बुलाता  है





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उसने   अपनी  मनमानी की

मैंने    बर्बाद     जवानी   की


मेरी   दुनियाँ     वीरानी   की

जिसने दिल में मेहमानी की


दरिया का जब वक़्त बुरा था

इक  बूँद  ने ख़त्म कहानी की


हुस्न का जाल  बिछाया उसने

दिल ने   फिर  से  नादानी  की


मेरा   ही   दुश्मन   बन    बैठा

जिसको    मैंने    आसानी की।


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कि  वस्ल-ए-यार  होना  चाहिए  अब

मेरा     घरबार    होना   चाहिए   अब


उसूलों   से   कहाँ  हासिल हुआ कुछ

हदों   से   पार    होना    चाहिए   अब


ये माला  कब  तलक़  पहनूँ  सजन जी

गले   में     हार     होना    चाहिए   अब


तुम्हारे    ख़्वाब    धुँधले    आ   रहे   हैं

मिलन    इक  बार  होना  चाहिए   अब


ये   चकनाचूर    शीशा    हो    चुका  है

वो   संग   भी   चार  होना  चाहिए  अब


सनम  दिल  तोड़कर   तो  जा  चुके  हैं

मुझे    बीमार      होना     चाहिए   अब


मैं   वर्षों     नेकियाँ     करता     रहा   हूँ

तनिक     बेकार    होना    चाहिए   अब


इसी   साहिल   पे    गुज़री   उम्र   आधी

मुझे    उस    पार   होना    चाहिए   अब



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फूल  नहीं  तलवार  बनाया

पर  उसने  किरदार  बनाया


खुद को  पीछे  रक्खा उसने

मुझ को    दावेदार   बनाया


मेरे   घर  ही   डाका   डाला

जिसको    पहरेदार   बनाया


नाज़ुकता   सीखी  फूलों  से

पत्थर  नें    दमदार   बनाया


मेहनत   करने  वालों  ने  ही

सपनों   को  साकार बनाया


उससे उसका  ही क़त्ल हुआ

जिसने  जो   हथियार बनाया


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तलवार , तीर  ना  ही  किसी  गुल - गुलाब  से

तस्वीर   मुल्क़  की , तू   बदल   इन्कलाब  से


जिनको बड़ा  गुमान  था, अब तक भटक रहे

चाहें   सरल   हो   रास्ता , चलना   हिसाब  से


कुछ   ख़ामियाँ  हो  सकती  हैं  मेरे सवाल  में

घबरा  रहे   हैं   आप   क्यों, अपने  ज़वाब  से


कितना  हसीन  तख़्त  है, सबको  कहाँ  ख़बर

तासीर    पूछिएगा      किसी     क़ामयाब   से


दौलत  से  कब   रहा  है   मुहब्बत  का  वास्ता

बुझती  कहाँ  हैं  प्यास  , समुन्दर  के   आब से


किस आदमी  से   मिलने  की  उम्मीद  है  तुम्हें

अब   आइना  भी   देखती  , दुनियाँ   नक़ाब से



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चमन में अब  गुले-उल्फ़त   खिलाने  कौन आएगा

लगी  है  आग  नफ़रत  की  बुझाने   कौन  आएगा


फ़क़त कुछ  दिन  चराग़ों से  तेरे  घर रौशनी  होगी

अँधेरा   ज़हन  में  है, तो    मिटाने   कौन   आएगा


न कोई   रास्ता  है  अब  इन्हीं  लहरों  से  लड़ना  है

फ़सी   मझधार  में   कश्ती   बचाने   कौन  आएगा


हमारे  बाद  तुम  अपनी, ये इक आदत  बदल लेना

बिना  बातों   के   रूठोगी    मनाने   कौन   आएगा


ज़ुनूनी  ख़्वाब    आँखों  को   बहुत   बेचैन  रखते  हैं

मेरी   उम्मीद   को    लोरी,    सुनाने    कौन  आएगा



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उसने  तो  यूँ ही  दिल्लगी  कर ली

मैंने    बर्बाद    ज़िन्दगी   कर   ली


इतना   खोया     तेरे   ख़यालों  में

मेरे  ख़्वाबों  ने  ख़ुदकुशी  कर ली


वैसे  तो  नाम   सब का  रहबर था

करने  वालों   ने   रहज़नी  कर ली


बहते   दरिया  दिये   हैं  दुनियाँ  को

अपने  हिस्से  में   तिशनगी कर ली


जिस ने  पैग़ाम-ए-जंग   भेजा  था

मैंने   उससे   भी   दोस्ती   कर  ली


बात  दिल  की    उन्हें   बतानी  थी

इसलिए    मैंने    शायरी    कर  ली !



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विस्तार  हमारा  मत  पूछो

संसार   हमारा   मत  पूछो


ठीक से पहले जानो हमको

घरबार   हमारा   मत  पूछो


मिल जाता  है   दाना-पानी

बेगार    हमारा    मत  पूछो


अपनी  भी  एक  कहानी है

किरदार   हमारा  मत पूछो


अन्दाज़   फ़क़ीरों   जैसा  है

मेआर   हमारा   मत   पूछो


आक सको  तो आको बुलन्दी

आधार   हमारा   मत  पूछो !


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लगाए  हैं   कई  चहरे,  मग़र   तलवे  नहीं  बदले

फ़क़त  तरक़ीब बदली  है, अभी पुर्जे नहीं बदले


नए'पन  की  नयी  तासीर  से   वाक़िब  नहीं होंगे

के जिन पेड़ों  ने  अपनी  शाख़ के पत्ते नहीं बदले


मुसीबत  में   बिताई  हैं,  कई  रातें  अमावस  की

मगर  धरती  ने  अपने  चाँद से   रिश्ते  नहीं बदले


बहुत पहले जो बदले थे, अभी  पशता  रहें  हैं  वो

नए  बदलू  समझते  हैं, कि क्यों  पहले नहीं बदले


लगाए  आग  नफ़रत  की, कराए   बैर आपस  मे

सियासी  खिड़कियों  ने  मज़हबी  पर्दे नहीं बदले


अमीरी   रोज  अपने  ज़िस्म  के  जेवर बदलती है

ग़रीबी  ने,  तो वर्षों  से,  यहाँ  कपड़े   नहीं  बदले


मुझे मालूम था,इक दिन बदल तो तुम भी जाओगे

कि  जैसा   सोचते  थे हम, सनम  वैसे  नहीं  बदले।



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राह-ए-मन्ज़िल  नयी   निका'लेंगे

हम   इरादा     अगर    बना   लेंगे


आपका  फ़ैसला   सर आँखों  पर

हम  ये   सिक्का    नहीं  उछा'लेंगे


हौसले,   ज़िन्दगी   को   जीते   हैं

उम्र  तो    लोग   सब   बिता  लेंगे


हाँथ   देखो ,  कभी  बढ़ाकर  तुम

हम   तुम्हें    सीने  से    लगा  लेंगे


आप   ने   दायरा     मिटाया     है

आप   ही    दूरियाँ     बढ़ा     लेंगे


शाइरी    में       निखार    आयेगा

रंज-ओ-ग़म  और दिल में  पा'लेंगे



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सितम  ये  भी  उठाना   पड़  रहा  है

तड़प  को   मुस्कराना   पड़  रहा  है


जहाँ     आसानियाँ   थी   मुद्दतों  से

वहाँ   ज़ोखिम  उठाना   पड़  रहा  है


इधर   वो   आ   रहे   हैं   बाद   वर्षों

मुझे   उस   पार  जाना   पड़ रहा  है


जिन्हें   परचम   उठाना   चाहिए  था

उन्हें    पत्थर    उठाना   पड़  रहा  है


डगर     सूनी ,   मुसाफ़िर  देखती  है

परिन्दों    को   उड़ाना   पड़   रहा  है।


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कहीं  इकरार  से  सीखे , कहीं  इनकार  से  सीखे

के  जितना  जानते  हैं  हम,  इसी  संसार से सीखे


ज़रूरत  ने  सिखाया कुछ, तेरे  किरदार  से सीखे

सबक़ कुछ  ज़िन्दगी  के मतलबी बाज़ार से सीखे


तेरी   पतवार  से  हमको  बड़ी  उम्मीद थी लेकिन

सलीका   पार   जाने  का, नदी  की  धार से  सीखे


फ़क़त   मक्कारियाँ   देखीं,  विलासी  बादशाहों में

हुनर  सब   जंग  के   हारी  हुई , तलवार   से  सीखे


बड़े - बूढ़े    सुनाते   हैं ,  मुझे   रफ़्तार   के   किस्से

ये  नन्हें  पाँव    चलना  भी  बड़ी  दुशवार  से  सीखे


सुख़नवर से मिले जिस को,नगर-ए-उल्फ़त बसाना हो

के  जिसको   लूटना  हो  मुल्क़, तो  सरकार  से  सीखे


यही   परचम  हमारा  है,   कि  हिन्दोस्तान  वाले  हैं

वफ़ा    मिट्टी   से  सीखी  है, अना' दस्तार  से  सीखे

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नई  ख़ाहिश   न  होती  तो,  नया  सफ़्हा   नहीं  होता

घड़े  में   डूब   जाते   हम , अगर   दरिया   नहीं  होता


नज़र के ख़्वाब होते  कुछ, हक़ीक़त और  होती कुछ

कि  जैसा  सोंचते हैं   हम ,  सदा   वैसा   नहीं   होता


हुनर  ही आदमी की   जीस्त का  अंज़ाम  तय करता

किसी के भाग्य  में  पहले से  कुछ लिख्खा नहीं होता


तुम्हारी  महफिलों   से , तो   हमारी   बे-ख़ुदी  अच्छी

नज़र के   तीर   खाने   का  यहाँ   ख़तरा  नहीं  होता


न  बटतीं   सरहदें   इतनी ,  न  इतने    फ़ासले    होते

अगर  मज़हब   नहीं  होते , कोई   झगड़ा   नहीं  होता


रसीदी    इल्म  क्या  जाने,  कि  कैसे  अर्श  झुकता  है

फ़क़त   दौलत    लुटाने  से , हुनर   पैदा    नहीं    होता।


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हाँ   निर्धनों   को    निगल  रहा  है

बाज़ार   हर   दिन  उछल  रहा  है


तेवर    तुम्हारे,   बदल  रहे   कुछ

कुछ  रुख़  हवा का  बदल  रहा है


मन्ज़िल किधर है ख़बर है किसको

अब  तेज  हर  कोई  चल  रहा  है


मेहनत  ने  बदला,  नसीब  अपना

कमज़र्फ   ही  हाँथ   मल   रहा  है


दुनियाँ ने जिसको, कहा था सहरा

दरिया    वहीं   से   निकल  रहा  है


गुम  हो   रहीं  हैं  , नज़र   से   नींदें

फिर ख़्वाब-ए-उल्फ़त मचल रहा है


तफ़्सीर  अश्कों  की  क्या  करूँ मैं

दिल   कतरा-कतरा  पिघल रहा है



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बेक़सी  , आवारगी ,  हर  सादगी   बाज़ार  में

आ  गया   ईमान   लेकर,  आदमी  बाज़ार  में


ख़ून  में  बाज़ार  है, हर  बात  में,  व्यवहार  में

सौदेबाज़ी  कर  रही , हर  ज़िन्दगी  बाज़ार में


शौहरतों  की  चाह  में,  कोई  गया  हँसते  हुए

और  कोई  लेकर  आया ,  बेबसी  बाज़ार  में


मुल्क़ के चैनो-अमन की,फ़िक्र किसको हैं यहाँ

सब  सियासत  कर  रहे  हैं  मज़हबी  बाज़ार में


बिस्तरों   से  नींद   का,  कोई    नहीं  है  वास्ता

लोग   फिर  भी  ढूँढते  हैं,  हर  ख़ुशी  बाज़ार में


यार  क्या,परिवार क्या, सब  रिश्ते नाते बेख़बर

हो  गए   हैं   मतलबी, इस   क़ीमती  बाज़ार  में



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सब के सब,  ये   बज़ार  वाले  हैं

अब  कहाँ  लोग   प्यार  वाले  हैं


तुम को कैसे  यकीं  दिलाए अब

शख़्स   हम   ए'तिबार   वाले  हैं


खाली -खाली  है राह  जंगल की

शहर  में   सब  शिकार  वाले  हैं


घोर पतझड़ में  खिल के  बैठे हैं

फूल   हम   तो   बहार   वाले  हैं


ठीक     होंगे    नहीं  हकीमों   से

ज़ख़्म    मेरे     ग़ुबार     वाले   हैं।


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आँख  में   आसूँ  ठहरा  है

ज़ख्म  ज़िगर का  गहरा है


खेल  बदलता है   पल-पल

वो  दरिया,  अब  सहरा  है


रब   जाने ,   रंगत  उसकी

रंग   तो   ख़ूब   सुनहरा  है


नस्ल    नज़र   ना   आएगी

चहरे   पर   इक   चहरा  है


ज़ज़्ब  बयाँ  फिर  भी होते

मैं   गूंगा  ,  वो     बहरा   है


हम  ही   बैठे   हैं  थक कर  

वक़्त  यहाँ , कब  ठहरा  है।



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कब  तलक़  बैठे  रहोगे   आसरे  सरकार  के

बोल भी अब   हो गए  हैं,  बे-सुरे  सरकार के


झील  झरने   ताल  दरिया  पोखरे  सरकार के

प्यास  भी  आदमी  की   क़ैद मे   सरकार  के


बेबसी   इंसान  की  इनको   नज़र  ना आएगी

मस्लहत  करने  लगे  अब  आइने  सरकार  के


आख़िरी  उम्मीद  थी   इन्साफ  की  कानून से

पर   अदातल   ने  सुनाये   फ़ैसले  सरकार  के


नेकियों की  राह  पर  भटके  मुसाफ़िर उम्रभर

मंजिलें   सरकार  कीं   हर   रास्ते   सरकार  के


बात  कह   मज़लूम  की  बेबाक़ होकर  बेख़बर

सर  उठाकर  बोल  तू   सच, सामने  सरकार के! 



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हर इक जीता हुआ  शाही  सिकन्दर हो नहीं पाया

कोई भी आब-जू  अब तक समन्दर हो नहीं पाया


जरा  नज़दीक आकर  देख ले,  लहज़ा मेरा तेवर

भले  तू   हो  गया  बेहतर,  बराबर  हो  नहीं पाया


न ख़्वाहिश की कभी जिसकी,हुआ वो भी मुझे हासिल

जिसे  चाहा   तहे-दिल  से, मयस्सर  हो  नहीं  पाया


ज़दों  को  तोड़कर  दोनों , हदों  के   पार  ना  आये

ज़मीं  वो  हो  नहीं  पाई , मैं  अम्बर  हो  नहीं  पाया


न जाने  इत्तिफ़ाक़न वक़्त , किसको क्या अता कर दे

बिना  सोचें  हुआ है जो ,  समझकर  हो  नहीं  पाया


तज़ुर्बे  ज़िन्दगी  के सब  क़िताबों  से   कहाँ  मिलते

कोई  दरिया  में  उतरे  बिन, शनावर  हो  नहीं पाया


ये  नेमत  है  इलाही  की,  क़लम का फ़न जिसे बख्शा

ग़ज़ल  को  जीस्त  देकर भी, मैं शायर  हो नहीं  पाया




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हाँ या ना  कोई  फ़ैसला  कर  दो

क़ैद से मुझको, अब रिहा कर दो


ज़ख्म दिल का  हरा-भरा  कर दो

या तो फिर सब रफा-दफ़ा कर दो


दिल की आवाज़, रूह  सुन  लेगी

पहले दुनियाँ को,अनसुना कर दो


बुझ  न  जाएं,  चराग़   उल्फ़त  के

तुम   इन्हें   रौशनी  अता   कर  दो


एक  मुद्दत  से  दिल ये  ज़ख़्मी  है

रहम  मुझ पर   मेरे  ख़ुदा  कर दो


ग़र क़रीब आ सको,तो आ जाओ

या तो फिर  फ़ासला  बड़ा कर दो


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आह  को   कैसे , कोई    चारागर  जाने

चोट का आलम,पत्थर या  तो  सर जाने


हाल  ज़िगर का ज़ाहिर करना पड़ता है

मुझको, मुझसे  कोई  तो  बेहतर  जाने


भीगें  तकिए  दर्द  समझते  उल्फ़त  का

चादर  कितनी  लम्बी  है   बिस्तर  जाने


नदियों  से  जिसको  आहट ना होती हो

क्या  होता  है  कतरा, क्या  सागर  जाने


उपमानों के  जरिए, बात तो  कह  दी है

किसको रक्खा  लफ़्ज़ों में, शायर  जाने


भईया  कमियाँ  गिनवा  देंगे   बीबी  की

ख़ूबी  हैं  कितनी  भाभी  में   देवर  जाने




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ख़ुश हैं , फिर भी ग़म तो है 

आँख   हमारी   नम  तो  है


सोच  से  ज़्यादा   पाया  हूँ

हाँ फिर भी कुछ कम तो है


जाने  क्यों   हैं   ज़ख्म  हरे

होने    को   मरहम   तो  है


कल  हो  कैसा,  रब  जाने

आज  हँसीं   मौसम तो  है


दरिया में भी प्यासे  हो तुम

पास मेरे कुछ शबनम तो है


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सरे-मैदान  आने  की,  ये   ज़ुर्रत   क्यों   नहीं   करते

जो छुप-छुप  वार  करते हो, अदावत क्यों  नहीं करते


अगर बुज़दिल नहीं हो तुम,तो फ़िर क्यों ज़ुल्म सहते हो

रगों  में    खून  है  तो फिर,  बग़ावत  क्यों  नहीं  करते


क़सीदे  पढ़ रहे हो  क्यों, किसी का सन्तरी  बनकर

अगर  गद्दी   के  क़ाबिल हो, हुक़ूमत क्यों नहीं करते


पुरानी  राह पर ,तो चल  रही है  भीड़  दुनिया  की

नए   रस्ते    बनाने  की  ,  मशक्कत क्यों नहीं करते


हो सकता है  कोई  ख़्वाहिश, तुम्हारे जैसी हो उसकी

तुम अपनी बात कहने की भी हिम्मत क्यों नहीं करते


अगर दिल में हिक़ारत है तो फिर  क्यों वस्ल की बातें

नहीं  जब  वास्ता  कोई  तो  रुख़सत  क्यों नहीं करते



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वैसे तो  सब ने  इक नज़र  देखा

पर  किसी  ने  कहाँ  हुनर  देखा


मेरे  पैरों   में ,  पड़    गए   छाले

दुनियाँ वालों  ने  सिर्फ़  सर देखा


नींद  आई तो  सो  लिया जी भर

ख़्वाब   देखा  तो   रातभर  देखा


इस  क़दर   याद  आज  तुम आए

रूह  ने   आप  का    असर  देखा


किस ने पाया  मुक़ाम  उल्फ़त में

जिस को  देखा तो दर-बदर  देखा


कुछ  भरोसा   नहीं   सियासी  का

कल  तलक़ था उधर,  इधर  देखा







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दरारें  हैं   छोटी  , बड़ा   दायरा  है

यहाँ  आदमी ,आदमी  से  ज़ुदा  है


नहीं कोई रहमत, मुहब्बत बला है

हुई  मुद्दतें, ज़ख़्म  दिल का हरा है


फ़क़त शक़्ल सूरत जहां देखता है

कहाँ कोई  अब  आइना देखता है


मुहब्बत का ये भी सितम मरहवा है

मैं उससे खफ़ा हूँ, वो मुझसे खफ़ा है


क़दम डगमगाते  हुए सब निकलते

तुम्हारी गली, क्या  कोई  मैकदा है


ये कश्ती फ़क़त इक भरम है तुम्हारा

न कोई  ख़ुदा  के  सिवा   नाख़ुदा  है


कहाँ  खूबियों  से   भरी  नस्ल   कोई

हर इक आदमी कुछ भला, कुछ बुरा है


बगावत न समझो,  सियासत  है  यारों

नई  चाल  बस    ये  सियासी  चला  है





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ज्यादा मुश्किल  थोड़ी   सी आसानी  है

सबकी   अपनी  अपनी  राम कहानी है


सर  पे  किसी  के   बेहद   साएबानी  है

और किसी ने  ख़ाक  जमीं की  छानी है


कब तक   बादल   तेरी  प्यास  बुझाएंगे

रूत का क्या है, रूत तो आनी-जानी  है


पत्थर ,काँटे, मुश्किल   रोक  न  पाएंगीं

दिल  में  जिस ने कुछ करने की ठानी  है


दौर  मुहब्बत  वाला  कब का  बीत गया

अब  हर  मीरा    दौलत  की   दीवानी  है


बाज़ारों  की  अपनी भी  कुछ  कीमत  है

मोती  किसी की, आँख से बहता पानी है


सोच  समझ  के  लोगों का एतबार  करो

इंसानों   की   फ़ितरत    अब   हैवानी  है।



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थोड़े  थोड़े   गाए  हैं   सब  ने   तराने  झूठ  के

दफ़अतन  आए  नहीं  ज़ालिम ज़माने झूठ के


खाए  थे  पहली  दफ़ा  दो - चार  दाने झूठ  के

हो   गए  फिर  धीरे-धीरे  हम  दिवाने  झूठ  के


मतलबी  बुनियाद  वाला  हर  मकाँ  वीरान है

खोखली   नस्लें   बनाते    कारखाने   झूठ  के


गर्द  है  मन्ज़र-ए-हक़ीक़त, ख़ूब  हैं वीरानियाँ

आदमी के  ज़हन   में   मौसम  सुहाने  झूठ के


बन गए  दस्तूर अब,पिछली सदी के झूठ कुछ

सच पे  भारी  पड़  रहे  हैं  क़द  पुराने  झूठ के


खा  रहे    ईमान  वाले ,   दर - बदर  की  ठोकरें

हर ज़ुबाँ  पर बन  चुके  हैं  अब ठिकाने  झूठ के





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सूर्य   जैसे  जलो   तुम  नए  साल  में

खूब   फूलो-फलो   तुम  नए  साल में


हर  बुलन्दी   तुम्हारे   क़दम   चूम  लें

रत्ती  भर  ना  ढलो  तुम  नए  साल में


रास्तों    के    तज़ुर्बे , बहुत   हो  चुके

मंज़िलों  से  मिलो   तुम  नए  साल में


देख,   तेरी   तरक़्क़ी   हमें   नाज़  हो

दुश्मनों  को  खलो  तुम  नए  साल  में


दूसरों   से  न    तुलना    करो  बेख़बर

तेज  खुद   से  चलो  तुम  नए  साल में




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रस्ता   ना     कोई    मन्ज़िल   है

ये  इश्क़  है जो,  इक  दलदल  है


ज़ुल्म  के  पीछे  इक  महफ़िल है

हर  शख़्स  यहाँ  पर  क़ातिल  है


रात  से  रौशन   नाम  चराग़  का

मझधारें      हैं     तो    साहिल  है


अन्न  ,हवा  , पानी    सब    दूषित

अब   शहर  से  अच्छा  जंगल  है


सच  की   दुश्मन , झूठ  को  पूजे 

ये   दुनियाँ     इतनी   ज़ाहिल   है


हर   लड़की   उस से   जलती   है

हर   लड़का   उस का  क़ायल  है


मरना   भी     आसान    कहाँ   है

जीना  तो   और  भी   मुश्किल  है


ज़हर   किसी  ने    घोला   हवा   में

हर     एक    परिन्दा     घायल    है


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क्या  करें    टूटकर   उभरने  में

वक़्त लगता है  ज़ख़्म  भरने में


माँग  इसकी फ़क़त  मुहब्बत है

दिल ये  बैठा हो  जैसे  धरने  में


आइनों का  निकल न जाए दम

वो तो   मसरूफ़  है  सँवरने  में


सर-बुलन्दी  में  उम्र  लगती  है

वक़्त  लगता   नहीं   उतरने  में


दिल को  चैनों-क़रार मिलता है

कोई भी   नेक   काम  करने  में।




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शान-शौक़त   और रुतबा  है यहाँ  ज़रदार का

दौर  है  बाज़ार का   व्यापार का   सरकार का


तुम  हवाई यान  से  उस  पार  उड़कर जाओगे

हमको  तो  करना पड़ेगा  सामना  मझधार का


आधी  खबरें   झूठी  हैं,  भरपूर   है  प्रचार  भी

कितना धुँधला  हो गया है  आइना अख़बार का


पहले  अपने    झुंड  में   पहचानिए   ग़द्दार को

सामने  से  आ  रहा  है   तीर अब   अग्यार  का


फ़र्क  कुछ पड़ता  नहीं  इस बाग को तूफ़ान से

ज़हन में खिलने लगा है  फ़ूल अब अशआर का


मत  किसी की बात पर  ऐतबार करना बेख़बर

आदमी  ये  हो  गया  है   गिरगिटी   किरदार का।


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तनिक ज़ोखिम  उठाना  चाहिए  अब

हुनर   को   आज़माना   चाहिए  अब


बढ़ानी   है  अग़र   कुछ   बात  आगे

तुम्हें   घर  आना-जाना  चाहिए  अब


दग़ा   इतना    मिला   है   दोस्तों   से

मुझे   दुश्मन    ज़माना   चाहिए  अब


भरे   गोदाम   हैं   जिनके    उन्हें  भी

मुफ़द  का  आबो-दाना   चाहिए अब


मैं  इतना  मिल   चुका  हूँ  हादसों  से

मुझे  तो    टूट   जाना   चाहिए   अब


अँधेरों   में   करेगा    वार   कब  तक

कोई   पक्का   निशाना  चाहिए  अब।



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अपने  मतलब  की  बात   बोलेगा

कौन    अब      इंकलाब   बोलेगा


आ   रहा  है   चुनाव  का  मौसम

फिर   कोई   धर्म - जात   बोलेगा


कोई   राहों  पे    चल  न   पाएगा

कोई   मन्ज़िल,   ख़राब    बोलेगा


तख़्त   सारे    पलट   ही    जाएंगे

भूख  का   जब   अज़ाब   बोलेगा


तीर जिस दिन  कमान  से निकला

ज़िस्म   के    आर - पार   बोलेगा


आप  ही   तुम  कहोगे  सबको तो

आप  को   कौन,    आप   बोलेगा


कुछ  हुनर  आँख , सीख  लेंगी  तो

हर   हक़ीक़त  से   ख़्वाब  बोलेगा


लोग   पहचान   लेंगे    लहज़े   से

झूठ   कब   तक   नक़ाब  बोलेगा



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ज़मीं  से  उठाकर   ज़मीं  पर  गिराया

वो  पानी  को  बादल से  पानी बनाया


दिया  तीर   जिसने  शिकारी  के हाँथो

उसी  ने   परिंदो को   उड़ना  सिखाया


दुकानदार  लोगों  ने  बाटे  थे  मज़हब

सियासत  ने  हमको  सियासी  बनाया


कहाँ  मुश्किलें   रोक   पायीं मुसाफ़िर

समन्दर   कड़ी  धूप  ने  कब  सुखाया


किया  सूरतों  पर   यकीं  हर किसी ने

ज़माने   ने  अक्सर   हुनर  आज़माया


मुहब्बत के पर्दे  की  जिस्मी  हवस  ने

दीये की  तरह  दिल  जलाया  बुझाया


बचाया  है  जितना  , तरक़्क़ी  वही  है

कमाने  को उसने   बहुत कुछ  कमाया



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पार  इस  कुछ  और है , उस  पार में कुछ और है

कश्तियों का  फ़लसफ़ा ,मझधार  में  कुछ और है


शक्ल  में  कुछ और है  ,दीदार  में  कुछ  और  है

आदमी  की  जात  ,अब  किरदार में कुछ और है


सादगी ,  शर्मो-हया , फ़ितरत   यहाँ   इंसान  की

घर  के  भीतर  और  है ,  बाज़ार  में कुछ और है


लोगों  को  कहते  सुना था, एक  है सबका  ख़ुदा

मज़हबी    तालीम  ,हर  दरबार  में  कुछ और  है


भूख  की  हालत  मेरी  सरकार में  कुछ  और थी

मुल्क़  में  ग़ुरबत   तेरी  सरकार में  कुछ  और  है


करवटों  में     रात   गुज़रे,  बे-पनाह    बेताबियाँ

आशिक़ी  का  ज़ायका   इनकार में  कुछ और है


चाटुकारी   ना  कहें   तो  क्या  कहें  हम  बेख़बर

हादसा   कुछ  और  था,  अखबार  में कुछ और है।



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ना  मुझे  खौफ़   तेज  धारों  से

हाँ  तनिक डरता हूँ  किनारों से


महज़ , ग़ुमराह  लफ्ज़  करते हैं

बात   होती   है  अब  इशारों  से


राह   चलते    ग़रीब    डरता  है

रौंद   देते   हैं   लोग   कारों   से


दास्ताँ-ए-ज़िन्दगी   बयाँ   करते

आप मिलिए तो  ग़म के मारों से


काँच   ही    ठीक   से  बताएगा

फ़र्क   पड़ता  है   जो  दरारों  से


एक   दुश्मन ही  काफ़ी  होता है

हमको  तो  लड़ना  है  हज़ारों  से


लोग अपनों  से  कुछ  नहीं कहते

माँगते    हैं    दुआ     सितारों  से।




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तुम  लिख  सको  तो  लिक्खो   कहानी  नयी  नयी

ज़ज़्बात   की    है    तुझ  में     रवानी   नयी  नयी


आवाज़   इंकलाब  की     फिर   से    बुलन्द   कर

है    खून    में      तुम्हारे      जवानी     नयी   नयी


जब  से    भिगो  रही  है    ये   बरसात   तन-बदन

इक    आग   उठ   रही   है    रूहानी   नयी   नयी


रीतो-रिवाज़      छोड़  ,   करे   सच   का   सामना

दुनियाँ    ये    हो  रही   है     सयानी    नयी   नयी


मुरदे     गढ़े   उखाड़ना       मसला   फ़िज़ूल   का

इतिहास       माँगता     है    कहानी    नयी    नयी


बे-बाक    बोलती   ये,    हर  इक    बात   बेख़बर

इक्कीसवीं    सदी     की     ज़ुबानी    नयी   नयी।



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गुल  गुलशन   गुलज़ार  बिके  हैं

सब  के  सब   किरदार  बिके  हैं


करते  हैं   सच   में   फेर- बदल  

यानी   अब   अखबार  बिके  हैं


कुछ  कीमत  अपनी  खोज  रहे

कुछ   हैं  जो   दोबार   बिके   हैं


चाक - गिरेबाँ     कर     डालेंगे

फूलों   वाले     हार      बिके   हैं


दौलत   तय   करती  है   मुज़रिम

इंसाफ़ के     मेआर     बिके   हैं


ख़ादिम    सब    पूँजीपतियों   के

सत्ता     के    दरबार     बिके   हैं


बस   मूर्ख     बनाते   जनता  को

मज़हब    के   फ़नकार  बिके  हैं


भूखे    रोटी     कुछ   दौलत   के

जिस्मों-जां     बाज़ार    बिके   हैं।



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चार   पैसे    कमाने    गया   आदमी

बन गया शहर में क्या से क्या आदमी


इसलिए  भी बना  कुछ  बुरा आदमी

जी  रहा  मुश्किलों  में  भला आदमी


आधुनिक  दौर  की  है  तरक़्क़ी यही

बे-हया,    बे-रहम  हो  गया  आदमी


एक   दूजे  की  दीवार  बन के  खड़ा

ना   बने    अब  यहाँ   रास्ता  आदमी


इसका  इंसानियत  से   कहाँ  वास्ता

मज़हबी ,  जाति वादी  हुआ  आदमी


झूठ  वालों  की  है   सारी  जद्दोज़हद

सच के ख़ातिर  यहाँ कब लड़ा आदमी


हारता   तो   कभी  जीतता    बेख़बर

खेलता   उम्रभर  इक   जुआ  आदमी


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जाने  किसकी   तलाश   रहती  है

आँख   अक़्सर  उदास   रहती  है


जब से  वो  छोड़कर  गया मुझको

ज़िन्दगी   बद - हवास    रहती   है


इतना   पागल  हूँ    तेरी  चाहत में

बे-ख़ुदी      बे-लिबास    रहती   है


जब से  चूमा   है   तूने   ओंठों  से

मेरे   ओंठों    पे  प्यास   रहती  है


ख़ुश्बू  उसकी   ही  है  हवाओं  में

वो   कहीं   आस   पास  रहती  है


मात   खाए   हैं   हम   फ़रेबों   से

दिल  की  बस्ती में  यास  रहती  है।



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न  तेरी  क़लम है  न मेरी  सिहाई

बिना बात के  लड़ रहे हम लड़ाई


गरीबन  के  पैरन, फ़टी है  बिमाई

अमीरी  करे  खूब   काली  कमाई


ये बैरी सियासत  किसी की नहीं है

न चक्कर मे इसके  पड़ो मेरे भाई


जहाँ  धर्म, दौलत  का पर्दा लगा है

न देगी हक़ीक़त  किसी को दिखाई


उठा मज़हबी  मामला जिस गली में

निगाहों   ने   देखी  तबाही   तबाही


न अब  कोई बनता सहारा किसी का

कुआँ  खोदते   हैं , कहीं  लोग  खाई


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धर्म  क्या  हमारा  है,  जात  क्या  तुम्हारी  है

जंग  आदमी  की   यह , आदमी  से  जारी है


पूछिए   ग़रीबों  से  , बोझ   कितना  भारी  है

बेबसी  की  चौखट  पे,  ज़िन्दगी   गुज़ारी  है


ज़ुल्म की ख़िलाफ़त में ,कोई तो  बग़ावत हो

आज  लुट रहा  हूँ  मैं, कल को  तेरी बारी  है


हाँथ  में  हुनर   लेकर ,  जंग   में  उतर  आओ

हार    एक   हिस्सा  है    जीत  भी  तुम्हारी  है


तुम को  जीतनी होगीं  , बाजियाँ  मुक़द्दर  की

ज़िन्दगी   जुआ   मानों,   आदमी  जुआरी   है


उम्रभर  मिला  धोखा, फिर भी दिल न माने ये

ऐतबार    करने    की, इस को  तो  बिमारी  है


झूठे,   बे-ज़मीरों   का    आज   बोल  बाला  है

नेकियों    की   राहों में    गर्द    ढेर     सारी   है


दर-बदर    भटकता   है    आदमी   ग़रीबी  में

गाँव  में   महाजन   है  , शहर   हर  शिकारी  है


मयकदा   उठा    लाओ,   पीने    की   तमन्ना है

दिल  में  आज  मेरे  भी   इश्क़   की  ख़ुमारी  है


मीठी- मीठी बातों  पर, मत यक़ीन  करना तुम

बच  के    बेख़बर   रहना ,   दौर   चाटुकारी  है




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रोज   उम्मीद    टूट   जाती  है

इस क़दर जीस्त आज़माती है


क्या बताएं ज़ुबाँ से तुमको हम

हाल  दिल  का नज़र  जताती है


बात  जो   फ़ासले  मिटाती  थी

आज  कल   दूरियाँ   बढ़ाती  है


भूलने    वाले    भूल   जाते   हैं

याद आती है  जिस को आती है


हर सबक़  ना  मिले   क़िताबों से

उम्र कुछ  ख़ुद-ब-ख़ुद सिखाती है


शहर में    रह    रहा   हूँ   वर्षों  से

पर  ये  लड़का   अभी  देहाती  है

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कहीं   ईमान   ख़तरे   में,   कहीं   इंसान   ख़तरे   में

ज़ुबाँ सच बोलती जिसकी,  है उसकी जान  ख़तरे में


हमारे मुल्क़  में  जब  तक  सियासत  मज़हबी होगी

रहेगी  कौम  ख़तरे  में , हर इक  भगवान   ख़तरे   में


पुरानी   रीतियाँ  छोड़ीं , समय  के    साथ  बदले  वो

उभर  आया   पड़ा  था  जो  कभी  जापान  ख़तरे में


धरम  के  नाम  पर   इंसानियत   तक़सीम कर डाली

तभी  तो   है    ग़रीबी   से ,  ये   हिन्दोस्तान  ख़तरे  में


असर  इक  आदमी  के  चीखने  से  कुछ  नहीं  होगा

पड़ेगा    इन्कलाबी      शोर   से     शैतान    ख़तरे  में।


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फिर  दिल  के  ज़ख़्म   उभर  आए

वो    वर्षों     बाद      नज़र   आए


उम्मीद      जिधर  थी  फूलों   की

उस   ज़ानिब   से    पत्थर   आए


क़त्ल   किया  था  और  किसी  ने

इल्ज़ाम   किसी   के    सर   आए


जब    रहज़न    सारे     लूट   चुके

तब    जाकर    कुछ  रहबर  आए


मंज़िल   की   ख़्वाहिश   छूट   गई

राह   में      ऐसे      मन्ज़र     आए


खिड़की   से  क्या    झाँक  रही   है

कह    दो     उस से     बाहर   आए




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जाम  को   पीने    वाले   हैं

दिल  के  ज़ख़्म  निराले  हैं


मैं तो मुसाफ़िर समझा था

वो   हैं कि   ढेरा   डाले  हैं


दुनियाँ    कैसी  तुम  जानो

हम  तो    भोले   भाले   हैं


कुछ    ऐसे  इनकार  किया

लब  पर    उनके   ताले   हैं


मेरे ही  घर   में अँधेरा  क्यों

चारों     ओर     उजाले    हैं


मत पूछो, हम कल क्या थे

अब   रोटी   के    लाले   हैं


आँख न  तय, कर पाए अब

चिलमन   हैं   या   जाले   हैं


हर बात  ग़ज़ल  बन  जाती 

ग़म   ही    इतने     पाले   हैं


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आँधियों  से   लड़ा-भिड़ा  होगा

वो  दीया  तब कहीं  बुझा  होगा


कद्र  कर ले  क़रीब  है जब तक

एक  दिन   हर कोई  जुदा  होगा


बात  दिल की न तुमसे कह पाए

बस  इसी  बात का   गिला  होगा


रेत   पर     बून्द    सूख     जाएगी

प्यास का  और  क्या  सिला  होगा


राह  तुम  ही  हमारी  मन्ज़िल हो

आप के   बाद   मेरा   क्या  होगा


जंग   लड़ने  की  क्या ज़रूरत है

और   भी    कोई    रास्ता   होगा



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मंज़िलों  ने  कहाँ  चुना  हमको

उम्र भर   रास्ता   मिला हमको


उसके  होते  हुए भी ज़ुल्म हुए

रास  आया  नहीं  ख़ुदा हमको


ये  तकल्लुफ़  तुझे   मनाने का

खुद से होना पड़ा खफ़ा हमको


भूल जाने के बाद भी शख़्स वो

याद    आया   कई  दफ़ा हमको


बेख़बर   दाग़   दाग़   दामन  है

ज़ख्म   इतने  हुए अता  हमको






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राजा - रंक     बदल   जाता  है

जैसे   सूरज     ढल   जाता  है


चाहेँ     भँवरे     ना     मँडराएँ

फूल तो फिर भी खिल जाता है


जो    मौज़ों    से    टकराते  हैं

उनको  साहिल  मिल  जाता है


तुम  बिन  मुश्किल होती है पर

काम   हमारा    चल   जाता  है


इतनी   मेहनत    कर   लेता  हूँ

दाना - पानी     मिल   जाता  है


ग़म कुछ कम था, ना मिलने का

पा कर     खोना   खल  जाता है


नज़रो    की     आपा - धापी  में

दिल   में   कोई   पल   जाता  है


अक़्सर    भोले     दीवानों    को

रूप  हसीं   सा   छल   जाता  है।




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ख़ुद को  हीलो-हिज़ाब  छोड़  दिया

ज़िस्म का   हर  नक़ाब  छोड़  दिया


दर्द    ही    जब   मेरा    मुक़द्दर   है

ज़ख़्म  कितने , हिसाब  छोड़ दिया


पाँव    ये     रोज     लड़खड़ाते   हैं

जब से   पीना   शराब   छोड़  दिया


आशिकों   से  हुआ  मुख़ातिब जब

देखकर  दिल  ने  ख़ाब  छोड़  दिया


मुझको   उलझा   गया   सवालों  में

ख़ुद  ने   देना    ज़वाब   छोड़  दिया


मैंने   सोचा  था ,  ग़म   छिपा  लूँगा 

आँख  ने   थोड़ा  आब  छोड़  दिया


मैं  भी  शाख़ों  से  तोड़  सकता था

चूम कर   ही  ग़ुलाब    छोड़   दिया।



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