2023 वैभव बेख़बर 60 gazal ग़ज़ल संग्रह
कहीं फनकार दौलत के कहीं किरदार दौलत के
बचे हैं जो कहानी में सभी दीदार दौलत के,
कहीं से ढूंढ़ लाओ चंद चारा-साज़ उल्फ़त के
जमीं पर अब नज़र आते हैं सब बीमार दौलत के,
के जिसके पास है दौलत वही राजा बनेगा अब
हुक़ूमत के लिए सजते हैं अब दरबार दौलत के,
अभी तक नस्लवादी , मस्लहत के द्वंद ज़िंदा हैं
उठा रख्खें हैं दुनियाँ नें नये मेयार दौलत के,
भले इंसान को कोई यहाँ सोहबत नहीं मिलती
यहाँ इकरार दौलत के सभी इनकार दौलत के,
अदब का फ़न लिए बैठे हैं हम बस्ती में वर्षों से
मगर बाज़ार में चलते फ़क़त व्यापार दौलत के,
सजाते हैं, बनाते हैं, ये दौलतमंद के माफ़िक
ग़रीबी छापते हैं कब , यहाँ अख़बार दौलत के!
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मंज़िल तक हैं जाने वाले
साथ हमारा पाने वाले,
ढूंढ़ ही लेंगे दाना - पानी
पैसे चार कमाने वाले,
वक़्त ने ऐसी बाज़ी पलटी
लौट के आये जाने वाले,
आँखों से सब अन्धे निकले
मुझ पर तीर चलाने वाले,
झील समंदर इक ज़रिया हैं
हम हैं प्यास बुझाने वाले,
फूलों से टकराते अक्सर
चोट ज़िगर की खाने वाले,
क़िस्म नई की देख न रौनक़
चावल खोज पुराने वाले !
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बहरे अगर हैं कान तो फिर टैक्स दीजिए
बोले सही ज़ुबान तो फिर टैक्स दीजिए,
फुटपाथ से हटाया नगर पालिका ने जब
खोली नयी दुकान तो फिर टैक्स दीजिए,
ग़ुरबत करे सवाल तो बाग़ी बना दिया
ग़र देश है महान तो फिर टैक्स दीजिए,
जब तक रहे किराए पे देना पड़ा नगद
बनवा लिया मकान तो फिर टैक्स दीजिए,
महँगाई से बुरा हाल आम-आदमी का है
ग़र चाहिए निदान तो फिर टैक्स दीजिए,
ओले गिरे क़ुसूर है कुदरत का बेख़बर
खुशहाल है किसान तो फिर टैक्स दीजिए!
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ख़त्म सारे करार करते हैं
आओ दहलीज़ पार करते हैं,
बात करने से हल नहीं निकला
एक - दूजे पे वार करते हैं
शाख की फ़िक्र कौन करता है
लोग फूलों से प्यार करते हैं,
पास आता नहीं कोई मरहम
ज़ख़्म बस इन्तिज़ार करते हैं,
जब तलक हो निबाह सच बोलो
झूठ दिल में दरार करते हैं,
सबको मिलती कहाँ, यहाँ मंज़िल
पाँव कोशिश हज़ार करते हैं !
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हम समझे अपने लोग तो प्यार लिए हैं
लेकिन सब मतलब के किरदार लिए हैं,
फूल समझकर मत लेना, फूल किसी से
फूल नहीं वो हाँथों में हथियार लिए हैं,
नाव मुहय्या हो जाती कमज़र्फ़ों को
मेहनत-कश वर्षों से मझधार लिए हैं,
कौम किसी को मज़हब ने सिखलाई है
लोग जो मन के भीतर दीवार लिए हैं,
जाते वक़्त नहीं साथ में जाता कुछ
नाहक़ हम कितना कुछ बेकार लिए हैं!
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वो, जो ऊपर नज़र नहीं करते
बादलों में सफ़र नहीं करते,
हम मुहब्बत में वो भी कर बैठे
काम जो उम्रभर नहीं करते,
ज़ख़्म देखे हैं इतने पैरों ने
इन पे काँटे असर नहीं करते,
दिल फ़रेबों से बच गया होता
हम भरोसा अगर नहीं करते,
उनको अफ़सोस करना पड़ता है
काम जो सोचकर नहीं करते!
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नादाँ दिल उसके प्यार में था
और वो अपने किरदार में था,
ज़ज़्बात मेरे नीलाम हुए
जाना उसका बाज़ार में था,
भीड़ लगी है उसके पीछे
कल चेहरा जो अखबार में था,
मीनारें उतनी ऊँची थीं
लोहा जितना आधार में था,
मौज़ उड़ाई ख़ूब भतीजों ने
चच्चा जब तक सरकार में था,
इस पार नहीं मिल पाया जो
शायद वो ही उस पार में था!
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बुलन्दी बड़ी से बड़ी चाहता है
ये सारा चमन, आदमी चाहता है,
ज़रूरत से ज़्यादा बहुत कुछ है लेकिन
नहीं पास है जो वही चाहता है,
अलग बात है ख़ुदकुशी कोई कर ले
मगर आदमी ज़िन्दगी चाहता है,
रिवाजों में डूबा है किरदार जिसका
वो भी इक कहानी नई चाहता है
मकाँ,रोटी कपड़ा से, तन ख़ुश है लेकिन
ये मन ,जाने कैसी ख़ुशी चाहता है,
हुनर आज़माते रहो जगमगाते
कहाँ आग कोई बुझी चाहता है!
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इक नज़र उस नज़र से मिलाने के बाद
गुल चमन में खिले हैं ज़माने के बाद,
जिसकी हर बात का दिल ने रख्खा यक़ीन
उसने चाहा मुझे आज़माने के बाद,
सादगी आपकी, रास आने लगी
जल उठी आग दिल की बुझाने के बाद,
मुझको रफ़्तार, रंज-ए-सफ़र से मिली
चलना आया मुझे लड़खड़ाने के बाद,
जब न पाया, बुलंदी पे चैन-ओ-क़रार
ख़ुद बिखेरा है, ख़ुद को सजाने के बाद,
दाल-रोटी की कीमत पता है उसे
ख़र्च करता है, जो ख़ुद कमाने के बाद,
ख़ुद को ज़िंदा बनाये रहो बेख़बर
दफ़्न कर देंगे लोग, जान जाने के बाद!
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रास्ते, आने-जाने में उम्र कट गई
मंज़िलों के फ़साने में उम्र कट गई,
कुछ फटे, कुछ पुराने में उम्र कट गई
चार कपड़े जुटाने में उम्र कट गई,
बात पानी की होती, तो खोदते कुआँ
प्यास दिल की बुझाने में उम्र कट गई,
भाव भरते रहे लफ्ज़ लफ्ज़ उम्रभर
शाइरी को बनाने में उम्र कट गई,
बारहा चोट खाता रहा यकीं मेरा
मतलबी इस ज़माने में उम्र कट गई,
फिर भी हो ना सका,हल सवाल हिज़्र का
ख़ुद को ख़ुद से मिलाने में उम्र कट गई,
एक पत्थर पे दिल आ गया था बेख़बर
उसको मूरत बनाने में उम्र कट गई!
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टी.वी. चैनल पे हाले-नगर देखिए
सनसनी ख़ेज़ हर पल ख़बर देखिए,
है परेशां बशर बढ़ती महँगाई से
भूख की जंग शामों-सहर देखिए,
जी हुज़ूरी, किसी की मजूरी करे
कैसे करती ग़रीबी बसर देखिए,
धूर्त बैठे मिलेंगें बुलंदी पे कुछ
रास्तों में भटकता हुनर देखिए,
नाज़ुकी और नज़ाकत के, जो रब्त हैं
वो भी बाज़ार हैं इक नज़र देखिए,
छेड़िये बात ऐसे ही कहीं मज़हबी
आदमी का सियासी असर देखिए!
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बस्ती, जंगल, सहरा बाज़ार सियासी
राही , रस्ते , मन्ज़िल मझधार सियासी,
हाँथों में , है मेरे औज़ार सियासी
पेट के ऊपर लटकी तलवार सियासी,
कोर्ट कचहरी , दफ़्तर से उम्मीद न कर
सब के सब होते हैं, किरदार सियासी,
जब भूख ने आवाज़ उठाई रोटी की
छाप रहे हैं पिज़्ज़ा, अखबार सियासी,
बिक जाता सब पानी, पूँजीपतियों को
जनता में होती है बौछार सियासी,
काम के वक़्त, कहाँ आते हैं नेता जी
पाँच बरस में देते हैं दीदार सियासी,
जो आदम, को आदम से ही बाट रही
मज़हब, मज़हब है इक दीवार सियासी,
लाचारी में निर्धन शीष झुकाते हैं
दान के , नाम पे लगते हैं दरबार सियासी!
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दिल के ज़ज़्बात सुनाकर के चले जायेंगे
अपना किरदार निभा कर के चले जायेंगे,
सिर्फ़ पानी को सिखाएंगे मुहब्बत करना
शहर की प्यास बुझाकर के चले जायेंगे,
एक वनवास बिताने हम आये हैं पर
एक इतिहास बनाकर के चले जायेंगे,
कौन आता है मुहब्बत से मुहब्बत करने
वक़्त अपना वो बिताकर के चले जायेंगे,
ये जो तफ़रीक़, सियासत ने खड़ी कर दी है
रंज की दीवार गिराकर के चले जायेंगे,
आ गया जिसको बुलन्दी की हिफाज़त करना
उसको सरदार बनाकर के चले जायेंगे !
तफ़रीक़=भेदभाव की भावना
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पाँव, आराम को तरसते हैं
एक मन्ज़िल, हज़ार रस्ते हैं,
किस पे ऐतबार अब किया जाए
साँप आस्तीन के ही डसते हैं,
ज़िस्म बिकने लगे बज़ारों में
हाय? कितने ज़मीर सस्ते हैं,
लोग हैं होशियार , ज़्यादा जो
अपनी चालाकियों में फसते हैं,
छोड़ जाता है कोई अपना जब
अश्क़ बहते नहीं बरसते हैं,
हँस रहे हैं तो आज हँसने दो
हम कहाँ, रोज - रोज हँसते हैं!
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लिक्खे तुम्हारे नाम से पैगाम बेख़बर
दिल ने पुकारा तुमको सुबह-शाम बेख़बर
सीखा नहीं किसी से मैंने शाइरी का फ़न
सब है तुम्हारे इश्क़ का ईनाम बेख़बर
हासिल करेंगे इक दिन राही , मुक़ाम को
कब तक रहेंगीं कोशिशें नाक़ाम बेख़बर
शौहरत का शौक़ क्या,उसे दौलत की फ़िक्र क्या
जिसको पता है ज़ीस्त का अंज़ाम बेख़बर
जबसे मिला है साथ तेरा मुझको बेख़बर
मिलने लगा है रूह को आराम बेख़बर!
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इंसानियत की राह की दीवार के ख़िलाफ़
बेबाक़ बोलता हूँ सितमगार के ख़िलाफ़
प्यासी ज़मीं को छोड़, जो दरिया को जा रही
कश्ती मेरी चलेगी तो उस धार के ख़िलाफ़
हर बात पर उसकी जी-हुज़ूरी न कर सका
अपना कबीला हो गया, सरदार के ख़िलाफ़
जब तक सुधर न जाएगी, हालत ग़रीब की
आवाज़ मैं उठाऊँगा सरकार के ख़िलाफ़
लिखता रहूँगा मुल्क़ की सरकार के ख़िलाफ़
शाख़ें हुईं शहीद , डगर -ए- इंकलाब में
ये फूल कब खड़े हुए, तलवार के ख़िलाफ़
पीछे पड़े हैं लोग कुछ अपने ही बेख़बर
छः दिन खड़े हों जैसे इतवार के ख़िलाफ़!
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ज़ुल्म सहते हुए बेबसी में करो
तुम बग़ावत करो, रौशनी में करो
कोई शोषित न हो,नस्ल के नाम पर
ज़हनी बदलाव इस आदमी में करो
नाज मां-बाप तुम पर, तुम्हारे करें
काम ऐसा कोई ज़िन्दगी में करो
अपने परिवार का फ़र्ज़ समझो ज़रा
ख़ुद को बर्बाद मत आशिक़ी में करो!
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रास आये न मुझको शबाबी ग़ज़ल
यारों लिक्खा करो इंकलाबी ग़ज़ल
हम को बहलाओ न झूठे ज़ज़्बातों से
वक़्त की माँग है, अब हिसाबी ग़ज़ल
है सवालों की मझधार में, ज़िन्दगी
तुम को लिखनी पड़ेगी जबाबी ग़ज़ल
लड़ रहा है ग़रीबी से अहले वतन
इन को सुननी नहीं है सराबी ग़ज़ल
आह, सुनकर, सदन डगमगाने लगे
आम जन की लिक्खो इज़्तिराबी ग़ज़ल
भूख, लाचार है रोटियों के लिये
कैसे ग़ुर्बत, सुनेगी गुलाबी ग़ज़ल
ज़िन्दगी की हक़ीक़त से हो रु-ब-रु
बेख़बर छोड़ लिखना ये ख़्वाबी ग़ज़ल!
कभी रुतबा ,कभी तबका,कभी बातिल से मिलता है
ज़मीं पर आदमी को आदमी मुश्किल से मिलता है
किसी मक़तल के जैसीं हों, जहाँ बाज़ार की शक्लें
वहीं सरदार का रिश्ता किसी क़ातिल से मिलता है
हज़ारों रास्ते हैं जो किसी मंज़िल को जाते हैं
मगर इक रास्ता ही बाद में मंज़िल से मिलता है
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मेरी झोली में चार दाने थे
और सब चिड़ियों को चुगाने थे
फ़र्ज़ वो भी निभा रहा हूँ मैं
फ़र्ज़ जो आपको निभाने थे
ज़ख्म ताज़ा थे मेरे सीने के
तेरे मरहम बहुत पुराने थे
दिल अगर रो पड़ा था, रो लेते
तुम को आँसू नहीं छिपाने थे
कोई मुज़रिम तो मैं नहीं था पर
उस की आँखों में क़ैदखाने थे
राह मालूम थी बुलन्दी की
हम मग़र अस्ल के दीवाने थे !
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ख़ूबसूरत ये साल उल्फ़त का
हर तरफ़ है जमाल उल्फ़त का,
वो जो दुश्मन थे ,दोस्त बन बैठे
हो रहा है कमाल उल्फ़त का,
रात बिन नींद के गुज़र जाए
जब भी आये ख़याल उल्फ़त का,
खिल रहा हो कि जैसे गुल कोई
उसके रुख़ पे गुलाल उल्फ़त का,
क्यों इसे संग सा बनाते हो
ज़िस्म ये है सिफ़ाल उल्फ़त का,
इश्क़ खोया हो जिसने क़िस्मत से
उससे पूछो मलाल उल्फ़त का!
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दिल को ऐतबार ना मिला अब तक
दिल का बीमार ना मिला अब तक
जिस को देखा है ख़ूब ख़्वाबों में
उसका दीदार ना मिला अब तक
एक बुनियाद मुझ को रखनी है
कोई आधार ना मिला अब तक
जिस क़दर रूह की तमन्ना है
वैसा किरदार ना मिला अब तक
सौंप दूँ किस को मैं अना अपनी
कोई खुद्दार ना मिला अब तक
आस, उस पार से चली आई
कोई इस पार ना मिला अब तक
मेरे ख़ातिर जो बेच दे ख़ुद को
वो ख़रीदार ना मिला अब तक
एक परिवार वाली औरत हूँ
मुझ को इतवार ना मिला अब तक
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कोई ख़ूबी तिलिस्मी न पानी में है
ताज़गी है तो उसकी र'वानी में है
रब्त, शोहरत-तलब रह गए अहद में
आदमी की समझ, बद-गुमानी में है,
धूप-छाँ, जल, उर्वर जमीं है मगर
बाग सारा ख़याली, ख़िज़ानी में है,
ज़ख़्म है, जब्र है , ज़ुल्म है उम्रभर
और कुछ भी नहीं ज़िंदगानी में है,
चंद ख़्वाहिश लिए दर-बदर फिर रहा
एक तनहा मुसाफ़िर कहानी में है,
जो बयाँ हो गया , ख़ल्क़ है बेख़बर
इश्क़ ज़ज़्बात की, बे-ज़बानी में है!
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हर हक़ीक़त हो, ख़्वाब ......मुश्किल है
हसरतों का , हिसाब ......मुश्किल है,
तेरे सारे सवाल ...... वाज़िब हैं
फिर भी इनका, ज़वाब......मुश्किल है,
वो तो काँटों से खौफ़ खाता है
उस के हिस्से, गुलाब..... मुश्किल है,
रास आऊँ , न आऊँ दुनियाँ को
ओढ़ लूँ मैं, नक़ाब...... मुश्किल है,
करता हूँ काम काज उल्फ़त का
मेरे धंधे में, लाभ......मुश्किल है!
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किरदार में लिहाज का पर्दा लिए हैं हम
दुनियाँ समझ रही है कि कर्ज़ा लिए हैं हम,
बाज़ी हमारे हाँथ से , फिर भी निकल गई
हम सोचते थे, खेल का इक्का लिए हैं हम,
जिस प्यास में भटक रहा,सहरा में दर-बदर
उसको बताओ आँख में , झरना लिए हैं हम,
झोली भरी भराई पे, बरक़त बरस रही
और मुददतों से हाँथ में कासा लिए हैं हम,
जिन ख़्वाहिशों के सामने,कमतर वक़ार हो
उन ख़्वाहिशों को दिल में ही दफ़ना लिए हैं हम,
लिखता नहीं ख़याल से , लबरेज़ शायरी
ग़ज़लों में इंक़लाब का, जत्था लिए हैं हम!
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झूठों को झुठला सकता हूँ
क्या है सच, बतला सकता हूँ,
खोल रहा हूँ राज-ए-क़यादत
चोट सियासी खा सकता हूँ,
मुझ को राह बनानी है इक
मन्ज़िल तक मैं भी जा सकता हूँ,
मेरे भीतर आग नहीं , पर
लोहे को पिघला सकता हूँ,
ख़्वाहिश है, लश्कर बाग़ी हो
शीश तो मैं भी झुका सकता हूँ!
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मरज़ ज़िन्दगी का, दवाई को तरसे
ग़रीब आदमी पाई-पाई को तरसे,
गुज़रती हैं फुटपाथ पर रात जिनकी
बदन सर्दियों में रजाई को तरसे,
यक़ीनन ज़माना बुरा चल रहा है
भला आदमी ही भलाई को तरसे,
मजूरी, करे भूख, कमसिन उमर में
ग़रीबों के बच्चे पढ़ाई को तरसे,
बढ़ाओ न इतनी ये महँगाई साहब
कि जाँ फिर हमारी रिहाई को तरसे,
दलालों का धंधा बड़े जोर पर है
हुनरमंद अब तो कमाई को तरसे!
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दिल अक्सर वीरान हमारा होता है
पूरा कब अरमान हमारा होता है,
बेसब्री में लोग भटकते हैं अक़्सर
रस्ता तो आसान हमारा होता है,
दुनियाँ को लगता है शोहरत मिलती है
सच पूछो , नुकसान हमारा होता है,
ज़िस्मों-जाँ, ईमान लुटाए फिरते हैं
दिल जिस पर कुर्बान हमारा होता है,
दिवारें बहुत हैं
दरारें बहुत हैं
नज़र की कमी है
नज़ारे बहुत हैं
दीआ ढूंढ लाओ
शरारे बहुत हैं
वो जीतेंगे इक दिन
जो हारे बहुत हैं
बड़े हैं समंदर
सो खारे बहुत हैं
कमी चाँद की है
सितारे बहुत हैं
न तुम सुन सके,हम
पुकारे बहुत हैं!
बढ़ रही अजब सी तिशनगी धीरे धीरे
छा रही है ज़हन में बेख़ुदी धीरे धीरे,
आशिक़ी में टूटा , इस क़दर दिल हमारा
इश्क़ कर रहा है ख़ुदकुशी धीरे धीरे
कोई सम्त ना मंज़िल न रस्ता पता है
चलती जा रही है ज़िन्दगी . धीरे धीरे !
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हँस के वो भी करार करते हैं
पीठ पीछे जो वार करते हैं,
छोड़ देते हैं तन्हा, काँटों को
लोग फ़ूलों से प्यार करते हैं,
सच यही है हमारे जीवन का
गलतियाँ बार- बार करते हैं,
लौटकर वो कभी न आएँगे
फिर भी हम इंतिज़ार करते हैं,
बात उससे, न कोई कह पाऊँ
जिस की बातें हज़ार करते हैं,
इक दफ़ा भी न हो सका हमसे
लोग जो बेशुमार करते हैं,
चीज जो ज़िस्म से परे है अब
जिसपे हम जाँ निसार करते हैं!
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न हम कोई खज़ाना चाहते हैं
मग़र हिस्से का दाना चाहते हैं,
नहीं है शौक कड़ुवा बोलने का
तुम्हें बस सच बताना चाहते हैं,
सफ़र दुशवार होता जा रहा है
क़दम,मन्ज़िल को पाना चाहते हैं,
उसी ने छीन ली आवाज मेरी
जिसे हम गुनगुनाना चाहते हैं,
नदी में तैरना आता नहीं, और
समन्दर पार जाना चाहते हैं,
जो ख़ुद ऐतबार के क़ाबिल नहीं है
मुझे वो आज़माना चाहते हैं,
जिसे हम कर रहे हैं याद वर्षों से
उसे अब याद आना चाहते हैं!
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अपना फ़न आज़माना बड़ी बात है
साथ सच का निभाना बड़ी बात है,
चार पैसे कमाना , नहीं है कठिन
नेकियों से कमाना बड़ी बात है
इतनी महँगाई है और धंधा है मन्द
घर का खर्चा चलाना बड़ी बात है,
खूबसूरत नए हुस्न देखे बहुत
प्यार पहला भुलाना बड़ी बात है,
ज़िन्दगी भी कहाँ इतनी आसान है
इसको हँस के बिताना बड़ी बात है,
उसके कूचे से गुजरे हज़ारो दफ़ा
आज कल आना-जाना बड़ी बात है,
ज़िस्म की भूख को, ये कहाँ है ख़बर
फ़र्ज़-ए-उल्फ़त निभाना बड़ी बात है!
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दुशवार है ग़रीब की अब ज़िन्दगी यहाँ
क्यों लूटता है आदमी को आदमी यहाँ,
अब लोग बिन तमीज़ का, बरताव कर रहे
मतलब परस्त हो गई है बन्दगी यहाँ,
कानून को ख़रीद के रखते हैं ज़ेब में
चलती हरामख़ोरों की दादागिरी यहाँ,
प्यासा हमारे ख़ून का फिर भी वज़ीर है
लाखों घरों को खा गई है भुखमरी यहाँ,
ना तर्क़, ना सवाल , सभी अंधभक्त हैं
धंधा धरम के नाम पे, है लाज़िमी यहाँ,
केवल हमीं जी जान से मरते हैं आप पर
होंगें कई हबीब तेरे और भी यहाँ,
ये दौर है फ़रेब का बाज़ार बेख़बर
ईमान ही बचा है फ़क़त क़ीमती यहाँ!
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दिल , ज़िस्म जाँ के नगर में रहकर
देखो किसी की नज़र में रहकर
कुछ मन्ज़िलों से हुआ न हासिल
सीखा बहुत कुछ सफ़र में रहकर,
आँगन के बटने का, क्या सबब था
ना जान पाए ये घर में रहकर,
उस पार कश्ती लगाना सीखा
दरिया, समंदर, भँवर में रहकर,
आबो - हवा ही न रास आई
हम लौट आए शहर में रहकर,
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कोई अहकाम दे मोहब्बत से
हाँ मग़र काम दे मोहब्बत से,
मीठी बातों से दिल हुआ बर्बाद
तल्ख़ पैग़ाम दे मोहब्बत से,
प्यास जो भी पिलाए पी लूँगा
ज़हर या जाम दे मोहब्बत से,
पास बैठूँ तेरे, इबादत में
चाय को, शाम दे मोहब्बत से,
इश्क़ ही है फ़क़त ख़ता मेरी
कोई इल्ज़ाम दे मोहब्बत से,
ना-समझ, बावला या पागल कह
जो भी दे, नाम दे मोहब्बत से,
दिल को अरसा हुआ, सुकूँ पाए
अब तो आराम दे, मोहब्बत से,
सारी दुनियाँ ख़रीद सकती है
जो मेरा दाम दे मोहब्बत से !
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मेरे वज़ूद का मुझे आभास ना रहे
मत आ क़रीब इतना कि फिर प्यास ना रहे,
होगा हसीं कैसे इस मधुमास का मिलन
ग़र कोशिशों के ज़ीस्त में वनवास ना रहे,
महफ़िल में मेरी आके जो खुश रहते थे सदा
वो लोग मुश्किलों में, मेरे पास ना रहे,
जो बात तेरे दिल में है बेबाक़ बोल दे
मत बोल झूठ इतना कि विश्वास ना रहे,
चाहे नसीब में हो भटकना ही उम्रभर
पर ज़िन्दगी कभी, कोई बे-आस ना रहे,
तुम लौटकर तो आये, मग़र देर से बहुत
अब ज़हन में हबीब के अहसास ना रहे !
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कहीं पर ज़िस्म बिकते हैं कहीं ईमान बिकते हैं
अजब बाज़ार है दुनियाँ यहाँ इंसान बिकते हैं,
सजावट पर मचलते सब बनावट देखता है कौन
दिखावा जिसका होता है वही सामान बिकते हैं ,
खनक सुनकर सुनाती है अदालत फ़ैसले अपने
सियासी दौर में इंसाफ़ के मीज़ान बिकते हैं,
कमिशनर क्या,कलेक्टर क्या,विधायक पाल रख्खें हैं
अमीरी जानती है , किस तरह सुल्तान बिकते हैं,
हुक़ूमत चाहती है जो वही ख़बरें सुनाते हैं
यहाँ अख़बार वाले अब , सरे-मैदान बिकते हैं,
इबादत से नहीं भरती, किसी कमज़ोर की झोली
नफ़ा ही रोज बिकता है कहाँ नुकसान बिकते हैं,
बना डाला है मज़हब को यहाँ बाजार लोगों ने
अगर बाज़ार है मज़हब, तो फ़िर भगवान बिकते हैं!
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फूल देना , ग़ुलाब मत देना
मेरी आँखों को ख़्वाब मत देना,
लोग पूछेंगे मेरे बारे में
बात करना, ज़वाब मत देना,
लिखने-पढ़ने का जिसको इल्म न हो
हाँथ उसके क़िताब मत देना,
हर सलीका बिगाड़ देते हैं
बे-हुनर को ख़िताब मत देना,
जिसने दुनियाँ को फूल बाटें हों
उस शज़र को अज़ाब मत देना,
सबको राहे-नदी बताना, पर
हर मुसाफ़िर को आब मत देना,
कोई मज़बूर ख़ुदकुशी कर ले
वक़्त इतना ख़राब मत देना,
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कोई कपड़े बदलता है कोई चेहरा बदलता है
फ़रेबी आदमी हर मोड़ पर रस्ता बदलता है,
बिकाऊ है जहाँ हर चीज वो बाज़ार है दुनियाँ
जो थोड़े होते हैं ज़िद्दी उन्हें पैसा बदलता है,
कहाँ तक़दीर बनती है इबादत से गरीबों की
हुनर ही ज़िंदगी का रूप और दर्ज़ा बदलता है,
किसी ख़ामोश बैठे शख़्स को मत छेड़िए यूँ ही
भड़क जाए अगर शोला तो फिर किस्सा बदलता है,
विचारों की लड़ाई कौन लड़ता है सियासत में
सियासी कुर्सी की ख़ातिर यहाँ पाला बदलता है!
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सियासी सवालों का हल लिख रहे हैं
हम अपने वतन का जदल लिख रहे हैं,
ये सत्ता, ये संसद, ये शासन, ये शोषन
किया जो गरीबों पे छल लिख रहे हैं,
कैसे आबो-दाना, जुटे चार - आना
जो है ज़िंदगी में, ख़लल लिख रहे हैं,
हर इक झोपड़ी को, लिखें झोपड़ी हम
कलमकार जिसको महल लिख रहे हैं,
हसीनों की ज़ुल्फ़ों में उलझे हैं अब तक
फ़रेबी हवस की ग़ज़ल लिख रहे हैं!
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मुसाफ़िर चाहता है इक दरो-दीवार मिल जाए
कहानी का तक़ाज़ा है नया किरदार मिल जाए,
किसी दरिया समन्दर में उतरने के न क़ाबिल हैं
मग़र कश्ती की चाहत है कोई पतवार मिल जाए,
कोई लड़की तरसती है नए कपड़े पहनने को
किसी लड़की की ख़्वाहिश है गले का हार मिल जाए,
अभी भी शहर की फुटपाथ पे इक भीड़ सोती है
सियासत मज़हबी ना हो, इन्हें घरद्वार मिल जाए,
हुनर भी है ज़िगर भी है मग़र मक़सद के मारे हैं
क़बीले की ज़रूरत है कोई सरदार मिल जाए,
सफ़र में छोड़ आए दोस्त जिस मंज़िल के ख़ातिर हम
वही मंज़िल ये कहती अब कि कोई यार मिल जाए!
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वैसे सब की जात अलग है
पैसा हो तो बात अलग है,
ऊँचे लोग नहीं खा सकते
मेरे घर का भात अलग है,
ज़िम्मेदार तो है ही मुज़रिम
नेता जी का हाँथ अलग है,
जो हारे थे, जंग अलग थी
जो खाई है मात अलग है,
गिरगिट से तुलना मत करना
आदम की औक़ात अलग है,
पास हैं अपने लोग बहुत पर
तन्हाई का साथ अलग है!
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मुसाफ़िर चाहता है की सफ़र अच्छा गुज़र जाए
मगर दरिया की कोशिश है भँवर में ये बिखर जाए,
हम अपनों के लिए, अपना बहुत कुछ छोड़ आए हैं
जुटा लूँ चार पैसे तो मेरा परदेश, घर जाए,
बड़ी ही बेबसी में दिन गुज़रते हैं यहाँ सच के
अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरी हालत सुधर जाए,
कोई उम्मीद मत पालो किसी अपने, पराये से
भरोसा आदमी का क्या, न जाने कब मुकर जाए,
कई मक़सद, कई रस्ते नज़र के सामने हैं, पर
बताओ बेख़बर ये इश्क़ का मारा किधर जाए,
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फूल देने थे खार दे डाले
इश्क़ नें ज़ख़्म हज़ार दे डाले,
वो जो ख़ुद, ज़िस्म को पहनने थे
दिल ने जेवर उधार दे डाले,
पास ख़ुद बेकरारियाँ रख लीं
यार को सब करार दे डाले,
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अब खुद तक मुझको आना है
पर राह में एक ज़माना है,
तन्हाई ही है दूर तलक़
दुनियाँ की भीड़ बहाना है,
दिल नें खोया है इतना कुछ
अब और नहीं कुछ पाना है,
है प्यास बहुत हर मन्ज़र में
दाने का भूखा दाना है
जीत की इतनी ज़िद भी ना कर
जब हार के सब कुछ जाना है,
मालूम जिसे हो सब पहले से
फिर उसको क्या समझाना है,
तेरे दर आया, है क़िस्मत
राही का कौन ठिकाना है!
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कहीं फनकार दौलत के कहीं किरदार दौलत के
बचे हैं जो कहानी में सभी दीदार दौलत के,
कहीं से ढूंढ़ लाओ चंद चारा-साज़ उल्फ़त के
जमीं पर अब नज़र आते हैं सब बीमार दौलत के,
के जिसके पास है दौलत वही राजा बनेगा अब
हुक़ूमत के लिए सजते हैं अब दरबार दौलत के,
अभी तक नस्लवादी , मस्लहत के द्वंद ज़िंदा हैं
उठा रख्खें हैं दुनियाँ नें नये मेयार दौलत के,
भले इंसान को कोई यहाँ सोहबत नहीं मिलती
यहाँ इकरार दौलत के सभी इनकार दौलत के,
अदब का फ़न लिए बैठे हैं हम बस्ती में वर्षों से
मगर बाज़ार में चलते फ़क़त व्यापार दौलत के,
सजाते हैं, बनाते हैं, ये दौलतमंद के माफ़िक
ग़रीबी छापते हैं कब , यहाँ अख़बार दौलत के!
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मंज़िल तक हैं जाने वाले
साथ हमारा पाने वाले,
ढूंढ़ ही लेंगे दाना - पानी
पैसे चार कमाने वाले,
वक़्त ने ऐसी बाज़ी पलटी
लौट के आये जाने वाले,
आँखों से सब अन्धे निकले
मुझ पर तीर चलाने वाले,
झील समंदर इक ज़रिया हैं
हम हैं प्यास बुझाने वाले,
फूलों से टकराते अक्सर
चोट ज़िगर की खाने वाले,
क़िस्म नई की देख न रौनक़
चावल खोज पुराने वाले !
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बहरे अगर हैं कान तो फिर टैक्स दीजिए
बोले सही ज़ुबान तो फिर टैक्स दीजिए,
फुटपाथ से हटाया नगर पालिका ने जब
खोली नयी दुकान तो फिर टैक्स दीजिए,
ग़ुरबत करे सवाल तो बाग़ी बना दिया
ग़र देश है महान तो फिर टैक्स दीजिए,
जब तक रहे किराए पे देना पड़ा नगद
बनवा लिया मकान तो फिर टैक्स दीजिए,
महँगाई से बुरा हाल आम-आदमी का है
ग़र चाहिए निदान तो फिर टैक्स दीजिए,
ओले गिरे क़ुसूर है कुदरत का बेख़बर
खुशहाल है किसान तो फिर टैक्स दीजिए!
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ख़त्म सारे करार करते हैं
आओ दहलीज़ पार करते हैं,
बात करने से हल नहीं निकला
एक - दूजे पे वार करते हैं
शाख की फ़िक्र कौन करता है
लोग फूलों से प्यार करते हैं,
पास आता नहीं कोई मरहम
ज़ख़्म बस इन्तिज़ार करते हैं,
जब तलक हो निबाह सच बोलो
झूठ दिल में दरार करते हैं,
सबको मिलती कहाँ, यहाँ मंज़िल
पाँव कोशिश हज़ार करते हैं !
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हम समझे अपने लोग तो प्यार लिए हैं
लेकिन सब मतलब के किरदार लिए हैं,
फूल समझकर मत लेना, फूल किसी से
फूल नहीं वो हाँथों में हथियार लिए हैं,
नाव मुहय्या हो जाती कमज़र्फ़ों को
मेहनत-कश वर्षों से मझधार लिए हैं,
कौम किसी को मज़हब ने सिखलाई है
लोग जो मन के भीतर दीवार लिए हैं,
जाते वक़्त नहीं साथ में जाता कुछ
नाहक़ हम कितना कुछ बेकार लिए हैं!
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वो, जो ऊपर नज़र नहीं करते
बादलों में सफ़र नहीं करते,
हम मुहब्बत में वो भी कर बैठे
काम जो उम्रभर नहीं करते,
ज़ख़्म देखे हैं इतने पैरों ने
इन पे काँटे असर नहीं करते,
दिल फ़रेबों से बच गया होता
हम भरोसा अगर नहीं करते,
उनको अफ़सोस करना पड़ता है
काम जो सोचकर नहीं करते!
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नादाँ दिल उसके प्यार में था
और वो अपने किरदार में था,
ज़ज़्बात मेरे नीलाम हुए
जाना उसका बाज़ार में था,
भीड़ लगी है उसके पीछे
कल चेहरा जो अखबार में था,
मीनारें उतनी ऊँची थीं
लोहा जितना आधार में था,
मौज़ उड़ाई ख़ूब भतीजों ने
चच्चा जब तक सरकार में था,
इस पार नहीं मिल पाया जो
शायद वो ही उस पार में था!
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बुलन्दी बड़ी से बड़ी चाहता है
ये सारा चमन, आदमी चाहता है,
ज़रूरत से ज़्यादा बहुत कुछ है लेकिन
नहीं पास है जो वही चाहता है,
अलग बात है ख़ुदकुशी कोई कर ले
मगर आदमी ज़िन्दगी चाहता है,
रिवाजों में डूबा है किरदार जिसका
वो भी इक कहानी नई चाहता है
मकाँ,रोटी कपड़ा से, तन ख़ुश है लेकिन
ये मन ,जाने कैसी ख़ुशी चाहता है,
हुनर आज़माते रहो जगमगाते
कहाँ आग कोई बुझी चाहता है!
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इक नज़र उस नज़र से मिलाने के बाद
गुल चमन में खिले हैं ज़माने के बाद,
जिसकी हर बात का दिल ने रख्खा यक़ीन
उसने चाहा मुझे आज़माने के बाद,
सादगी आपकी, रास आने लगी
जल उठी आग दिल की बुझाने के बाद,
मुझको रफ़्तार, रंज-ए-सफ़र से मिली
चलना आया मुझे लड़खड़ाने के बाद,
जब न पाया, बुलंदी पे चैन-ओ-क़रार
ख़ुद बिखेरा है, ख़ुद को सजाने के बाद,
दाल-रोटी की कीमत पता है उसे
ख़र्च करता है, जो ख़ुद कमाने के बाद,
ख़ुद को ज़िंदा बनाये रहो बेख़बर
दफ़्न कर देंगे लोग, जान जाने के बाद!
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रास्ते, आने-जाने में उम्र कट गई
मंज़िलों के फ़साने में उम्र कट गई,
कुछ फटे, कुछ पुराने में उम्र कट गई
चार कपड़े जुटाने में उम्र कट गई,
बात पानी की होती, तो खोदते कुआँ
प्यास दिल की बुझाने में उम्र कट गई,
भाव भरते रहे लफ्ज़ लफ्ज़ उम्रभर
शाइरी को बनाने में उम्र कट गई,
बारहा चोट खाता रहा यकीं मेरा
मतलबी इस ज़माने में उम्र कट गई,
फिर भी हो ना सका,हल सवाल हिज़्र का
ख़ुद को ख़ुद से मिलाने में उम्र कट गई,
एक पत्थर पे दिल आ गया था बेख़बर
उसको मूरत बनाने में उम्र कट गई!
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टी.वी. चैनल पे हाले-नगर देखिए
सनसनी ख़ेज़ हर पल ख़बर देखिए,
है परेशां बशर बढ़ती महँगाई से
भूख की जंग शामों-सहर देखिए,
जी हुज़ूरी, किसी की मजूरी करे
कैसे करती ग़रीबी बसर देखिए,
धूर्त बैठे मिलेंगें बुलंदी पे कुछ
रास्तों में भटकता हुनर देखिए,
नाज़ुकी और नज़ाकत के, जो रब्त हैं
वो भी बाज़ार हैं इक नज़र देखिए,
छेड़िये बात ऐसे ही कहीं मज़हबी
आदमी का सियासी असर देखिए!
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