2026 की ग़ज़लें , वैभव बेख़बर

 इस  कदर  हो  गया  है  वतन  दोस्तों

भूख  से  जल  रहे  हैं  बदन  दोस्तों,


जल है  दूषित हवा   और  महँगी दवा

साँस   लेने  में  होती  घुटन   दोस्तों,


कब  तलक   कारखानों  में पिसता रहे

अब की   मज़दूर   जाये  सदन  दोस्तों,


सब के  हिस्से  में  आये  बराबर  डगर

तब  सही  हो  सफ़र  का  चलन  दोस्तों,


यदि  यहाँ  हम भी  करने  लगे  भेदभाव

कौन   लायेगा   चैन-ओ-अमन  दोस्तों,


सब को   शोहरत  विरासत में  मिलती नहीं

तुमको    करना   पड़ेगा   जतन   दोस्तों,


जब से   कुत्ते   सियासी  हुक़ूमत  में  हैं

नोचते   फिर  रहे   हैं   कफ़न   दोस्तों  !



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मुझसे  टकराने  के  ख़ातिर   चलकर  आये

मत  पूछो   कैसे ,   कितने   पत्थर   आये,


मैंने   इक   ज़ालिम  को ज़ालिम  बोला था

फिर   लाखों   इल्ज़ाम  हमारे  सर  आये ,


करते   हैं   मज़दूरी   हम   मजबूरी    में

ऐसी  धूप  में   तुम को  तो  चक्कर  आये,


वो  आँखे   मुझको   देख के   रो  पड़ती हैं

शहर  से  लौट के  जब हम अपने घर आये,


कोर्ट- कचहरी   थाना   दफ़्तर की तनख्वाह

कोई   पीड़ित   आये   तो  लेकर  आये,


सन- सैंतालिस  में पूछे  थे  जो-जो प्रश्न

उन  प्रश्नों  के  अब तक ना  उत्तर  आये !





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सबब  बन के आये  अलम  ज़िंदगी  में

किये   जैसे  हमनें   करम  ज़िंदगी  में,


कहाँ  वक़्त  बीता  हुआ   लौटता  है

समझ  के  बढ़ाओ   क़दम  ज़िंदगी में,


किताबें   पढ़ीं  तो  हुआ  ज्ञात  हमकों

कि  पाले   बहुत  हैं  भरम  ज़िंदगी  में,


समझते  थे  अपना     उन्हीं से  मिले हैं

मेरे   हिस्से  आये  जो  ग़म  ज़िंदगी  में,


वो  कमसिन  उमर  तो  गयी  बीत  कब की

बहुत   याद   आये   सनम  ज़िंदगी  में,


हर एक  हार  से  मैंने  सीखा  बहुत कुछ

सिखाते   रहे   कुछ   सितम   ज़िंदगी  में,


भटकते   सफ़र  में   बहुत  दर-बदर  हम

न   होते   अगर  साथ  तुम  ज़िंदगी  में !



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ढूंढ लो अपना कोई सहारा

मैं ठहरा  अल्हड़ आवारा


हम  खुद  दरिया में उतरे हैं

पास  भँवर  है  दूर  किनारा,


अपने  भीतर  दीदार करो

मंदिर-मस्ज़िद क्या गुरुद्वारा,


जैसे  तैसे   दिन  बीतेंगे

कट  जायेगा वक़्त हमारा,


माँ की यादें थी  दूर तलक़

जब जब दिल ने प्रेम पुकारा


पापा थे  तब मुश्किल ना थी

कौन  भरेगा  ज़ख़्म  हमारा,





अह ज़िंदगी कैसा तुने किरदार दिया है

आगाज़-ए- कहानी  में  मुझे मार दिया है,


उस पार  के  भी लोग यही  सोचते होंगे

जो कुछ भी दिया ज़ीस्त ने उस पार दिया है,


खो जाए न आँखों  से  कहीं  रोशनी मेरी

कितने  दिनों  के  बाद  तो दीदार दिया है,


जब साथ  चलें दोनों तो बन जाएगी मूरत

पत्थर  किसी  के  हाथ में औजार दिया है


मुझको  नहीं शिकवा गिला उस बेवफ़ा से कुछ

उसने  मुझे  ये  मर्ज़  मज़ेदार  दिया  है,


दुनिया को  हुनरमंदों  ने  काबू  में  किया है

हर  शख़्स  को  कुदरत  ने  ये संसार दिया है


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झूठ  को  सच  बताने  लगे  हैं

लोग बातें  बनाने  लगे  हैं,


पेच-ओ-ख़म ना समझते थे पहले

अब  हमें  रास  आने  लगे  हैं,


क़द्र  सीरत  की  किसने  यहाँ की

लोग   सूरत   सजाने  लगे  हैं,


अब  यकीं  का  ज़माना  नहीं  है

इसलिये   आज़माने   लगे  हैं,


अब तो हर हाथ  में  इक धनुष है

तीर   किस  के   निशाने   लगे हैं,


क़द्र  करते  कहाँ  बाप  की  अब

जब से   बच्चे   कमाने   लगे  हैं


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हवस  की  भूख आगे है  ज़रूरत  आख़िरी  में  है

चलन  बाज़ार  का  जब  से  हमारी ज़िंदगी में  है,


उजाले  चंद  लोगों  को  ये किसने  सौंप  रक्खे हैं

यहाँ  इक  भीड़  लोगों की  अभी भी  तीरगी  में है,


कहाँ  मज़दूर  के  हिस्से   कोई  आराम  आता  है

कुदाली,  फावड़ा ,  बोझा,  बदन  पे  बेबसी  में  है,


लिये हैं  हाथ  में  सब अपनी-अपनी नस्ल का परचम

तमन्ना  सर-फ़रोशी  की   कहाँ  अब  आदमी  में है,


सरे-मैदान  लड़ने  की    अना  दुश्मन  समझता  है

हमारी   जान को  ख़तरा    हमारी  दोस्ती  में  है,


मिटा दे ज़ुल्म ज़ालिम का, बने आवाज़  बेबस की

नहीं  वो  बात  अब  वैभव  तुम्हारी  शायरी में  है !



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आज तलक़  ना  रब  देखे  हैं

मंदिर-मस्जिद  सब  देखे  हैं,


मूरत  की  चोरी   देखी  है

चोरों   के  करतब  देखे  हैं,


जो  चलते  थे  धर्म के  पीछे

गोरखधंधे   अब   देखे  हैं,


गिरगिट   जैसी  फ़ितरत देखी

रिश्तों   में  मतलब  देखे  हैं,


सुर्ख़  समझ के  चूम  रहे सब

प्यास  न  देखी  लब  देखे  हैं,


देखी   है   दंगों  की  नफ़रत

नस्लों   के   मनसब  देखे  हैं !


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कौन  जिम्मेदार  है   बर्बाद  हिन्दोस्तान का

मुफ़लिसी  सा  हाल है  आजाद हिन्दोस्तान का,


किसलिए  अंग्रेजों  से  लड़ते रहे इक उम्र  हम

ख़्वाब  देखा  था  कभी  आबाद  हिन्दोस्तान का,


राज  पूँजीवाद का  स्थापित  हुकूमत  कर  रही

है  बहुत  आमआदमी  नाशाद  हिन्दोस्तान  का,


पक्षपाती  ज़हर  मन  में   मुद्दतों   घोला  गया

बद-सियासत   खा  गयी  फ़ौलाद  हिन्दोस्तान का !



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गुज़र  जो  गया है  सफ़र  याद  आये

नदी  याद  आये   भँवर  याद  आये,


सड़क  पे  बने  शामियानों  से  पूछो

कि  कितना  मुसाफ़िर को घर  याद आये,


कभी  हल  चलाना  कभी  कारखाना

जो  ग़ुरबत  में  की थी  बसर  याद आये,


झुकी  भीड़ को तो  ख़ुदा  भूल  बैठा

कटे  शान  से   जो  वो सर याद आये,


वो पहला मिलन   वो  पह ली  जुदाई

वो पहली  तड़प  उम्रभर  याद  आये,





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काम जो  भी  किया  कीजिए

आप  खुद से  वफ़ा  कीजिए,


देर  के  बाद   अन्धेर   है

वक़्त  पे   फैसला  कीजिए,


कौन  कहता कि सूरज बनो

दीप  बन के  जला  कीजिए,


कब  भरे  हैं  दुआओं  से  ज़ख़्म

मर्ज़   है   तो  दवा  कीजिए,


आदमी  का   लिये   हो  बदन

आदमी  पे   दया   कीजिए,


फिर  से  कोशिश  करो  बेख़बर

रंज   का   सामना   कीजिए!


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तन की चूनर धानी है

मन की धुन बौरानी है,


आदमी  बिकने  लगा

खून  है  या  पानी  है,


ख़ुद-ग़रज़  निकले वो भी

हम तो  समझें सानी है,


दुःख हैं कितने जीने में

मरने  में  आसानी  है


दूर तक  तन्हाई है

क्या अजब वीरानी है,


मैं तो जन्नत समझा था

दुनिया में  हैवानी  है ! 

       

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आम-जन  की  बात  हम  सरदार  तक ले जायेंगे

प्यार से  समझें  न  तो  हथियार  तक  ले जायेंगे,


चल  पड़े  हैं  जो  क़दम  बदलाव की उम्मीद से

स्वप्न  उनको  एक दिन  साकार  तक ले जायेंगे,


चाटुकारों  को  न हासिल  बुर्ज़  होंगे अब  यहाँ

हम  यतीमों का   हुनर  घर-बार तक  ले जायेंगे,


ज़ुल्म  की  जंज़ीर   जिसमें  तोड़ने की  है ललक

हम   उसी  की  नाव  को  उस-पार तक ले जायेंगे,


भाव  की  उलझन को हम  किरदार तक ले आये हैं

ज़िस्म  की  मुश्किल  को भी  उपचार तक ले जायेंगे!


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जब  कोई  भूके पेट सोता है

दर्द  महसूस दिल को होता है,


उसकी  आँखों  मे  नेक सपने हैं

एक  बालक  जो  बोझ  ढोता है,


आस  थी  तुम  क़दम  बढ़ाओगे

पर  तुम्हें  भाग्य  पे   भरोसा  हैं,


आज मेरा है  कल  तुम्हारा होगा

वक़्त   सबका  ख़राब  होता  है,


न्याय  ख़ादिम  है  चंद  पैसों  का

अब  अदालत  में  ज़ुल्म  होता है,


इक भगत सिंह  चढ़  गया  सूली

कौन  अब  इंक़िलाब   बोता  है !


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ग़म-ए-ज़िंदगी  आसरा  चाहता  है

ये दिल साथ फिर आपका चाहता है,


ये दिल ना  किसी  से नफ़ा चाहता  है

वफ़ा  बाटता  है   वफ़ा  चाहता  है,


नज़र  को  नज़ाकत  पसंद आ रही है

दिल-ए-ज़ख्म फिर से हवा चाहता है,


मुक़द्दर  में मंज़िल  भले  ना लिखी हो

हुनर  पाँव  का   रास्ता  चाहता  है,


कहाँ  कोई  महबूब  रोटी  से सुंदर

गरीब आदमी  और  क्या चाहता है,


नयी  गर्द  हो  अब इलाका  नया हो

ये तिनका  हवा  से   हवा  चाहता है !




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