कहानी

 कहानी का नाम: पहचान का बोझ

1947 के आसपास का समय था। उत्तर भारत के एक साधारण से इलाके में दस साल का एक बच्चा हरिराम अकेला रह गया था। उसके पिता ब्रिटिश फौज के लिए भर्ती होकर किसी जंग में मारे गए थे और माँ लंबे इलाज के बिना बीमारी से चल बसी थी। घर नाम का जो ढांचा था, वह कर्ज़ और रिश्तेदारों की बेरुख़ी में बिखर चुका था। उसी क्षेत्र में तैनात एक अंग्रेज अधिकारी एडवर्ड विलियम्स उस बच्चे से टकराया। यह कोई दया की महान कथा नहीं थी, बस इतना था कि उस अधिकारी के पास विकल्प थे और उस बच्चे के पास कोई नहीं। काग़ज़ी कार्यवाही पूरी हुई और हरिराम भारत से इंग्लैंड ले जाया गया। इंग्लैंड पहुँचते ही हरिराम का नाम बदलकर हैरी कर दिया गया। भाषा बदली, पहनावा बदला, स्कूल बदले। धीरे-धीरे हरिराम की स्मृतियाँ भी बदलती रहीं। उसे बताया गया कि उसका अतीत दुखद था, इसलिए उस पर बात करना आवश्यक नहीं। उसने पढ़ाई की, नौकरी की, शादी की और एक सामान्य ब्रिटिश जीवन जिया। भारत उसके लिए किसी दूर देश की धुँधली कहानी बन गया, जिसमें दर्द तो था, पर स्पष्ट चेहरा नहीं। वर्षों बाद हैरी का बेटा हुआ और फिर उसके बेटे का बेटा, जिसका नाम आरव रखा गया। आरव बचपन से ही अपने दादा की आँखों में एक अजीब-सी चुप्पी देखता था। जब भी भारत का ज़िक्र आता, हैरी विषय बदल देता। कॉलेज के दिनों में आरव ने औपनिवेशिक इतिहास पढ़ा और पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसका परिवार सिर्फ़ ब्रिटिश नहीं है। उसने अपने दादा से ज़ोर देकर पूछा तो टूटे-फूटे शब्दों में हैरी ने बताया कि उसका जन्म भारत में हुआ था और वह एक अनाथ बच्चा था। यही जानकारी आरव के भीतर एक बेचैनी बनकर बैठ गई। उसने भारत को सिर्फ़ किताबों में नहीं, ज़मीन पर जानने का निर्णय लिया। उसने नौकरी से पैसे बचाए, हिंदी सीखी, उच्चारण सुधारने की कोशिश की और भारत आया। शुरुआत में भारत उसके लिए रोमांच था। लोग उसे विदेशी समझते थे, उसका सम्मान करते थे। होटल में कर्मचारी सीधे खड़े होते थे, लोग उसकी बात ध्यान से सुनते थे। जब वह अपनी कहानी बताता कि उसका परिवार कभी भारत से जुड़ा था, लोग उसे एक भावुक किस्से की तरह सुनते, पर गंभीरता से नहीं लेते। उसके पहनावे, भाषा और पैसे ने उसे अपने-आप ऊँची जाति की श्रेणी में डाल दिया था। लोग मान लेते थे कि विदेश से आया व्यक्ति स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ होगा। समय के साथ उसका पैसा घटने लगा। वह बड़े होटलों से छोटे गेस्टहाउसों और फिर साधारण किराए के कमरों में आने लगा। अब बातचीत का लहजा बदल गया था। अब लोग उसके नाम से पहले पूछते थे कि वह क्या करता है, कहाँ रहता है और किस तरह का आदमी है। एक दिन किसी ने सहजता से पूछ लिया कि उसकी जाति क्या है। आरव पहली बार असहज हुआ। उसने कहा कि उसे नहीं पता। यह जवाब लोगों को खटकने लगा। कुछ ही दिनों में उसे महसूस होने लगा कि अब वह वही व्यक्ति नहीं रहा, जो पहले था। चाय का गिलास अलग रख दिया जाता, मकान देने से मना कर दिया जाता, बातचीत में एक अदृश्य दूरी बना दी जाती। अब उसे विदेशी नहीं, संदिग्ध समझा जाने लगा था। जब उसने अपने भारतीय मूल की बात की, तो लोगों ने उसके रंग, उच्चारण और आर्थिक स्थिति को जोड़कर उसे पिछड़ी जाति का मान लिया। किसी ने सीधे अपमान नहीं किया, पर हर व्यवहार में एक रेखा खिंच गई थी। आरव को पहली बार समझ आया कि यह भेदभाव सिर्फ़ शब्दों में नहीं, रोज़मर्रा की आदतों में बसता है। उसे एहसास हुआ कि उसके परदादा ने शायद इसी वजह से अपनी पहचान पर कभी बात नहीं की। अंग्रेज उसे भारत से ले गए थे, लेकिन जाति भारत में ही छूट गई थी, जो पीढ़ियों बाद उसे पहचान रही थी। अब आरव न तो पूरी तरह ब्रिटिश था, न पूरी तरह भारतीय और न ही किसी निश्चित वर्ग का सदस्य। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसने पैसे के रहते सम्मान और पैसे के खत्म होते ही उपेक्षा दोनों देखी थी। उसने भारत छोड़ने का मन बनाया, पर रुका। क्योंकि अब वह सिर्फ़ घूमने नहीं आया था, वह समझने आया था। उसने लिखना शुरू किया, बोलना शुरू किया और लोगों से यह कहना शुरू किया कि जाति यहाँ जन्म से नहीं, हालात से भी तय होती है। जब कोई उससे पूछता कि वह कौन है, तो वह जवाब देता कि वह उस बच्चे का पोता है, जिसे युद्ध और बीमारी ने अनाथ बनाया और समाज ने पहचान से। यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, उस व्यवस्था की है, जहाँ आदमी का मूल्य उसके इंसान होने से पहले तय कर लिया जाता है।

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कहानी ( रैप का रंग).....वैभव बेख़बर



यश, गाँव के एक साधारण किसान परिवार से था, बचपन से ही उसे संगीत का गहरा शौक था, वह घंटों तक ढोलक या हारमोनियम के साथ बैठकर गाने बनाता रहता, खुद से धुनें निकालता और अक्सर कुछ न कुछ गुनगुनाता रहता, स्कूल में पढ़ाई के नाम पर उसका मन जल्दी ऊब जाता था, लेकिन जैसे ही कहीं संगीत की बात होती, वह सबसे आगे खड़ा दिखता था। स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम हो या 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे पर्व, यश की प्रस्तुति पूरे विद्यालय का मान बढ़ा देती थी,उसके राग, ताल और सुर में ऐसी मिठास थी कि हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता!


अक्सर टीचर उसकी पढ़ाई को लेकर चिंता करते, लेकिन उसके संगीत कौशल को देखते हुए एक दो नंबर जोड़कर उसे पास कर देते थे, सबको लगता था कि यह लड़का पढ़ाई में नहीं तो कम से कम संगीत में कुछ बड़ा करेगा,

मगर अब समय था बोर्ड परीक्षा का,  यहाँ संगीत नहीं बल्कि किताबें काम आने वाली थीं, यश को भी पहली बार पढ़ाई को लेकर टेंशन होने लगी थी, किताबें सामने रखकर बैठता, कुछ देर पढ़ता, फिर मन भटक जाता। सोचता कि मैं तो सुरों का लड़का हूँ, इन शब्दों और तारीखों में कैसे उलझूं!


एक दिन उसके पिता, जो खेत में काम करके थक कर लौटे थे, उसे परेशान बैठा देखकर पास आए।  बोले, "बेटा, पढ़ाई का काम ऐसे नहीं होता कि एक दिन में सब कर लो, जैसे खेत में बीज बोते हैं, फिर समय समय पर खाद-पानी देते हैं, खरपतवार हटाते हैं, तब जाकर महीनों बाद फसल तैयार होती है, वैसे ही पढ़ाई में भी रोज़ थोड़ा-थोड़ा मेहनत करनी पड़ती है, तू भी अभी से  हर दिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ना शुरू कर दे, तो परीक्षा की तैयारी ठीक से हो जायेगी !


यश ने उनकी बात ध्यान से सुनी, उस रात वह बहुत देर तक सोचता रहा। फिर उसे एक विचार आया, क्यों न वह संगीत को ही अपना हथियार बनाए और पढ़ाई को उसी में ढाल ले, कोशिश तो की ही जा सकती है,  अगली सुबह से उसने अपने पाठ्यक्रम को रैप की तरह गुनगुनाना शुरू किया। उसने विज्ञान के फार्मूलों, इतिहास की तारीखों और गणित के सूत्रों को धुनों में पिरो दिया, कुछ ही दिनों में वह कठिन से कठिन प्रश्न भी याद रखने लगा!


वह हर विषय को एक नए रैप की तरह पेश करता, खुद भी गाता और दोस्तों को भी सुनाता। उसके बनाए रैप धीरे-धीरे पूरे स्कूल में लोकप्रिय हो गए,  दोस्त उसे ‘रैपर यश’ कहने लगे, उसके रैप से क्लास के और भी छात्रों को कठिन फार्मूले याद करने में मदत मिली, दिन बीतते गए, परीक्षा नज़दीक आई, लेकिन इस बार यश तैयार था, उसने आत्मविश्वास के साथ हर पेपर दिया !


जब परिणाम आया, तो पूरे स्कूल में खुशी की लहर दौड़ गई, क्योंकि क्लास में मुश्किल से पास होने वाला यश, बोर्ड परीक्षा में कक्षा में तीसरे स्थान प्राप्त किया था, वह न केवल पास हुआ था, बल्कि उसकी मेहनत और अनोखे तरीके ने सबका दिल जीत लिया था। उसके शिक्षक गर्व से मुस्कुरा रहे थे, पिता की आंखों में संतोष था। यश ने साबित कर दिया था कि यदि आप अपने जुनून को सही दिशा में लगाएं, तो कोई भी मंज़िल मुश्किल नहीं होती,  पढ़ाई भी संगीत बन सकती है, बस सुर में आकर उसे समझने की जरूरत है।


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